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जिंजी का किला: कैसे शिवाजी महाराज ने बीजापुर सल्तनत से जीत कर इसे एक अभेद्य किला बनाया

Atul Kumar Mishra द्वारा Atul Kumar Mishra
3 November 2017
in इतिहास
जिंजी शिवाजी
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जिंजी का किला तमिलनाडु में दक्षिण आर्कोट जिले के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित हैं। यह अभेद्य किला वर्षो से लगातार राजवंशों के अनेक युध्दों को सहन करते हुए, और इस्लामी सल्तनत से लेकर शक्तिशाली फ्रांसीसी और ब्रिटिश साम्राज्य तक का सामना करता रहा।

तीन पहाड़ियां – उत्तर में कृष्णागिरि, पश्चिम में राजगिरि और दक्षिण पूर्व में चंद्रयानदुर्ग ११ वर्गकिलोमीटर के विशाल त्रिकोणीय दुर्ग परिसर का निर्माण करती हैं। राजगिरी पहाड़ी पर राजा का किला है।

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जिंजी किले में कई बार शक्ति परिवर्तन हुए हैं, इस पर कुरुम्बा (प्रमुखों) ने शासन किया था उसके बाद जिंजी के नायकों जिन्होंने विजयनगर साम्राज्य के जागीरदार के रूप में शासन किया था, ने इसपे शासन किया। इसके बाद बीजापुर सल्तनत ने जिंजी को अपने अधीन कर लिया और फिर मराठों ने इस पर अपना अधिकार जताया। और अंत में ये ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो गया।

जिंजी का किला समय की कसौटियों के सामने भव्यता के साथ खड़ा रहा और कई घटनाओं का साक्षी रहा बाद में यह क्षेत्रीय दंतकथाओं और स्थानीय लोकगीतों के रूप में अमर हो गया।

gingee fort shivaji गिंगी शिवाजी

जिंजी के नायक के साथ साथ, मदुरई और तन्जोर के शासक विजयनगर साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली जागीरदार थे। विजयनगर साम्राज्य के पतन के पश्चात् प्रभुत्व के लिए आपस में कई वर्षों तक चले युद्धों और डेक्कन सल्तनत से युद्ध के बाद तीनों ही राजा अत्यंत कमजोर हो चुके थे।  इन लड़ाईयों से हुई फूट ने इस्लामी आक्रमणों के लिए रास्ते खोल दिए, बीजापुर सल्तनत के रानादुल्लाह खान से अपनी पहली सफलता को हासिल किया था। कई सालो से  इन प्रान्तीय राजाओं में सत्ता के लिए हो रहे संघर्ष के बाद आखिरकार बीजापुर की सल्तनत ने जिंजी पर अपना अधिकार जमा लिया। इसके बाद महान सम्राट क्षत्रपति छत्रपति शिवाजी महाराज के उत्कृष्ट नेतृत्व में मराठाओं ने इसे अपने अधीन कर लिया।

शिवाजी महाराज ने 1677 में अपने दक्षिणी अभियान के दौरान इस किले को अधिकृत कर लिया था। शिवाजी महाराज के सबसे साहसी अभियानों में से एक दक्षिणी अभियान माना जाता है। यह पहली बार हुआ था जब शिवाजी महाराज अपने किले से इतनी दूर गए थे।  शिवाजी महाराज पश्चिमी घाटों और रायगढ़ की राजधानी से दूर अपनी 50,000 सेना के साथ (30,000 घुड़सवार और 20,000 पैदल सेना) दक्षिणी मैदानों में गए थे।

और पढ़े : महाराजा विक्रमादित्य का जीवन परिचय, इतिहास और गौरव कथा

एक जेसुइट पुजारी के कथन के अनुसार “शिवाजी ने 10,000 सैनिकों के साथ जिंजी के पास में चकरावती नदी के किनारे चकरापुरी में अपना डेरा डाला था और जल्द ही किले को अपने अधिकार में कर लिया था। कहा जाता है कि वे उस जगह पर वज्रपात की तरह गिरे और पहले ही आक्रमण में इसे अपने अधिकार में ले लिया।

शिवाजी महाराज  के जिंजी की विजय पर जाने से पहले, रघुनाथ पंत ने रौफ खान और नजीर खान के साथ किले के आत्मसमर्पण के लिए एक गुप्त समझौता किया था और उनकी मदद के लिए उन्हें धन और जागीरें प्रदान की गई थी। इस समझोते की योजना ने बीजापुर सल्तनत के लिए शिवाजी महाराज से मुकाबला करना और भी कठिन बना दिया था।

शिवाजी महाराज अपनी स्थिति को भली प्रकार से जानते थे तभी उन्होंने गोलकोंडा के कुतुब शाही शासकों के साथ अपनी संधि को पक्का करने का निश्चय किया और उन्हें मुग़ल आक्रमणों के खिलाफ अपने राज्य को मजबूत करने के लिए दक्षिणी अभियान की जरूरत के बारे में विश्वास दिलाया।

इस क्षेत्र में  प्रसिद्ध वेनिस यात्री निकोल मनुची ने शिवाजी महाराज के कार्यकलापों और उनकी चढ़ाईयों के बारे में वर्णन किया है। शिवाजी महाराज का अपने हथियारों में जंग लगने देने का कोई विचार नहीं था, उन्होंने गोलकुंडा के राजा को कर्नाटक में अपने अभियान के लिए एक मार्ग देने के लिए कहा था उन्होंने उसे अपने साहस और दृढ़ संकल्प से हासिल किया, जिसे महान जिंजी किला कहते हैं। उन्होंने बीजापुर के कई अन्य किलों पर एक फुर्तीले बाज कि तरह आक्रमण किया।

शिवाजी महाराज के दक्षिणी अभियान की जीत ने उनके सभी समकालीन लेखकों को प्रभावित किया। यद्यपि शिवाजी महाराज की म्रत्यु 1680 में गिंगे किले पर कब्जा करने के तीन साल बाद हो गई थी, परन्तु किले में उनका योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

जुलाई 1678 में आंद्रे फ्र्रेयर का जेसुइट पत्र, शिगी महाराज की जिंजी विजय व अन्य  विजयों के अभिलेखों की पुष्टि करता है, तथा उनके द्वारा की गई किलेबंदी का भी वर्णन करता है। पत्र के अनुसार शिवाजी महाराज ने जिंजी किला को मजबूत करने के लिए हर सम्भव प्रयास किया था। उसके आस-पास गहरी और चौड़ी खाई के साथ व्यापक किले की दीवारों का निर्माण किया गया था। और यह स्थान बहुत ही ठोस और मजबूत बनाया गया था और इसके चारों ओर लंबी घेराबंदी है।

जुलाई 1678 के जेसुइट पत्र से संबंधित प्रासंगिक निष्कर्ष निम्नलिखित हैं-

“शिवाजी ने अपने मस्तिष्क की सम्पूर्ण शक्ति और अपने प्रभुत्व के सभी संसाधनों का उचित तरीके से प्रयोग करते हुए, अपने सभी प्रमुख स्थानों की किलेबंदी करवा दी और उन्होंने जिंजी के आसपास के सभी क्षेत्रों में नए बांधों का निर्माण भी करवाया, इसके साथ-साथ शिवाजी ने खाई खोदवाने और स्तम्भों को खड़ा करवाने आदि सभी कार्यों को ऐसी पूर्णता के साथ को कार्यान्वित किया, कि यूरोपीयन भी शर्मिदा हो जाए।

उपरोक्त लेखों से यह स्पष्ट है कि शिवाजी महाराज ने किले को एक आधुनिक किले के रुप में रूपांतरित किया और इस प्रक्रिया में व्यक्तिगत रुचि दिखाते हुए सभी उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किया। शिवाजी महाराज दूरदर्शी थे और उनके इस कदम के पीछे रणनीतिक उद्देश्य को सीवी वैद्य ने समझाया जो लिखते हैं कि “यह अजीब नहीं है कि शिवाजी ने, अपने उन्नत ज्ञान और उच्च राजनीतिक तथा सैन्य प्रतिभा से यह अनुमान लगा लिया था कि उसे औरंगजेब के साथ जीवन-मृत्यु का संघर्ष अपरिहार्य था और दूर दक्षिण में जिंजी जैसा एक मजबूत और व्यापक किला, पन्हाला और रायगढ़ छीन जाने की सम्भावना के बावजूद, उन्हें आखिरी गढ के रुप में सहारा दे सकता है।”

हिन्दवी स्वराज स्थापित करने के अपने स्वप्न में शिवाजी महाराज को  कई हिंदुओं ने उनकी सहायता की जिसमे मदान्ना का योगदान उल्लेखनीय है। मदाना गोलकुंडा के कुतुब शाही सुल्तान के प्रधान मंत्री थे और शिवाजी के पक्ष में गठजोड़ कर शिवाजी की मदद भी की। मदान्ना ने, कर्नाटक में एक हिंदू साम्राज्य की स्थापना करने के लिए अधिकतम कार्य किया कि यह जानते हुए कि इस योजना से उसकी स्थिति को खतरा हो सकता है और उन्हें कमजोर बना सकता है। मार्टिन के शब्दों में,”मदान्ना का विचार यह था कि दक्षिण क्षेत्र के इस भाग को एक बार फिर हिंदुओं के वर्चस्व में आना चाहिए।”

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जिंजी किले ने मराठा राज्य की सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और यह सब शिवाजी महाराज की दूरदृष्टि तथा मदान्ना और रघुनाथ पंत जैसे सहयोगियों के कारणवश संभव हुआ।

रायगढ़ के पतन तथा संभाजी महाराज के परिवार को बन्दी बनाने के बाद, शिवाजी महाराज के दूसरे पुत्र राजा राम को राजा के रूप में ताज पहनाया गया। उन्होंने अपने दरबारियों की सलाह पर रणनीतिक रूप मे जिंजी को राजधानी के रुप में स्वीकार किया। जल्द ही राजा राम महाराज विशालगढ़ से जिंजी चले गए  तथा ऐसा इसलिए किया गया ताकि मुगलों को एक बहुत बड़े रसद भंड़ार की रक्षा करनी पड़ेगी, जिसके परिणामस्वरुप मराठा सेना को लगातार हमला कर, मुगल सेना को कमजोर करने का मौका मिलेगा।

जिंजी की कहानी, 22 वर्षीय बुंदेला राजकुमार देसिंह की कहानी के बिना अधूरी रहेगी, जो अपने पिता की मृत्यु के पश्चात किले पर अपने पारंपरिक अधिकार की रक्षा के लिए शक्तिशाली मुगल साम्राज्य के खिलाफ लड़े थे। मुगल सेना को पराजित करने में बुंदेलियों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जिंजी का किला हमेशा मराठा साम्राज्य की सुरक्षा, उस महत्वपूर्ण क्षण में, करने के लिए याद किया जाएगा, जब वह सबसे कमजोर था। मुगलों द्वारा इस किले पर कब्जा करने के बाद भी जिंजी का इतिहास समाप्त नहीं हुआ

और पढ़े : Ya Devi Sarva Bhuteshu meaning and significance in Hindi

Tags: गिंगी किलाशिवाजी
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