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‘ये क्रांतिकारी जज किसके साथ काम करते हैं?’, पूर्व CJI रंजन गोगोई ने एक्टिविस्ट बन रहे रिटायर्ड जजों को बेनकाब किया

ऐसे क्रांतिवीर रिटायरमेंट के बाद ही क्यों सामने आते हैं?

TFI Desk द्वारा TFI Desk
14 May 2020
in मत
रंजन गोगोई
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भारत में अक्सर हमने यह देखा है कि एक जज सेवानिवृत होने के बाद कई प्रकार के एक्टिविजम करने लग जाता है, अलग-अलग  मुद्दों पर तुरंत अपना पक्ष रखने लगते हैं और अन्य क्षेत्रो में एक्टिविजम करने वाले अपने साथियों की मदद करने लग जाते हैं। ऐसे ही रिटायर्ड जजों के खिलाफ पूर्व CJI रंजन गोगोई ने कटाक्ष किया है। उन्होंने सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद न्यायपालिका पर सवाल उठाने वाले जजों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि, “ये एक्टिविस्ट जज किसके साथ काम कर रहे हैं? ये सब कहने के लिए उन्हें कौन प्लेटफॉर्म दे रहा है? इस पर कोई सवाल नहीं पूछा गया।”

दरअसल, पूर्व CJI रंजन गोगोई ने जब राज्यसभा के नामांकन को स्वीकारा था तब कई पूर्व जजों ने सवाल उठाए थे। उन सभी को करारा जवाब देते हुए रंजन गोगोई ने कहा कि, “न्यायाधीशों की एक और श्रेणी है, जो अपने काम के दौरान वकीलों के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करते हैं, और कोई अगर ध्यान दे तो देखेगा कि रिटायरमेंट के बाद भी कुछ चुनिंदा न्यायाधीशों के लिए व्यावसायिक मध्यस्थता कार्य आते रहते हैं”। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (National Law Universities) के पूर्व छात्रों के संघ के जरिए आयोजित एक वेबिनार में बोलते हुए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “मध्यस्थता (arbitration works) कैसे और क्यों केवल कुछ न्यायाधीशों के लिए आती है और दूसरों के लिए नहीं? फिर, इस पर कोई सवाल नहीं पूछा जाता।”

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जस्टिस रंजन गोगोई ने भारत के deep state या यूं कहें कि civil society की ओर इशारा करते हुए कहा कि, “वास्तव में एक न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्तियों की तीन श्रेणियां होती हैं, जिसमें एक “एक्टिविस्ट न्यायाधीशों” की है, दूसरी जो व्यावसायिक मध्यस्थता कर रहे हैं और तीसरी जो अन्य प्रकार के असाइनमेंट को स्वीकार कर रहे हैं।“ जस्टिस गोगोई ने इसी पर सवाल दागते हुए कहा, “आखिर इस तीसरी श्रेणी में आने वाले जजों पर ही क्यों हमला होता है। अन्य दो के बारे में कोई सवाल क्यों नहीं पूछा जाता है?”

जस्टिस रंजन गोगोई का यह बायन यूं ही नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है कि आने वाले समय में देश के भीतर और न्यायपालिका तथा कार्यपालिका में deep state चलाने वाले लोगों के कई और राज़ खुलने वाले हैं। भारत में यह deep state की गहराई मापना मुश्किल है क्योंकि ये समाज के छोटे तबके से लेकर अधिकारी तक फैला है। इस deep state या civil society के सबसे निचले स्तर पर foot soilders होते हैं जैसे दंगे फैलाने वाले, छात्र और नए-नए समाज के विरोध में जाने वाले लोग जिनका ब्रेनवश कर गुमराह किया जाता है और फिर ऊपर बैठे लोग इनका इस्तेमाल सरकार के खिलाफ करते हैं।

यह deep state पत्रकारों के लेकर, एक्टिविस्ट, पूर्व जज, नेता, वकील, ब्रोकर, और न जाने कितने उच्च अधिकारियों के इशारे पर चलता है। इसमें जजों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है क्योंकि समाज उनके शब्दों को कानून के शब्द मानता है और उनपर भरोसा करता है। उदाहरण के लिए वर्ष 2018 में जब 5 जजों ने पहली बार तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी तब कुछ नामी गिरामी पत्रकार जैसे शेखर गुप्ता और वकील जैसे इन्दिरा जय सिंह प्रेस कॉन्फ्रेंस होने से पहले कैसे मौजूद थे? यह प्रेस कॉन्फ्रेंस जब अचानक से हुई तो उन्हें पहले से कैसे पता था और वे उस स्थान पर कैसे मौजूद थे? ये सभी सवाल एक ही ओर इशारा करते हे और वह है मिलीभगत का। पूरे प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, शेखर गुप्ता को न्यायाधीशों के पीछे खड़े देखा गया, और जब पत्रकारों ने जयसिंह से कुछ सवाल किये, तो उन्होंने कहा था कि वह देश के एक नागरिक के तौर पर आई हैं।

रिपोर्ट के अनुसार उसी दिन बाद में, सीपीआई नेता डी राजा ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चेलमेश्वर के आवास का दौरा किया था। इससे स्पष्ट था कि विपक्ष ने इस मामले का राजनीतिकरण करने की भरपूर कोशिश की थी।

हालांकि, रंजन गोगोई भी उन जजों में शामिल थे लेकिन अब गोगोई ने ही इस तरह की जजों, वकीलों और पत्रकारों के मिलीभगत पर अब बोलना शुरू किया है। जस्टिस गोगोई का जजों पर सवाल उठाना दिखाता है कि किस तरह रिटायरमेंट के बाद वे इस deep state के  जाल में फंस जाते हैं जो पूरे भारत में दीमक की तरह फैला हुआ है और देश को अंदर से खोखला कर रहा है।

रंजन गोगोई ने यह भी खुलासा किया कि “कुछ लोग” राम मंदिर के फैसले में भी देरी करवाना चाहते थे। हालांकि, यह तो सभी ने देखा है कि किस तरह से बार-बार प्रशांत भूषण और हर्ष मंदर जैसे लोगों द्वारा PIL डाल कर न सिर्फ कोर्ट का समय नष्ट किया जाता है, बल्कि किसी महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर भी स्टे लगवाया जाता है। इसी तरह से देश में जारी deep state जजों को भी प्रभावित करते हैं और उन्हें अपना ऐक्टिविस्ट बना लेते हैं या वे स्वयं बन जाते है। रंजन गोगोई ने जिस तरह से वकीलों और जजों की किसी मामले को लेकर दोस्ती के बारे में सवाल किया है वह भी जजों के Conflict of Interest को दिखाता है।

भारत में deep state का पर्दाफाश तो रोज ही होता है लेकिन, उसे किसी बड़े अधिकारी का समर्थन नहीं मिल पाता है परंतु जिस तरह से जस्टिस रंजन गोगोई ने अब अपना स्टैंड लिया है और लगातार इस तरह के खुलासे कर रहे हैं उससे अब वह दिन दूर नहीं जब सभी स्वतंत्र अधिकारी खुद अपनी आवाज को बुलंद करेंगे और देश को फिर से स्वतंत्र करेंगे।

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