“ना कुर्सी, ना तम्बू, ना छाँव”, पैंगोंग क्षेत्र की चोटियाँ वापस छीनने के बाद बैठक में हमने उनसे कुर्सी भी छीन ली

“तुम हमसे खड़े रहकर बात करो”

चीन

सौजन्य- एएनआई

हाल ही में लद्दाख के पैंगोंग त्सो झील के दक्षिणी छोर पर स्थित चुशूल क्षेत्र में चीनी सेना ने आक्रमण किया। इसपर भारत ने मुंहतोड़ जवाब देते हुए उनके हमले को विफल किया, जिसके बाद शांति वार्ता के लिए चीन को आगे आने पर विवश होना पड़ा। चुशूल में इसी हमले के बाद शांति वार्ता को ब्रिगेडियर स्तर पर अंजाम दिया गया। लेकिन इस वार्ता के लिए जिस तरह से भारत ने व्यवस्था की थी, उससे एक संदेश स्पष्ट रूप से दिया गया है- हमारे इलाके में गुंडई करोगे, तो हमारे सैनिक आपका आदर सत्कार नहीं करने वाले।

WION की रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में चुशूल में सम्पन्न शांति वार्ता में भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों को खुले आसमान के नीचे शांति वार्ता करने के लिए बाध्य किया। ना चीनी सैनिकों के लिए हट(hut) का प्रबंध हुआ, न उनके लिए तम्बू खड़ा किया गया और न ही उनके लिए कुर्सियों का प्रबंध किया गया। चीन के सैनिकों को खुले आसमान के नीचे शांति वार्ता करने के लिए विवश होना पड़ा, जो निस्संदेह असफल रही।

बता दें कि, गलवान घाटी के हमले के बाद भारत ने एलएसी पर अपनी सुरक्षा व्यवस्था काफी सख्त कर दी है। पर चीन अपनी हरकतों से बाज़ कैसे आए? लिहाजा 29-30 अगस्त की दरमियानी रात को 500 पीएलए सैनिकों ने एक बार फिर एलएसी पार कर भारत के क्षेत्रों पर कब्जा करने का प्रयास किया। लेकिन इस हमले के लिए पहले से ही तैयार भारतीय सेना ने न केवल इस हमले को विफल किया, बल्कि एलएएसी पार कर चीन के कब्जे में स्थित रेकिन घाटी के कालाटॉप क्षेत्र को पुनः भारत में समाहित कर लिया।

पर लगता है कि, भारत इतने पर ही नहीं रुकने वाला। यही कारण है कि, चुशूल में चीन को उसकी असल औकात बताते हुए, शांति वार्ता को बिना किसी सहूलियत के आयोजित कराया गया। सच कहें तो भारत ने यह निर्णय केवल इसलिए लिया, क्योंकि चीन इस गलतफहमी में रहता था कि, भारत अभी भी 1962 का शान्तिप्रिय भारत है, जो अनेकों आक्रमण पर भी पलटवार नहीं करता। लेकिन चीन यह समझ जाए कि यह 2020 का भारत है, जो हमला होने पर पलटवार भी करता है और शत्रु के घर में घुसकर उसे सबक भी सिखाता है।

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