नई दिल्ली के कृषि भवन परिसर में मौजूद कदीमी मस्जिद इन दिनों चर्चा में है। केंद्र सरकार इसे सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत हटाना चाहती है। सरकार का तर्क है कि सरकारी कार्यालय परिसर में स्थायी धार्मिक ढांचे की मौजूदगी उचित नहीं है। दूसरी ओर, मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति का कहना है कि यह इमारत आजादी से भी पुरानी है और सरकारी कार्यालय बनने से पहले से यहां मौजूद है।
इस विवाद का सबसे अहम दस्तावेज 8 नवंबर 1940 का एक समझौता है। इससे पता चलता है कि मस्जिद का इस्तेमाल सरकारी जमीन पर धार्मिक स्थल के रूप में ब्रिटिश शासन के समय से हो रहा था। लेकिन इस समझौते में जमीन का मालिकाना हक मस्जिद की प्रबंधन समिति को नहीं दिया गया था। यही अंतर आज पूरे विवाद के केंद्र में है।
कदीमी मस्जिद का नाम और इतिहास क्या है?
‘कदीमी’ शब्द उर्दू के ‘कदीम’ से आया है, जिसका अर्थ होता है पुराना या प्राचीन। कृषि भवन परिसर में स्थित इस मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति का दावा है कि इसका इतिहास 100 साल से भी अधिक पुराना है। समिति ने दिल्ली हाई कोर्ट में कहा कि मस्जिद के अस्तित्व के दस्तावेज 1945 तक पीछे जाते हैं। यानी यह भारत की आजादी से दो साल पहले भी मौजूद थी।
समिति के मुताबिक, जब 1950 और 1960 के दशक में कृषि भवन, शास्त्री भवन और आसपास के सरकारी कार्यालयों का निर्माण हुआ, तब भी मस्जिद वहां थी। बाद में यह केंद्रीय सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए नमाज पढ़ने की जगह बन गई।
1940 के समझौते में क्या लिखा था?
केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल अपनी रिपोर्ट में 8 नवंबर 1940 के एक समझौते का हवाला दिया है। यह समझौता तत्कालीन प्रशासन और जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के सचिव के बीच हुआ था।
इस समझौते के तहत सरकार ने मस्जिद के इस्तेमाल के लिए जमीन और परिसर समिति को दिया था। लेकिन यह अनुमति सीमित थी। इसके तहत:
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परिसर का इस्तेमाल केवल मस्जिद के रूप में किया जा सकता था।
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सरकार की लिखित अनुमति के बिना इमारत में बदलाव या मरम्मत नहीं की जा सकती थी।
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नई इमारत या अस्थायी ढांचा खड़ा करने की भी अनुमति नहीं थी।
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शर्तों का उल्लंघन होने पर प्रशासन परिसर का कब्जा वापस ले सकता था।
केंद्र सरकार का कहना है कि इस समझौते से समिति को जमीन का मालिकाना हक नहीं मिला था। उसे केवल मस्जिद के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई थी। इसलिए समिति जमीन या ढांचे पर स्थायी अधिकार का दावा नहीं कर सकती।
यानी मस्जिद का वहां होना और जमीन का मालिकाना हक होना दो अलग-अलग बातें हैं। 1940 का समझौता मस्जिद के इस्तेमाल की अनुमति दिखाता है, जमीन का हस्तांतरण नहीं।
वक्फ बोर्ड ने कब किया था संपत्ति का नोटिफिकेशन?
मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति ने हाई कोर्ट में बताया कि दिल्ली वक्फ बोर्ड ने 1970 में इस संपत्ति को वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित किया था। समिति का कहना है कि इस रिकॉर्ड में भी मस्जिद की पुरातनता का उल्लेख है।
समिति ने यह भी दलील दी कि मस्जिद का इस्तेमाल लंबे समय से कृषि भवन और आसपास के सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारी नमाज के लिए करते रहे हैं। उसके मुताबिक, यह केवल एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि सरकारी कर्मचारियों के लिए स्थापित इबादतगाह है।
समिति ने संविधान के अनुच्छेद 25 का भी हवाला दिया है। यह अनुच्छेद सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता और अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता है। हालांकि, यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
केंद्र सरकार मस्जिद को क्यों हटाना चाहती है?
केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में कहा है कि किसी सरकारी कार्यालय परिसर के भीतर स्थायी धार्मिक ढांचे की मौजूदगी स्वीकार्य नहीं है। सरकार के मुताबिक, यह व्यवस्था सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुकूल नहीं है।
सरकार ने बताया कि कदीमी मस्जिद उस जमीन पर स्थित है, जहां सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट की इमारतें 4 और 5 बनाई जानी हैं। कृषि भवन भी इसी पुनर्विकास योजना के तहत हटाया जाना है।
इसलिए सरकार का तर्क केवल जमीन के मालिकाना हक तक सीमित नहीं है। वह यह भी कह रही है कि सरकारी कार्यालयों के लिए निर्धारित परिसर में धार्मिक ढांचे को बनाए रखना उचित नहीं होगा।
दिल्ली हाई कोर्ट में क्या हुआ है ?
मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति ने सितंबर 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर मस्जिद को संरक्षण देने की मांग की थी। 17 सितंबर को जस्टिस अनिश दयाल की पीठ के सामने याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने मस्जिद की ऐतिहासिक मौजूदगी और उसके लंबे समय से इस्तेमाल का पक्ष रखा।
समिति का कहना है कि मस्जिद सरकारी कार्यालयों के निर्माण से पहले से मौजूद है और कर्मचारियों की धार्मिक जरूरतों को पूरा करती रही है। वहीं, केंद्र सरकार 1940 के समझौते के आधार पर कह रही है कि समिति को जमीन पर मालिकाना हक नहीं दिया गया था।
इस मामले में अदालत के सामने मुख्य सवाल यह है कि पुराने समझौते, वक्फ बोर्ड की अधिसूचना और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का इस जमीन पर क्या कानूनी प्रभाव पड़ता है। केवल मस्जिद का पुराना होना अपने आप में जमीन के मालिकाना हक का प्रमाण नहीं है। इसी तरह, जमीन सरकारी होने से उसके लंबे समय से धार्मिक इस्तेमाल और उससे जुड़े कानूनी दावों का सवाल भी अपने आप खत्म नहीं हो जाता।
दिल्ली में सरकारी इमारतों से पहले भी मौजूद थीं मस्जिदें
कदीमी मस्जिद का मामला दिल्ली के उस ऐतिहासिक संदर्भ से भी जुड़ा है, जब नई राजधानी का निर्माण हो रहा था। ब्रिटिश सरकार ने 1911 में भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का ऐलान किया था। इसके बाद नई दिल्ली का निर्माण हुआ। राष्ट्रपति भवन और नॉर्थ-साउथ ब्लॉक जैसी इमारतें 1931 तक तैयार हो गई थीं।
आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू सरकार के समय केंद्रीय सचिवालय का विस्तार हुआ। कृषि भवन, उद्योग भवन, निर्माण भवन, शास्त्री भवन और रेल भवन जैसी सरकारी इमारतें 1956 से 1968 के बीच बनीं।
कदीमी मस्जिद अकेली ऐसी धार्मिक इमारत नहीं है, जो सरकारी कार्यालयों के आसपास मौजूद है। इंडिया गेट के पास जाब्ता गंज मस्जिद और उद्योग भवन के नजदीक सुनेहरी बाग मस्जिद भी आसपास की सरकारी इमारतों से पुरानी हैं। 16 अप्रैल 1970 के दिल्ली गजट में इन दोनों मस्जिदों को 100 साल से अधिक पुराना बताया गया था।
