पंजाब में ड्रग सेंसस के आंकड़े क्यों छिपा रही मान सरकार? ₹250 करोड़ खर्च के दावे पर बीजेपी ने उठाए सवाल

65 लाख परिवारों का सर्वे, हजारों कर्मचारी और करोड़ों का खर्च, फिर सार्वजनिक क्यों नहीं हुए पंजाब ड्रग सेंसस के नतीजे?

पंजाब में नशे के कारोबार और उसकी सप्लाई चेन को समझने के लिए की गई ड्रग सेंसस अब खुद राजनीतिक विवाद का विषय बन गई है। राज्य सरकार ने इस अभियान के तहत घर-घर जाकर आंकड़े जुटाए, हजारों सरकारी कर्मचारियों को काम पर लगाया और इसके लिए करोड़ों रुपये का बजट रखा। लेकिन सर्वे पूरा होने के बाद भी इसके नतीजे सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इसी को लेकर बीजेपी ने भगवंत मान सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।

पंजाब बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने सवाल उठाया है कि जब राज्य के करीब 65 लाख परिवारों तक पहुंचकर जानकारी जुटाई गई, तो सरकार उन आंकड़ों को जनता के सामने रखने से क्यों बच रही है? उन्होंने इस पूरे अभियान पर करीब 250 करोड़ रुपये खर्च होने का दावा करते हुए इसकी जांच सीबीआई और एनआईए से कराने की मांग की है। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी सरकार का कहना है कि सर्वे के आंकड़ों का अध्ययन किया जा रहा है और उन्हें उचित समय पर जारी किया जाएगा।

 

पंजाब सरकार ने वर्ष 2025 में नशे की समस्या की वास्तविक स्थिति का आकलन करने के लिए राज्यव्यापी ड्रग सेंसस की योजना बनाई थी। इसका उद्देश्य केवल नशे के आदी लोगों की संख्या पता करना नहीं, बल्कि नशीले पदार्थों के इस्तेमाल, उनकी उपलब्धता, सप्लाई के स्रोत और नशा मुक्ति केंद्रों तक लोगों की पहुंच से जुड़ी जानकारी जुटाना भी था।

सरकारी योजना के मुताबिक, इस अभियान के लिए करीब 150 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। लगभग 28,000 सरकारी और अनुबंधित कर्मचारियों को इस काम में लगाया गया। इनमें शिक्षक और कंप्यूटर ऑपरेटर भी शामिल थे। अभियान की शुरुआत 5 मई 2026 से हुई और इसके तहत राज्य के करीब 65 लाख परिवारों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया।

सर्वे के दौरान परिवारों से पूछा गया कि उनके इलाके में किस तरह के नशीले पदार्थ इस्तेमाल किए जाते हैं, नशे की समस्या कितनी गंभीर है, नशीले पदार्थ कहां से मिलते हैं और सरकारी नशा मुक्ति केंद्र कितनी दूरी पर है। लोगों से सरकार के ‘युद्ध नशे विरुद्ध’ अभियान के असर को लेकर भी सवाल किए गए।

ऐसे सर्वे का मकसद नशे की समस्या को लेकर प्रशासन को जमीनी स्तर की जानकारी उपलब्ध कराना है, ताकि प्रभावित इलाकों की पहचान, नशा मुक्ति सुविधाओं की जरूरत और रोकथाम की रणनीति तय की जा सके। लेकिन इस पूरी कवायद की उपयोगिता का आकलन तभी हो सकता है, जब इसके निष्कर्ष और उनके आधार पर उठाए गए कदमों की जानकारी सामने आए।

सुनील जाखड़ ने क्यों उठाए सवाल?

बीजेपी नेता सुनील जाखड़ ने चंडीगढ़ में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सर्वे के खर्च और उसके उद्देश्यों पर सवाल उठाए। उनका दावा है कि इस अभियान पर 250 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए, जबकि सरकार की ओर से निर्धारित बजट 150 करोड़ रुपये था। इस अंतर को स्पष्ट करने के लिए सरकार को खर्च का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करना चाहिए।

जाखड़ ने आरोप लगाया कि सर्वे का वास्तविक उद्देश्य पंजाब से नशा खत्म करना नहीं, बल्कि नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार को एक कारोबारी मॉडल की तरह समझकर उसके नेटवर्क पर नियंत्रण स्थापित करना था। उन्होंने इस कथित योजना के पीछे आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की भूमिका होने का भी आरोप लगाया।

उन्होंने पंजाब पुलिस के महानिदेशक के एक कथित पुराने बयान का हवाला देते हुए दावा किया कि राज्य में नशे का बड़ा हिस्सा मेडिकल और फार्मास्युटिकल दवाओं से जुड़ा है। जाखड़ का आरोप है कि इसी आधार पर सप्लाई चेन पर नियंत्रण की नीति बनाई गई। उन्होंने इस मामले में अपराधियों और राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़ की आशंका जताते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखा है और सीबीआई तथा एनआईए से जांच कराने की मांग की है।

सरकार का जवाब क्या है?

पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा है कि ड्रग सेंसस के आंकड़े उचित समय पर जारी किए जाएंगे। उनके मुताबिक, फिलहाल इनका अध्ययन किया जा रहा है। उन्होंने जाखड़ पर पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस और बीजेपी के शासनकाल में भी पंजाब में नशे की समस्या बढ़ी थी और आम आदमी पार्टी सरकार इसे खत्म करने के लिए काम कर रही है।

आम आदमी पार्टी पंजाब के महासचिव और प्रवक्ता बलतेज सिंह पन्नू ने भी सर्वे को ‘युद्ध नशे विरुद्ध’ अभियान का हिस्सा बताया। उनका कहना है कि जिन सरकारी विभागों को इन आंकड़ों की जरूरत है, वे उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर काम कर रहे हैं। पन्नू ने जाखड़ के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि सरकार नशे के खिलाफ लगातार कदम उठा रही है

Exit mobile version