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महान बल्लेबाज़ लेकिन औसत कप्तान- समय आ गया है कि विराट बेहतर कप्तान के लिए जगह खाली करें

TFI Desk द्वारा TFI Desk
16 July 2019
in मत
कप्तान विराट कोहली

PC: deccanchronicle

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2019 के आईसीसी क्रिकेट विश्व कप में भारत का सफर सेमीफ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड के हाथों 18 रनों की हार के साथ खत्म हो गया।  जहां, कई प्रशंसक सेमीफ़ाइनल में भारतीय टीम के उच्च क्रम के लचर प्रदर्शन से काफी निराश थे, तो वहीं कुछ लोगों ने इसके लिए टीम प्रबंधन और वर्तमान कोच रवि शास्त्री को दोषी ठहराया।

अब कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो विराट कोहली के हाथ से कप्तानी छिन सकती है। पर आखिर ये नौबत ही क्यों आई ही क्यों? क्या विराट कोहली अन्य भारतीय कप्तानों की तुलना में असफल सिद्ध हुये हैं? इस प्रश्न के उत्तर के लिए आइये हम एक नजर डालते हैं भारतीय कप्तानों के कार्यकाल और उनके स्वभाव पर। इसके लिए हमें जाना होगा 1980 के दशक में, जहां 1987 के विश्व कप में सेमीफ़ाइनल में हारने पर भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार ऑलराउंडर कपिल देव को कप्तानी से हाथ धोना पड़ा था। कपिल देव के कप्तानी से हटने के बाद मानो भारतीय टीम में कुशल नेतृत्व का अकाल पड़ गया था, जिसे कार्यवाहक कप्तान के रूप में रवि शास्त्री और कृष्णमचारी श्रीकांत पूरा नहीं कर पाये थे।

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उस समय बीसीसीआई ने प्रचलित बल्लेबाज़ मुहम्मद अजहरुद्दीन को भारतीय टीम की कमान सौंपी। हालांकि 1991 – 2000 के कार्यकाल में मुहम्मद अजहरुद्दीन के नेतृत्व में भारतीय क्रिकेट ने अपना सबसे खराब दौर देखा। गुटबाजी हो, या वंशवाद, या फिर फिक्सिंग कल्चर को ही बढ़ावा देना क्यों न हो, अजहरुद्दीन के कार्यकाल में क्रिकेट को छोड़कर सब देखने को मिला। इसके लिए काफी हद तक स्वयं अजहरुद्दीन भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार थे, क्योंकि उन्होंने भारतीय क्रिकेट की डूबती नैया को पार लगाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए।

मुहम्मद अजहरुद्दीन के हटाये जाने पर कुछ समय के लिए सचिन तेंदुलकर को कप्तान बनाया गया, पर वो एक अच्छे बल्लेबाज़ थे, कुशल कप्तान नहीं। वर्ष 2000 के मैच फिक्सिंग स्कैंडल में जब मोहम्मद अजहरुद्दीन सहित कई भारतीय और अन्य देशों के क्रिकेटरों को दोषी ठहराया गया, और उनपर कार्रवाई की गयी, तब भारतीय क्रिकेट टीम के क्रिकेटर और कुशल कप्तान, दोनों पर से विश्वास उठ गया था। इसके बाद खुद सचिन तेंदुलकर ने खुद ही कप्तानी छोड़ दी क्योंकि उन्हें भी इस बात का एहसास था कि वो एक बेहतर बल्लेबाज हैं परन्तु एक बेहतर कप्तान नहीं. इसीलिए उन्होंने भारतीय टीम की बेहतरी के लिए कप्तानी छोड़ दी. उस समय भारतीय टीम बुरे दौर से गुजर रही थी ।

लेकिन वो कहते हैं न, विपत्ति में ही असली नेतृत्व की पहचान होती है। इसी परिप्रेक्ष्य में 2001 में सामने आये कोलकाता से युवा बल्लेबाज़ सौरव चंडीदास गांगुली, जिन्होंने भारतीय क्रिकेट और कप्तानी, दोनों के ही मायने बदल दिये। जो भारतीय क्रिकेट टीम मैच बचाने के लिए खेलती थी, उसे सौरव गांगुली ने न केवल मैच, बल्कि सीरीज जीतना भी सिखाया।

सौरव गांगुली के नेतृत्व का ही कमाल था, कि फॉलो-ऑन जैसे विकट परिस्थिति में आने के बाद भी भारतीय टीम ने न केवल ऑस्ट्रेलिया की उस समय की बेहद मजबूत टीम के विरुद्ध टेस्ट मैच जीता, बल्कि आगे चलकर उन्होंने इसी सीरीज़ को जीतते हुए कई सीरिज से चल रहे ऑस्ट्रेलिया विजय रथ को भी रोक दिया। इसी तरह 2002 के नेटवेस्ट सीरीज की ऐतिहासिक विजय से सौरव गांगुली ने सिद्ध कर दिया कि कप्तान किसे कहते हैं।

सौरव गांगुली ने कई अभूतपूर्व क्रिकेटरों के उत्थान में बतौर भारतीय कप्तान अपना अहम योगदान दिया, उनकी टीम में वीरेंद्र सहवाग, हरभजन सिंह, युवराज सिंह, ज़हीर खान इत्यादि जैसे क्रिकेटर शामिल थे। इस दौरान सौरव गांगुली ने महेंद्र सिंह धोनी को उनके प्रदर्शन के लिए काफी बढ़ावा भी दिया । सौरव गांगुली को कोच ग्रेग चैपल से अनबन के बाद 2005 में कप्तानी से हाथ धोना पड़ा था।

सौरव गांगुली की कप्तानी से हटने के बाद राहुल द्रविड़ को कार्यभार सौंपा गया। परंतु उनका कार्यकाल औसत ही रहा। राहुल के बाद अनिल कुंबले को कुछ समय के लिए टीम की कमान सौंपी गयी। लेकिन दुर्भाग्यवश उनके कप्तानी के महत्व को कमतर आंका गया। जब 2007 में भारत विश्व कप हार गया था तब कुंबले ने ही अपने नेतृत्व से भारतीय टीम के गिरते मनोबल को ऊपर उठाया था।

अनिल कुंबले ने 2008 में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से सन्यास ले लिया इसके बाद भारतीय टीम का सारा दारोमदार अब महेंद्र सिंह धोनी के कंधों पर आ पड़ा। सच कहें तो सौरव गांगुली के अधूरे सपनों को महेंद्र सिंह धोनी ने पूरा किया, और भारतीय टीम को मजबूती देने में इनकी भूमिका सबसे अहम रही है। सौरव ने भारत को मैच जीतना सिखाया, परंतु एमएस धोनी ने भारत को विश्व क्रिकेट में अपना सिक्का जमाने के लिए प्रोत्साहित किया।

चाहे टी20 विश्व कप दिलाना हो, या फिर आईसीसी टेस्ट चैंपियनशिप का तमगा दिलाना हो, या 2011 में अपने ही देश में भारत को आईसीसी विश्व कप दिलाना हो, या फिर 2013 की आईसीसी चैंपियन्स ट्रॉफी जितानी हो, महेंद्र सिंह धोनी के कुशल नेतृत्व में भारतीय टीम ने अपने आप को किसी भी स्थिति में लड़ने के लिए तैयार टीम में पूरी तरह परिवर्तित किया। सही मायनों में सौरव गांगुली द्वारा स्थापित की गयी इंडियन क्रिकेट की नींव पर महेंद्र सिंह धोनी ने सफलता के नए आयाम लिखे।

अब सवाल ये है कि विराट कोहली को कप्तान क्यों और कैसे बनाया गया ? दरअसल, 2016 में महेंद्र सिंह धोनी कप्तानी से हटना चाहते थे, और तब लगभग सभी अनुभवी खिलाड़ी सन्यास ले चुके थे और उनके अलावा कोई उचित विकल्प नहीं था। रोहित शर्मा भी तब फॉर्म में नहीं थे। ऐसे में विराट कोहली ही उचित विकल्प बच रहे थे। चूंकि विराट के नेतृत्व में भारत ने 8 वर्ष बाद अंडर 19 विश्व कप पर कब्जा जमाया था, और बल्लेबाज़ी के मामले में उन्हे ‘सचिन तेंदुलकर के उत्तराधिकारी’ के तौर पर देखा जा रहा था, इसलिए उन्हें भारतीय टीम की कमान सौंपी गयी।

लेकिन एक अच्छे बल्लेबाज़ होने और एक कुशल कप्तान होने में ज़मीन आसमान का अंतर होता है। कप्तान बनने के बाद शुरुआत के कई मैचों में विराट कोहली काफी असहज लग रहे थे। कई अहम निर्णयों के लिए वे तब भी एमएस धोनी की ओर ताक रहे थे। यहीं से विराट कोहली की कप्तानी पर लोगों को संदेह होना प्रारम्भ हुआ जो अनिल कुंबले के कोच पद से हटाये जाने पर और भी प्रबल हो गया। अनिल कुंबले अनुशासन भरे माहौल में विश्वास रखते थे, और विराट कोहली को उनका सख्त रवैया बिलकुल भी पसंद नहीं था, जिसके कारण इन दोनों में कई बार तनातनी भी हुई।

जब 2017 के आईसीसी चैंपियन्स ट्रॉफी के फ़ाइनल में भारत को पाकिस्तान के हाथों शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा,  इसी कारण अनिल कुंबले को विराट कोहली के अनुरोध के बाद कोच पद से हटाकर रवि शास्त्री को कोच नियुक्त किया गया। लेकिन जबसे भारत को सेमीफ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड से पराजय झेलनी पड़ी, तभी से विराट कोहली की कप्तानी पर सवाल उठाए जा रहे हैं, और साथ ही साथ ये मांग भी उठ रही है कि रवि शास्त्री को भी कोच पद से हटाया जाये।

हाल के समय में ये आरोप लगाए गए हैं कि विराट कोहली अपने पसंदीदा खिलाड़ियों को योग्य खिलाड़ियों की तुलना में ज्यादा प्राथमिकता देते हैं, जिसके कारण टीम के प्रदर्शन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इनमें प्रमुख नाम है युजवेंद्र चहल, के लोकेश राहुल, मयंक अग्रवाल इत्यादि। कुछ लोगों के अनुसार भारतीय टीम की कमजोरी उनकी बेंच स्ट्रेंथ में परिपक्वता की कमी रही है, परंतु इस बार ऐसी कोई समस्या नहीं थी। तो ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि विराट कोहली को अयोग्य खिलाड़ियों को प्राथमिकता देने की क्या आवश्यकता आन पड़ी?

इस पर भी युजवेंद्र चहल को विश्व कप में उनके निरंतर असफल प्रदर्शन के बाद भी चाइनामैन स्पिनर कुलदीप यादव के ऊपर प्राथमिकता दी गयी, जिसका विश्व कप में युजवेंद्र चहल के मुक़ाबले रन बचाने के मामले में काफी बेहतर प्रदर्शन रहा था। इसी तरह शिखर धवन के असामयिक रूप से घायल होने के बाद उनकी जगह पर अंबाती रायुडु अथवा अजिंक्य रहाणे को भी बुलाया जा सकता था, परंतु इन दोनों की जगह के एल राहुल को बुलाया गया।

पूरे लीग मैच में ख़ास प्रदर्शन न करने के बावजूद के एल राहुल पर विश्वास किया गया, और सेमीफ़ाइनल में जब उनकी आवश्यकता पड़ी, तो के एल राहुल फुस्स पड़ गए। यदि बेंच स्ट्रेन्थ मजबूत है, तो उनका प्रयोग न करके आउट ऑफ फॉर्म चल रहे खिलाड़ियों पर अनावश्यक विश्वास जताना कहाँ की समझदारी है? विराट कोहली पर ये आरोप भी लगाया गया है कि वे वनडे क्रिकेट से ज़्यादा लीग क्रिकेट को प्राथमिकता देते हैं।

यही नहीं, जब नॉकआउट मैचों में दबाव में प्रदर्शन करने की बात आती है, तो सौरव गांगुली और एमएस धोनी के मुक़ाबले विराट कोहली काफी असफल साबित हुए हैं। सौरव गांगुली के अंतर्गत भारत ने कई अहम टूर्नामेंट में निरंतर दबाव में भी मुक़ाबले जीते हैं, और एमएस धोनी के नेतृत्व में आईसीसी चैंपियन्स ट्रॉफी 2013 के फ़ाइनल में तनावपूर्ण स्थिति में होने के बावजूद भारत ने इंग्लैंड को 5 रन से हराकर ट्रॉफी पर कब्जा जमाया था।

पर ये इसलिए संभव हुआ क्योंकि सौरव और धोनी के नेतृत्व में भारत का यदि एक क्रम असफल होता था, तो बाकी दो क्रम उसकी कमी को पूरा कर देते थे। परंतु नॉकआउट मैचों में विराट कोहली की टीम में सारी ज़िम्मेदारी पहले की भारतीय टीम की तरह एक बार फिर उच्च क्रम पर ही निर्भर होती है, जिसके कारण बाकी दो क्रमों की देख रेख करने में किसी ने ध्यान नहीं दिया।

शायद यही कारण है कि अजेय टीम कहलाने के बावजूद भारतीय टीम आईसीसी के बड़े-बड़े टूर्नामेंटों में अहम पड़ावों पर मात खा जाती है, जिसके पीछे कई लोग विराट कोहली के नेतृत्व में परिपक्वता की कमी को प्रमुख कारण बता रहे हैं।

सच पूछें तो विराट कोहली में बतौर कप्तान न सौरव गांगुली जैसी परिपक्वता है, और न ही महेंद्र सिंह धोनी जैसा संयम। ऐसे में वर्तमान स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त कमेटी ऑफ एडमिनिस्ट्रेटर्स भारत के आईसीसी विश्व कप के प्रदर्शन की समीक्षा करेगी, और साथ ही साथ कप्तान कोहली और मुख्य कोच रवि शास्त्री को भी पूछताछ के लिए बुलाया गया है। अब देखना यह है कि यह कमेटी दोनों के विरुद्ध क्या कार्रवाई करती है।

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