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केरल लव-जिहाद “मॉडर्न” परिवारों के लिए एक चेतावनी है, संभल जाइए वरना भोगना पड़ेगा

Kannan द्वारा Kannan
1 November 2017
in मत
अखिला हदिया
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नफरत और गुस्से को एक तरफ करके “लव जिहाद” को एक नई द्रष्टि से देखना चाहिए, जो कि एक बहुत ही गंभीर मुद्दा है। विडंबना यह है कि जो लोग इसे करते है वे इसे स्वीकार नहीं करते हैं। जो लोग इसका दावा करते हैं, वे इसे साबित नहीं कर पाते हैं। अब जबकि राजनीति, प्रेस, प्रशासन और समाज इस मामले को हल करने में असफल रहे, इसलिए अंत में अब यह मामला ऐसी जगह पहुँच गया है जहाँ लोकतंत्र की सभी समस्याओं को हल किया जाता है, अब न्यायपालिका की सर्वोच्च अदालत, उच्चतम न्यायालय ने इस समस्या की जांच की जिम्मेदारी स्वयं ले ली है।

विक्रम बरगद के वृक्ष से बेताल को पकड़ कर काली मंदिर ले जा रहा था, उस समय बेताल ने राजा की परीक्षा लेने का प्रयास किया, कि करेंट अफेयर्स के मामलों में वह कितना कुशल है। तो उसने विक्रम से कहा, “प्रिय विक्रम, मैं आपको अखिला की कहानी बताता हूं जो अब हदिया बन गई, तो आप रास्ते पर बाधाओं को महसूस नहीं करेंगे। राजन, ध्यान से सुनें और मेरे प्रश्नों का उत्तर दें”।

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अखिला के मामले में, जो शफीन जहां नाम के व्यक्ति से शादी करके हदिया बन गई, यहाँ तक कि न्यायपालिका ने स्वयं को – वयस्कों के व्यक्तिगत अधिकारों, वयस्क पर माता-पिता के अधिकार और निश्चित रूप से कभी समाप्त न होने वाले धार्मिक पक्षपात के मामले में कमजोर स्थिति में पाया।

अखिला के पिता ने उनकी बेटी के गायब होने पर शिकायत दर्ज करवाई जो कि एक अमुक अबूबकर नामक शख्स के गिरफ्त में थी। फिर, उन्होंने हाई कोर्ट में हेबस कोर्पस याचिका का मामला दायर किया। अखिला उस समय अपने मूल नाम के साथ रह रही थी फिर उसने अपने धर्म को बदलने और इस्लाम को समझने के लिए एक कोर्स (पाठ्यक्रम) किया जिसके उपरान्त उसने एक नया नाम हदिया अपनाया। बाद में, हदिया ने अपनी इच्छा से कुछ दुसरे लोगों की मदद द्वारा शफीन जहां से शादी की, जो संयोगवश सामाजिक डेमोक्रेटिक पार्टी का सदस्य है, जो पीएफआई (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) का राजनीतिक दल हैऔर अपनी उग्रवादी गतिविधियों के लिए एक कुख्यात चरमपंथी संगठन है। फिर हदिया के पिता अशोकन उच्च न्यायालय में गए और फैसला उनके पक्ष में आया तथा न्यायालय ने हदिया को उनके पिता को सौंप दिया। अब, शाफीन जहान की अपनी पत्नी को पुनः प्राप्त करने के लिए याचिका दाखिल करने की बारी थी। सुप्रीम कोर्ट ने अब 27 नवंबर को व्यक्तिगत रूप से अखिला/हदिया की सुनवाई का फैसला किया है।

समस्या का मूल कारण:

यह एक तथ्य है कि अखिला ने अपने आप ही इस्लाम स्वीकार किया। कानूनी मामलों के बाल की खाल निकालने के बजाए, यह समझने की जरुरत है कि क्यों उसने अपने धर्म को बदलने का विचार किया। जब अखिला को सलेम के शिवराज होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज के छात्रावास का भोजन नहीं अच्छा लगा, तो वह एक घर में अपनी चार साथियों के साथ रहने लगीं, जिनमें दो हिंदू और दो मुस्लिम लड़कियां थीं।

अखिला समय पर की जाने वाली प्रार्थनाओं और जसीना और फसीना के अच्छे चरित्र से इस्लाम की तरफ आकर्षित हुईं। उनसे प्रेरित होकर, अखिला ने धर्म परिवर्तन करने से पहले ही इस्लाम के बारे में सीख लिया।

बेताल ने विक्रम से पूछा “हे बुद्धिमान राजा, यह अखिला की कहानी है, जिसे अब हदीया नाम से पुकारा जाना पसंद है। वह अपने पति शफीन जहां के पास वापस जाना चाहती है। उसके पिता का दावा है कि मुस्लिम बनाने के लिए उसको वरगला (ब्रेनवॉस) दिया गया था और यह लव जिहाद का मामला है। उसकी माँ बस रोती रहती हैं। अखिला का पति उसके साथ रहना चाहता है।”

अब मुझे बताओ, कि यह किसकी गलती है, जिसके कारण हदिया अपने पिता के घर में रह रही है। शिक्षित न्यायाधीशों को ऐसी अवस्था में, संविधान की सीमा के भीतर रहते हुए, क्या करना चाहिए (एक वाक्यांश जिसे हम में से बहुत अपनी काविलियत तथा सीमित ज्ञान के साथ व्याख्या करते हैं)?

विक्रम ने गहरी सांस ली और जवाब देने से पहले विचार किया।

प्रिय बेताल, अखिला के माता-पिता की गलती है। वे अपनी संस्कृति के बारे में बताने में नाकाम रहे, जब वह बाल्यावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ रही थी। जब बच्चे युवा हो रहे हों तो  माता-पिता को उन्हे ढालना पड़ता है। किशोरावस्था को पार करने के बाद, उनके विश्वास को बदलना संभव नहीं है, जिसे उन्होंने अपने अनुभवों और शिक्षाओं के माध्यम से पाया है।

अपने पूर्वजों, रीति-रिवाजों और प्रथाओं के बारे में बच्चों को बताना और उन्हें शिक्षित करना माता पिता का कर्तव्य है। दुनिया के प्रत्येक घर के रीति-रिवाज और प्रथा उसके पड़ोसी से भिन्न होती हैं।

माता-पिता अक्सर अपने बच्चों को अपनी संस्कृति और रितिरिवाजों का बोध कराना उचित नहीं समझते जो उनके अपने घरों में चल रहीं हैं और दुसरे समुदाय और समाज के बच्चे इन प्रथाओं और उनकी जरूरत के महत्व और अर्थ को समझते हैं। बच्चा, वयस्क होने पर अचानक बाहरी दुनिया के संपर्क में आ जाता है, उसका शरीर तो वयस्क हो जाता है लेकिन मस्तिष्क एक बच्चे के रूप में ही कार्य करता है। यह एक वयस्क शरीर के साथ एक बच्चे के मस्तिष्क जुड़े होने का मामला है।

यदि अखिला अपने कमरे के साथियों के चरित्र और उनके समय पर प्रार्थना करने से प्रभावित थी, तो यह उसकी अपनी ही बचपन में न दी गई शिक्षा की कमजोरी थी जिसके कारण वह अपने उपर नियंत्रण न रख सकी। वह इन बहनों के अनुशासन से प्रभावित थी और उनका अनुसरण करना चाहती थी। अब अशोकन को एहसास होना चाहिए कि वह और उसकी पत्नी उसकी बेटी के लिए अच्छे आदर्श नहीं हैं। एक हिंदू परिवार में पैदा होने के बावजूद, अखिला की आध्यात्मिकता में अभाव हुआ और जब वह दुसरे धर्म की धार्मिक प्रथाओं से अवगत हुई, तो वह प्रथाएं उसे अच्छी लगीं।

अब, जब अशोकन ने अपनी बेटी को परिवार से दूर होता पाया, तो उन्होंने अपनी बेटी के साथ आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहिए था, यदि वह यह करने में अक्षम थे, तो उन्हे परिवार के बड़ों की मदद लेनी चाहिए थी। यदि अशोकन का परिवार एक अलग शहर में रह रहा था जहाँ आप परंपरा के सभी संबंधों, परंपराओं, आध्यात्मिकता, धर्म और रिश्तेदारी के बंधनों से अलग हो जाते हैं, तो इसके लिए अखिला को दोषी मानना व्यर्थ है। यहां तक ​​कि अगर उसका धर्म परिवर्तन और विवाह कुछ बाहरी लोगों के द्वारा गलत उद्देश्यों के साथ किया गया हो तब दूसरों पर दोष लगाने का क्या मतलब है, जब कोई अपने अधिकार की रक्षा नहीं करता है?

अदालत कानून द्वारा बाध्य है और वह अखिला को उसे अपना भविष्य तय करने के लिए छोड़ देगी। यदि वह अपने पति के पास वापस जाना चाहती है, तो अदालत उसे रोक नहीं सकती।

बेताल: उसके पिता क्या करेंगे?

विक्रमः एक असफल पिता के रूप में, वह अब बुरी परवरिश के खतरों को अन्य माता-पिताओं को समझा सकते हैं। उन्हें अपनी पत्नी के साथ एक मिशन पर निकलना चाहिए और सभी माता-पिताओं को अपने बच्चों को धार्मिक और पारिवारिक प्रथाओं के बारे में जागरूक करने को कहना चाहिए।

Tags: अखिलाकेरललव जिहादहदिया
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