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90 के दशक की भारतीय क्रिकेट टीम में और आज के हिंदुओं में एक गज़ब की समानता है

TFI Desk द्वारा TFI Desk
28 February 2020
in मत
हिंदुओं
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आपको 90 के दशक की भारतीय क्रिकेट टीम याद है? उस दौरान की टीम शानदार होते हुये भी निष्क्रिय लगती थी। टीम अगर शानदार थी और मैच जीता तो सचिन की मैच जिताऊ पारियों की वजह से नहीं तो रॉबिन सिंह की अंत समय में खेले गए कुछ बेहतरीन इनिंग्स से। यह टीम निष्क्रिय या निष्चेष्ट इसलिए थी क्योंकि टीम को बेसिक्स स्पष्ट नहीं थे। उस टीम में मैच जीतने की वह भूख नहीं थी जिसकी आवश्यकता होती है। आज भारत के हिंदुओं के साथ भी यही समस्या है।

90 के दशक की भारतीय क्रिकेट टीम कई गुटों में बंटी हुई थी। उस दौरान के कप्तान अजहरुद्दीन ने टीम को कई गुट में बाँट दिया था या यूं कहे उनकी नीतियों कr वजह से बंट गयी थी। विपक्षी टीमों ने इसी कमजोरी का फायदा उठाया और भारतीय टीम को हराने में सफल रहीं। वर्ष 1996 में भारत के विश्वकप से बाहर होने और इंग्लैंड दौरे में क्लीन स्वीप के कारण सचिन को कप्तानी सौपें जाने के बाद अजहरुद्दीन की राजनीति और बढ़ गयी थी। जिससे टीम में और फुट पड़ चुकी थी। उस दौरान अज़हर ने जो टीम में किया था वही कांग्रेस और अन्य सेक्युलर पार्टियों ने भारत में हिंदुओं के साथ किया है। आज अगर देश में सबसे अधिक बंटा हुआ कोई है तो वो हिन्दू ही हैं।

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कांग्रेस और अन्य सेक्युलर पार्टियों द्वारा की गयी वोट बैंक की राजनीति जिसे राजनीतिक पंडित सोशल इंजीनियरिंग का नाम देते हैं,  हिंदुओं को आपस में लड़ाते हैं। उदाहरण के लिए जाटों और मीणाओं, ब्राह्मणों और क्षत्रियों, पटेलों और गैर-पटेलों, लिंगायतों और वोक्कालिगा, यादवों और गैर-यादवों, कम्मा और कापू, दलित और उच्च जाति के बीच संघर्ष आज भी जारी है। ये सभी जाति समूह एक ही भगवान की पूजा करते हैं, एक ही त्योहार मनाते हैं और एक ही विचारधारा रखते हैं लेकिन हिंदू विरोधी ताकतों ने इन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया है। आज एक सामान्य हिन्दू, अपने धर्म से अधिक अपनी जाति से पहचाना जाता है। एक जाति पर हमले को या तो नजरअंदाज कर दिया जाता है या मामला उठाया ही नहीं जाता।

कोई अपने आप को एथिस्ट कहने लगा है तो कोई सेक्युलर बता कर अपने आप को हिन्दू नहीं कहना चाहता है।

90 के दशक के बाद वर्ष 2000 में जब अज़हर पर फिक्सिंग का आरोप लगा और सचिन ने कप्तानी लेने से मना कर दिया तब कप्तानी सौपीं गयी प्रिंस ऑफ कोलकाता को। सौरव गांगुली भी 90 के दशक की टीम में मौजूद थे तो उन्हें टीम के अलग-अलग गुटों में बंटे होने की बात पता थी। सौरव ने कप्तानी संभालते ही टीम में सबसे पहले अनुशासन को सुनिश्चित किया। टीम के अनुशासित होते ही एकता अपने आप में आ गई। सीनियर खिलाड़ी हो या जूनियर, टीम में सभी को एकजुट करने के लिए सौरव ने परफॉर्मेंस को आधार बना दिया। जब खिलाड़ियों ने अपने परफॉर्मेंस के साथ-साथ टीम के परफॉर्मेंस पर ध्यान देना शुरू किया तब टीम से गुटबाजी अपने आप समाप्त हो गयी। अज़हर के समय व्यक्तिगत परफॉर्मेंस पर आश्रित रहने वाली टीम अब एक टीम की तरह खेलने लगी और मैच जीतने लगी।

सौरव गांगुली ने टीम में एक नई आक्रामकता का संचार किया जिससे भारतीय टीम ने न सिर्फ अपने देश में जीत दर्ज की बल्कि विदेशी धरती पर भी अपने झंडे गाड़े।

भारतवर्ष में भी प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2014 में चुनाव जीतने के बाद हिंदुओं में यही एकजुटता लाने की कोशिश की। पीएम मोदी ने आक्रामकता के लिए योगी आदित्यनाथ जैसे सक्षम प्रशासक को उत्तर प्रदेश जैसे राज्य का जिम्मा सौंपा। पर गांगुली और पीएम मोदी में अंतर यही था कि गांगुली को बस 11 खिलाड़ियों को देखना था और पीएम मोदी को लगभग 100 करोड़ हिंदुओं को एकजुट करना था।

इसलिए अगर हिंदुओं को एकजुट होना है तो सबसे पहले अपनी बुनियाद या यूं कहें basics सुधारने होंगे, गुटबाजी बंद करनी होगी और एक unit की तरह खेलना शुरू करना होगा।

इसका एक ही समाधान है और वो है धार्मिक दक्षिणपंथ को अपनाना या cultural right बनने की ओर अग्रसर होना क्योंकि दक्षिणपंथ के बाकी रूप धार्मिक दक्षिणपंथ के अंदर ही आ जाती है। एक देश की संस्कृति ही वहाँ की राजनीति तय करती है, और फिर देश की राजनीति, उसकी रक्षा और अर्थव्यवस्था को तय करती है। जैसे ही संस्कृति का उत्थान सही दिशा में होगा वैसे ही बाकी सब कुछ अपने आप सही दिशा में अग्रसर हो जायेगा।

हिंदुओं में किसी भी अन्य धर्म की तुलना में एथिस्ट सबसे अधिक हैं। वास्तव में, कोई अन्य धर्म तो नास्तिक होने की अनुमति नहीं देता है।

अगर आप अपने आप को एथिस्ट कहते हैं और अपने आप को cool समझते हैं, तो मैं आपको बता दूँ कि आप dumb हो, मूर्ख हो। आपको अपने धर्म पर गर्व करना चाहिए। आपको मंदिर जाना चाहिए। आपको संस्कृत सीखना चाहिए। आपको अपने पुजा की फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करनी चाहिए। और सबसे आवश्यक आपको अपने लोगों के साथ घुलमिल कर रहना चाहिए। धर्म छिपाना आपकी मूर्खता का परिचायक है।

एक भीड़ दूसरी भीड़ से ही डरती है। और अगर आप अपने टीममेट्स के साथ नहीं हैं तो आप भीड़ का हिस्सा नहीं बन सकते। अगर आप अपने को सेक्युलर बता कर भीड़ से अलग दिखने की कोशिश करेंगे तो आप की हालत धोबी के कुत्ते की तरह हो जाएगी। आप भले ही इसे mob mentality कहें या इसके लिए किसी अन्य विशेषण का प्रयोग करें लेकिन मैं इसे शक्ति प्रदर्शन कहूँगा। 90 के दशक में जब शिव सैनिक रोड पर निकलते थे तब D कंपनी भी डर से थर-थर काँपती थी।

आज के दौर में भारतवर्ष के हिंदुओं में फूट पड़ी हुई है, किसी को पता नहीं है कि करना क्या है। सभी कोशिश तो कर रहें हैं लेकिन अलग-अलग व्यक्तिगत तरीके से। राजनीति के अजहरुद्दीन ने हिंदुओं को दशकों से बाँट कर अपना उल्लू सीधा किया था, परंतु वर्ष 2014 से राजनीति के गांगुली अपना काम कर रहें हैं पर हमें अपने आप पर काम करने की आवश्यकता है। अपने आप में सुधार लाते हुए हमें एक बैनर के नीचे आना होगा जिसका रंग भगवा है और वह है हिन्दुत्व।

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