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क्या गाँधी वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए खतरा थे?

Abhishek Mishra द्वारा Abhishek Mishra
4 December 2017
in इतिहास
गाँधी-ब्रिटिश-साम्राज्य

Lord and Lady Mountbatten with Gandhi

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स्कूल के दिनों में हमने भारत को आजाद कराने वाले लोगों के संघर्ष के बारे में अध्ययन करते हुए, मोहनदास करमचन्द गाँधी के गुणगानों को भी सुना और पढ़ा है। “दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल” यह गीत उनकी प्रशंसा में लिखे गए सैंकड़ो गीतों में से एक है। गाँधी एक युगपुरुष से कम नहीं थे, वे अंग्रेजों के घोर-विरोधी थे और साम्राज्यवादी ताकतों से अपने देश की स्वतंत्रता छीनने का माद्दा रखते थे। लेकिन एक सवाल यह उठता है कि अगर भारत में गाँधी वास्तव में अंग्रेजों के लिए बहुत बड़ा खतरा थे तो अंग्रेज उन्हें अपने रास्ते से हटाना क्यों नहीं चाहते थे?

अंग्रेज अपने शत्रुओं से छुटकारा पाने के लिए नैतिक और अनैतिक दोनों तरीकों का प्रयोग करने के लिए जाने जाते थे। अगर वास्तव में अंग्रेजों को यह लगता कि गाँधी उनके रास्ते में बाधा हैं तो वे उन्हें आसानी से मार कर इस मुद्दे को हमेशा के लिए सुलझा सकते थे और इस बात को दबाने के लिए मीडिया भी उनके नियंत्रण में थी। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

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आइए जानने की कोशिश करें ऐसा क्यों?

अंग्रेज भारत पर लंबे समय तक शासन करना चाहते थे। यूरोपीय देशों ने लाभ पाने के उद्देश्य से विश्वभर में उपनिवेश किया था। भारत में सस्ते श्रम, सस्ते कच्चे माल और एक बड़े बाजार की सुविधा उपलब्ध थी। इसलिए हम यह मान सकते हैं कि अंग्रेजों का इरादा भारत छोड़ने का बिलकुल नहीं था, वे चाहते थे कि ज्यादा से ज्यादा दिनों तक वे भारत पर शासन करें।

अंग्रेजों ने अपने रास्ते में बाधा बन रहे ऐसे किसी भी व्यक्ति को नहीं बख्शा, जो उनके लक्ष्यों और मंसूबों के लिए खतरा थे। ख़ास तौर पर 20वीं शताब्दी में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए, उन्होंने पक्षपाती कानून, भ्रष्ट व्यवहार और अनैतिक तरीकों का प्रयोग करके राजनैतिक हत्याएं भी कीं। ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास खून में लथपथ है। हम जानते हैं कि उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका या भारत में मूल आबादी का क्या हश्र हुआ था।

जैसा कि हमारे इतिहास की किताबें हमें बताती हैं कि भारत में गाँधी, ब्रिटिश साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा थे।

अब इस तथ्य के आधार पर पहले दो बिंदु गलत साबित होते हैं। हम जानते हैं कि अंग्रेज भारत को छोड़ना नहीं चाहते थे और हम यह भी जानते हैं कि अंग्रेजों ने उनके रास्ते में अड़चनें पैदा कर रहे लोगों को बहुत ही आसानी से मार दिया था। लेकिन उन्होंने इसके लिए गाँधी को क्यों छोड़ दिया? जिन्होंने भारत को स्वतंत्रता दिलाई और जो भारत में अंग्रेजी शासन के लिए सबसे बड़ा खतरा माने जाते थे।

इसका तार्किक स्पष्टीकरण केवल यह है कि वास्तव में गाँधी ब्रिटिश साम्राज्य के लिए कोई खतरा नहीं थे।

गाँधी को पाँच बार गिरफ्तार किया गया और उन्हें हर बार बहुत ही कम अवधि की सजा सुनाई गई थी, उनकी सबसे लंबी अवधि की सजा केवल छह साल की थी। इन पाँच बार में चार बार गाँधी जल्दी-जल्दी जेल जाते गए और अविश्वनीय रूप से पूरी सजा काटे बिना ही उन्हें रिहा कर दिया गया। जेल में समय बिताने की उनकी सबसे लंबी अवधि एक साल और दस महीने थी। कैसे अंग्रेज, उस व्यक्ति पर इतना दयावान हो सकते हैं, जिसे पूरा राष्ट्र अपनी आजादी के नायक के रूप में देखता था।

इसमें एक तर्क यह हो सकता है कि गाँधी ने कभी भी कोई कानून नहीं तोड़ा होगा, जिसके लिए उन्हें उम्र कैद या मौत की सजा सुनाई जाती। यह तर्क बिल्कुल गलत है क्योंकि गाँधी ने ऐसे कानून तोड़े थे, जिसके लिए आजीवन कारावास या मौत की सजा का प्रावधान था, लेकिन सोचनीय बात तो यह है कि उनके ऊपर ऐसे कोई आरोप कभी लगाए ही नहीं गए। उदाहरण के लिए, महामहिम (या इंग्लैंण्ड के विरुद्ध) के खिलाफ युद्ध छेड़ना एक धारा थी जो लगभग हर स्वतंत्रता सेनानी पर लगायी गयी, इसमें भगत सिंह (जिन्होंने स्वेच्छा से समर्पण किया) और सावरकर जैसे लोग भी शामिल हैं।

सावरकर, ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के संदेह में विदेश में पकड़े गए थे। हालांकि जब ये भारत से निर्वासित किए जा रहे थे तो इन्होंने भागने की कोशिश की लेकिन ये पकड़े गए और इन्हें दो जन्मों के आजीवन करावास की सजा सुनाई गई। उनके चार्जशीट में “द क्राउन के खिलाफ युद्ध छेड़ने” का उल्लेख किया गया था। उन्हें दुनिया की सबसे खराब जेल काला पानी में भेजा गया, जहाँ कैदी प्रतिदिन अपनी मौत के लिए प्रार्थना करते थे। काला पानी में ग्यारह वर्षों की सजा के बाद उन्हें इस शर्त पर छोड़ दिया गया था कि अब वह भारतीय राजनीति और क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे।

गाँधी को कभी भी इन स्वतंत्रता सेनानियों की तरह सजा नहीं दी गई। बल्कि वह तय अवधि से पहले ही, बिना किसी शर्त के जेल से रिहा कर दिए जाते थे। अगर अंग्रेजों का उद्देश्य भारत न छोड़ने का था और यह भी स्पष्ट था कि गाँधी जी अहिंसक होकर लड़ रहे थे लेकिन फिर भी ये अंग्रेंजों के खिलाफ एक शक्तिशाली युद्ध था, तब भी अंग्रेजों ने कुछ क्यों नहीं किया? गाँधी के नेतृत्व वाला असहयोग आन्दोलन जो कि देशद्रोह के आरोपों का समर्थन करता था फिर भी वे सभी चुपचाप क्यों बैठे रहे और उन्होंने गाँधी द्वारा उनको बाहर क्यों निकालने दिया?

काला पानी की सजा का इस्तेमाल मुख्य रूप से स्वतंत्रता सेनानियों को रोकने के लिए किया जाता था, ताकि लोग उनके बारे में भूल जाएं, क्योंकि उन्हें मारने से वे लोगों के दिलों में शहीद हो जाते थे, जिससे लोग और अधिक हिंसक हो जाते थे। लेकिन गाँधी पर कभी भी देशद्रोह का आरोप नहीं लगाया गया और न हीं उन्हें काला पानी भेजा गया।

गाँधी को एक राजनीतिक कठपुतली कहना निश्चित रूप से अनुचित होगा, लेकिन ऐसा लगता है कि अंग्रेजों ने उन्हें अपने लाभ के लिए उपयोग करने का तरीका ढूँढ़ लिया था। मुझे पूरा भरोसा है कि गाँधी जैसे चतुर, नीतिकुशल और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ को ये ज़रूर पता चल गया होगा कि अंग्रेजी हुकूमत उनके साथ अलग सा व्यवहार कर रही है।

गाँधी ने जनता की राय को प्रभावित किया और फांसी या काला पानी के भय के बिना स्वतंत्रता संग्राम में डटकर लड़ते रहे। यह काफी उल्लेखनीय है। फिर उन्होंने एक मामूली घटना की वजह से असहयोग आंदोलन समाप्त कर दिया, जिसकी आलोचना सुभाष चंद्र बोस सहित कई स्वतंत्रता सेनानियों ने की।

यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि गाँधी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों की सहायता करते थे और अफ्रीका के मूल निवासियों के स्वतंत्रता संग्राम के खिलाफ लड़े थे। उन्होंने भारतीय सैनिको को विश्व युद्ध में अंग्रेजों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। इतिहासकारों ने हमेशा यह बताने असहजता महसूस की  है कि शांति और अहिंसा के दूत ब्रिटिश सेना के लिए भर्ती क्यों कर रहे थे?

क्या गाँधी एक अवसरवादी नेता हो सकते हैं जिनको अंग्रेजों से मदद मिली? 1920 के दशक के दौरान जब गाँधी से इस बारे में पूछा गया तो गाँधी ने विपरीत प्रतिक्रिया व्यक्त की।

उन्हें अंग्रेज शासित भारत के द्वारा केसर-ए-हिंद पदक से सम्मानित किया गया था। एक तरफ उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन किया वहीँ दूसरी ओर और अंग्रेजों के लिए लड़ने के लिए लोगों की भर्ती की (1917-1919)। हमें यह याद रखना चाहिए कि अंग्रेजों ने भारतीय लोगों को सबसे खराब मोर्चे पर भेज दिया था, जहाँ मरने की संभावना बहुत अधिक थी। ज़ाहिर सी बात है कि वे अंग्रेजों को पहले नहीं मरने दे सकते थे!

अंग्रेज हमेशा अपने अधीन किसी राज्य में होने वाले हिंसक विद्रोह के भय में जीवन व्यतीत करते थे। अमेरिका अंग्रेजों की अधीनता से एक हिंसक संघर्ष के माध्यम से १७७६ में आजाद हुआ था। १८५७ का स्वतंत्रता संग्राम भी एक इसी तरह का एक विद्रोह था, अंग्रेजों ने अपना भविष्य देख लिया कि यदि अगर अगला ऐसा ही कोई भीषण आंदोलन हुआ तो वह भारत में और अधिक टिक नहीं पाएंगे। ऐसे में उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो जनता की विचारधारा को बदलकर उनके गुस्से को भटका कर उनका नेतृत्व करे और उनको अहिंसा के रास्ते पर ले जा सके।

हिंसक संघर्ष का मतलब था कि ब्रिटिश राज एक ही महीने के अन्दर साफ़ हो जाता। क्रन्तिकारी यही करना चाहते थे लेकिन गाँधी द्वारा युवाओं को क्रांतिकारियों का अनुसरण न करने के लिए प्रेरित करके उन्हें लगातार कमजोर करने का प्रयास किया गया। इसके लिए गाँधी ने अंग्रेजो के हिंसक अत्याचारों पे बहुत कम बोला लेकिन क्रांतिकारियों के हिंसक संघर्ष पे बोलने के लिए उनके पास बहुत कुछ था।

ये बिल्कुल स्पष्ट था कि अंग्रेज़ चाहते थे कि गाँधी जहाँ तक संभव हो सके, भारतीयों को शांत रखें। जिससे कि आज़ादी को जितने लम्बे समय तक संभव हो, टाला जा सके। गाँधी के उपवासों ने अंग्रेजों पे असर डाला, इसलिए नहीं कि अंग्रेजों को गाँधी की मौत का डर था बल्कि इसलिए कि गाँधी की मौत के बाद भारत में हिंसक संघर्ष शुरू हो जायेगा। स्वयं गाँधी भी इस बात से भलीभांति परिचित थे कि काफी हद तक उन्होंने अपना ये ढोंग कायम भी इसीलिए रखा था। वास्तव में गाँधी का उपवास, हिंसा की एक धमकी थी। उनके समर्थकों द्वारा ये तर्क दिया गया की सशस्त्र संघर्ष से आज़ादी तो मिल जाएगी लेकिन लोकतंत्र बहाल नहीं हो पायेगा और एकता का भी अभाव रहेगा। अमेरिका भी एक हिंसक संघर्ष के बाद पचास राज्यों के संयुक्त देश लोकतंत्र के रूप में स्थापित हुआ।

अंग्रेज़ गाँधी को जिस जगह देखना चाहते थे गाँधी ठीक वहीं पर थे। उन्होंने जानबूझकर या अनजाने में जो कुछ भी किया उससे ब्रिटिश राज को यहाँ बने रहने में मदद मिली। अंग्रेजों को, गाँधी पर राज द्रोह लगाकर कालापानी जेल भेजने, फांसी देने, या उन्हें गुप्त तरीके से मार देने की भी आवश्यकता नहीं थी। उनकी हत्या या फांसी देश को संघर्ष की तरफ धकेल सकती था लेकिन उन्हें कालापानी जेल भेजने से ऐसा कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता, फिर भी अंग्रेजों ने ऐसा नहीं किया। हमें जिस व्यक्ति के बारे में ये पढाया गया कि उन्होंने विश्व के सबसे बड़े साम्राज्य को घुटनों टेकने को मजबूर कर दिया, वो अंग्रेजों के लिए संभवतः कोई खतरा थे ही नहीं। जो लोग वास्तव में उनके लिए खतरा थे उन्हें या तो फांसी दी गयी, गोली मारी गयी, गुप्त तरीके से हत्या कर दी गयी या बहुत लम्बे समय के लिए कारावास की सजा के लिए भेज दिया गया।

एक वकील होने के नाते गाँधी ब्रिटिश कानूनों और नौकरशाही को लगभग सभी भारतीयों से बेहतर समझते थे, जिसे उन्होंने निश्चित तौर पर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। आमजनता में गाँधी वो गाँधी हैं ही नहीं जिन्हें हम लोगों ने जाना और पढ़ा है। उनकी कहानी को उन लोगों ने बदल दिया जो लोग स्वतंत्रता के बाद सत्ता में आये। इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा गया है। उनकी गलतियों की अनदेखी की गई, उनके अतीत को मिटा दिया गया, उनके पाखंड को इतिहास से हटा दिया गया और गाँधी को भारत का राष्ट्रपिता घोषित कर दिया गया। इसका एक उदाहरण है “गाँधी” फिल्म का बनना, जिसे भारतीय राजकोष द्वारा एक तिहाई वित्त पोषित किया गया था। इंदिरा गाँधी और कांग्रेस के प्रमुखतम व्यक्ति इस फिल्म के प्रोडक्शन से पहले के प्रमुख बिन्दुओं के निर्धारण के समय मौजूद थे। कथानक उन्होंने चुना था इसलिए दुनिया ने सिर्फ वही जाना जिसे वे चाहते थे कि दुनिया जाने।

अतः क्या गाँधी वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए खतरा थे? क्या उन्होंने वास्तव में हमें आजादी दिलवाई जैसा कि हमारी पाठ्यपुस्तकों में दावा किया जाता है? क्या उन्होंने अंग्रेजों की सहायता की थी जिसकी वज़ह से अंग्रेज़ उनको नहीं हटा सके? इस निबंध को पढने के बाद आपकी ये जिम्मेदारी बनती है कि आप भी सब कुछ समझने के बाद उत्तर ढूंढें कि क्या गाँधी हमारे लिए खड़े थे या नहीं खड़े थे। आगे और भी सवाल पूछना न भूलें।

Tags: गाँधीब्रिटिश साम्राज्यमहात्मा गाँधी
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प्रभावशाली व्यक्तित्व प्रखर चिंतक, एकात्म मानववाद एवं अंत्योदय दर्शन के प्रणेता दीनदयाल उपाध्याय उनकी वैचारिक दृष्टि आचार व्यवहार से कार्यकर्ता  बहुत कुछ सीखते थे ।...

सरस्वती धरोहर विकास बोर्‍ के उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमिच सरस्वती के उद्गम स्थल पर
इतिहास

मोदी के ‘सेवा संकल्प’ को सरस्वती के पुनरुद्धार से जोड़ रहा हरियाणा, ‘आदि बद्री’ से सभ्यता और संस्कृति को सहेजने की मुहिम

22 September 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन से शुरू हुए सेवा अभियान को हरियाणा में हजारों वर्ष पुरानी सभ्यतागत विरासत से जोड़ने की एक अनूठी पहल की...

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