दीपावली के ‘दीपक’ में छिपा ‘स्व’ का बोध

हमने कभी सुना या पढ़ा नहीं होगा कि ‘रामकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई’। विचार करेंगे तो पायेंगे कि श्रीराम ने अपने जीवन में पूर्वजों के आदर्शों को प्रतिष्ठित किया और उनकी मर्यादा का मान बढ़ाया। उन्होंने जिन मूल्यों को अपने आचरण में उतारा, वे आज भी भारतीय समाज के लिए प्रेरणा हैं।

दीपावली के ‘दीपक’ में छिपा ‘स्व’ का बोध

प्रतिवर्ष दीपों का उत्सव ‘दीपावली’ आते ही घर-आँगन दीपों से सजने लगते हैं। बाजारों में रौनक बढ़ती है, मिठाइयों और पकवानों की सुगंध वातावरण में घुलती है और चारों ओर उत्सव का उल्लास दिखाई देता है। उत्सव आनंद और उत्साह के साथ मनाया जाने वाला शुभ अवसर है। लेकिन उत्सव हमें आनंद के साथ आत्मचिंतन का अवसर भी देते हैं। वे हमें ठहरकर अपने जीवन, विचारों और यात्रा का मूल्यांकन करने की प्रेरणा देते हैं।

दीपावली के अवसर पर यह विचार करना प्रासंगिक है कि पिछले वर्ष हम कहाँ थे और आज कहाँ पहुँचे हैं? उत्सव का वास्तविक आनंद उल्लास के साथ आत्मचिंतन और आत्मबोध जुड़ने पर और अधिक सार्थक हो जाता है। दीपावली का दीपक घर-आँगन को प्रकाशमान करते हुए हमारे अंतर्मन को भी आलोकित करने का संदेश देता है। उसकी लौ हमें अपने विचारों, संस्कारों और जीवन-मूल्यों का मूल्यांकन करते हुए स्वयं के वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देती है। शायद इसी में दीपावली के दीपक में छिपे ‘स्व’ के बोध का वास्तविक अर्थ निहित है।

दीपावली आते ही भगवान श्रीराम, रामायण, रावण-वध और अयोध्या में उनके आगमन के उल्लास की चर्चा होने लगती है। भारतीय कालगणना के अनुसार, त्रेतायुग के घटनाक्रम और करोड़ों वर्ष पूर्व की सांस्कृतिक स्मृतियाँ हमारे वर्तमान में जीवंत हो उठती हैं। प्रभु श्रीराम के पुरुषार्थ, त्याग, मर्यादा और आदर्शों की चर्चा हर ओर होती है। प्रभु श्रीराम का स्मरण सहज ही हो जाता है। उनके जीवन और आदर्शों की चर्चा पीढ़ियों से हमारे समाज में होती आई है।

लेकिन इसी अवसर पर एक प्रश्न अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या हमें अपने कम से कम सात पीढ़ी पहले के पूर्वजों के नाम भी स्मरण हैं? क्या हम जानते हैं कि वे कौन थे, उनका जीवन कैसा था, उन्होंने किन परिस्थितियों में अपने परिवार का पालन-पोषण किया और किन संस्कारों को आगे बढ़ाया? दीपावली के ये दीपक हमारे पूर्वजों ने भी जलाए होंगे। जिन परंपराओं को हम आज निभा रहे हैं, उनका प्रवाह उन्हीं पीढ़ियों से होकर हम तक पहुँचा है। हमारी पारिवारिक पहचान, हमारे संस्कार, हमारी भाषा, हमारी रीति-रिवाज और जीवन के प्रति हमारी दृष्टि में उन पीढ़ियों का योगदान समाहित है।

श्रीराम का स्मरण हमें एक अधिकार की जगह कर्तव्य निर्वहन की महान सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ता है। अपने पूर्वजों का स्मरण हमें उस परंपरा की पारिवारिक और व्यक्तिगत निरंतरता का बोध कराता है। दोनों स्मृतियाँ मिलकर हमें समझाती हैं कि हमारी पहचान केवल वर्तमान में खड़ी एक स्वतंत्र इकाई नहीं है। हम अपने अतीत की विरासत लेकर वर्तमान में जी रहे हैं और भविष्य की पीढ़ियों के लिए कुछ छोड़कर जाने वाले हैं।

‘रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई’ यह पंक्ति भगवान श्रीराम के जीवन में प्रतिष्ठित मर्यादा और वचनपालन के आदर्श को अभिव्यक्त करती है। इसके पीछे उस परंपरा का भाव है, जिसमें वचन, कर्तव्य और मर्यादा को जीवन के सर्वोच्च मूल्यों में स्थान दिया गया। हमने कभी सुना या पढ़ा नहीं होगा कि ‘रामकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई’। विचार करेंगे तो पायेंगे कि श्रीराम ने अपने जीवन में पूर्वजों के आदर्शों को प्रतिष्ठित किया और उनकी मर्यादा का मान बढ़ाया। उन्होंने जिन मूल्यों को अपने आचरण में उतारा, वे आज भी भारतीय समाज के लिए प्रेरणा हैं।

यही परंपरा की वास्तविक शक्ति है। परंपरा केवल कुछ रीति-रिवाजों को दोहराना मात्र नहीं है। वह मूल्यों, विचारों और जीवनदृष्टि की युगानुकुल पीढ़ी-दर-पीढ़ी यात्रा है। एक पीढ़ी जिन आदर्शों को अपने जीवन में जीती है, अगली पीढ़ी उन्हें अपने समय के अनुरूप संस्कारों के रूप में ग्रहण करती है। अपने पूर्वजों का स्मरण करने का अर्थ उनके जीवन की प्रत्येक परिस्थिति को दोहराना नहीं है। इसका अर्थ है उनके जीवन से श्रेष्ठ मूल्यों को पहचानना, उन्हें अपने वर्तमान में अपनाना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना।

हम अक्सर अपनी पहचान अपने नाम, व्यवसाय, पद, शिक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते हैं। ये सभी हमारे व्यक्तित्व के महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं, लेकिन हमारी पहचान का संपूर्ण परिचय नहीं देते। हमारे परिवार, पूर्वजों, संस्कारों और परंपराओं का भी हमारे व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। कभी अपने घर के बुजुर्गों के पास बैठकर उनके जीवन की कहानियाँ सुनिए। उन्होंने किन परिस्थितियों में जीवन बिताया? परिवार के लिए कितने संघर्ष किए? किन मूल्यों को सर्वोपरि रखा? कठिन समय में उनके निर्णयों का आधार क्या था?

संभव है कि उनके जीवन में ऐसी अनेक प्रेरणाएँ छिपी हों, जिनका उल्लेख किसी पुस्तक या इतिहास में न मिले, लेकिन जो हमारे परिवार की वास्तविक विरासत हों। आज हम जिन सुविधाओं और अवसरों का लाभ उठा रहे हैं, उनके पीछे पिछली पीढ़ियों का परिश्रम और त्याग भी है। किसी ने खेतों में मेहनत की, किसी ने परिवार के लिए अपना सुख छोड़ा, किसी ने सीमित संसाधनों में बच्चों को शिक्षित किया और किसी ने सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए परिवार की प्रतिष्ठा बनाए रखी। इनका स्मरण हमें अपने जीवन के प्रति विनम्र और जिम्मेदार बनाता है।

परिवार प्रबोधन के लिए दीपावली से अच्छा अवसर नहीं हो सकता। अपने घर के बुजुर्गों के साथ बैठना, परिवार की पुरानी तस्वीरें देखना, बच्चों को पूर्वजों की कहानियाँ सुनाना और पारिवारिक परंपराओं का अर्थ समझाना भी स्वबोध की एक सुंदर प्रक्रिया हो सकती है। ‘स्व’ का बोध परिवार से प्रारंभ होता है, लेकिन उसकी यात्रा परिवार तक सीमित नहीं रहती। परिवार हमारी पहली पाठशाला है। यहीं से हमें भाषा, व्यवहार, संस्कार, सहयोग और कर्तव्य का ज्ञान मिलता है। यही संस्कार आगे चलकर समाज और राष्ट्र के प्रति हमारे दृष्टिकोण का निर्माण करते हैं। ठीक इसी तरह हमारे पूर्वजों की परंपराएँ केवल पारिवारिक जीवन तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने सामाजिक जीवन, लोकाचार, त्योहारों, मेलों, धार्मिक स्थलों और सामूहिक उत्सवों के माध्यम से समाज को जोड़ने का कार्य किया।

प्रभु श्रीराम का स्मरण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराओं और अभिव्यक्तियों के साथ होता है। रामायण की कथाएँ अनेक भाषाओं में कही गईं, लोककलाओं में प्रस्तुत हुईं और पीढ़ियों तक लोगों के जीवन का हिस्सा बनी रहीं। यह भारत की सांस्कृतिक एकात्मता का सुंदर उदाहरण है। हमारा ‘स्व’ इसी व्यापक सांस्कृतिक यात्रा से जुड़ा हुआ है। अपनी पारिवारिक परंपरा को समझते हुए भारतीय सभ्यता की परंपरा को पहचानना आत्मबोध अथवा स्व के बोध को व्यापक बनाता है। इससे व्यक्ति अपने जीवन को एक बड़ी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक यात्रा का हिस्सा समझने लगता है।

दीपावली के दीपक में ‘स्वबोध’ का एक व्यावहारिक पक्ष भी दिखाई देता है। मिट्टी का दीपक हमारी धरती, हमारे कारीगरों और हमारी स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। इसे बनाने वाले कुम्हार का श्रम, उसकी कला और उसके परिवार की आजीविका इस छोटे-से दीपक में समाहित होती है। जब हम दीपावली पर मिट्टी के दीपक खरीदते हैं, तो स्थानीय कारीगर के परिश्रम का सम्मान करते हैं। हमारी छोटी-सी खरीद उसके परिवार के लिए आर्थिक सहयोग बन सकती है। यह स्वदेशी का सहज और सरल रूप है। स्वदेशी का भाव अपनी क्षमताओं, संसाधनों और श्रम पर विश्वास करने से जुड़ा है। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में स्थानीय उत्पादों, कारीगरों और उद्यमियों को प्राथमिकता देना आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में योगदान है। आधुनिक विद्युत सजावट और नई तकनीक का उपयोग अपनी जगह है, लेकिन मिट्टी के दीपक की सांस्कृतिक महत्ता और उसके पीछे जुड़ी मानवीय कहानी को विस्मृत करना प्रभु राम के मार्ग से भटकना है। एक मिट्टी का दीपक हमें अपनी धरती से जोड़ता है। वह स्मरण कराता है कि हमारी संस्कृति का वास्तविक सौंदर्य स्थानीय जीवन, श्रम, कला और परंपराओं में भी बसता है।

आज का समय तेजी से बदल रहा है। तकनीक, शिक्षा, संचार और वैश्विक संपर्क ने जीवन के अनेक आयामों को प्रभावित किया है। आधुनिकता को स्वीकार करना और नई संभावनाओं का लाभ उठाना आवश्यक है। लेकिन इस परिवर्तन के बीच अपनी पहचान के प्रति सजग रहना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को कमतर समझने की मानसिकता आत्मविश्वास को कमजोर करती है। किसी अन्य संस्कृति से अच्छी बातें सीखना स्वाभाविक है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझे बिना दूसरों की नकल करना आत्मविस्मृति का कारण बन सकता है।

भारतीय संस्कृति ने समय के साथ परिवर्तन स्वीकार किए हैं। उसमें नए विचारों के लिए स्थान रहा है। उसकी जीवंतता का आधार यही रहा कि उसने अपनी मूल चेतना को बनाए रखते हुए परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को विकसित किया अथवा युगानुकुल परिवर्तन की वाहक बनी। दीपावली का दीपक इस संतुलन का सुंदर प्रतीक है। वह आधुनिक घरों में भी उतनी ही सहजता से जलता है, जितना सदियों पहले जलता रहा होगा। उसकी लौ बदलते समय के बीच अपनी मूल पहचान बनाए रखती है। नई पीढ़ी को दीपावली मनाने के साथ उसके सांस्कृतिक अर्थ से परिचित कराना आवश्यक है। त्योहारों का ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित न रहे। परिवारों में संवाद हो, परंपराओं के पीछे छिपे विचार समझाए जाएँ और बच्चों को अपनी संस्कृति के प्रश्न पूछने तथा उसे जानने के अवसर दिए जाएँ।

स्व का बोध केवल अतीत को याद करने का विषय नहीं है। यह वर्तमान को समझने और भविष्य के प्रति जिम्मेदारी स्वीकार करने की प्रक्रिया भी है। यदि हम अपने पूर्वजों के जीवन से प्रेरणा लेते हैं, तो उनके अच्छे मूल्यों को अपने व्यवहार में उतारना हमारा दायित्व बनता है। यदि हमें अपनी संस्कृति पर गर्व है, तो उसे समझना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना भी आवश्यक है। यदि हम अपनी सभ्यता की निरंतरता का हिस्सा हैं, तो उसे समृद्ध करने में योगदान देना भी हमारी जिम्मेदारी है। हम अपने बच्चों को केवल संपत्ति, शिक्षा और सुविधाएँ देकर ही अपना दायित्व पूरा नहीं करते। उन्हें संस्कार, पारिवारिक स्मृतियाँ, सांस्कृतिक पहचान और जीवन-मूल्यों की विरासत देना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। आने वाली पीढ़ियाँ जब दीपावली पर दीप जलाएँ, तो उन्हें यह भी पता हो कि यह परंपरा उनके परिवार में कैसे चली आ रही है, भारतीय संस्कृति में इसका क्या महत्त्व है और इस पर्व से कौन-से जीवन-मूल्य जुड़े हैं। हमारे पूर्वजों ने अपने समय में जो विरासत हमें सौंपी, उसे समझकर आगे बढ़ाना हमारी पीढ़ी का पुरुषार्थ है। यही अतीत के प्रति सम्मान, वर्तमान के प्रति सजगता और भविष्य के प्रति प्रतिबद्धता है। दीपावली पर घर के प्रत्येक कोने में दीप जलाते समय एक दीप अपने अंतर्मन में भी जलाना चाहिए। वह दीप हमें अपनी पहचान, अपने संस्कारों, अपने पूर्वजों और अपनी सभ्यता का स्मरण कराए।

दीपावली का दीपक हमें अपनी जड़ों को पहचानने, अपनी विरासत को समझने और अपने जीवन को उन मूल्यों के अनुरूप ढालने की प्रेरणा देता है, जिनसे हमारी पहचान अथवा ‘स्व’ बना है। अपने ‘स्व’ को पहचानना, अपनी संस्कृति से जुड़े रहना और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना ही दीपावली के प्रकाश की वास्तविक सार्थकता है। यही दीपावली के दीपक में छिपा ‘स्व’ का बोध है। नारायणायेती समर्पयामि….

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