कांग्रेस ने KCR को अपने पॉलिटिकल करियर को खत्म करने की चुनौती दी, KCR ने किया स्वीकार

जानिए, कांग्रेस के उस चुनौती के बारे में जिसके लिए KCR करेंगे खुद को बर्बाद!

केसीआर

जल्दबाजी में चुनौती स्वीकार करना मुसीबत का सबब बन सकता है ये बात शायद तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के प्रमुख और तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव भूल गए हैं। कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने उन्हें दिल्ली दौरे के दौरान किसानों के मुद्दे पर बोलने की चुनौती क्या दे दी, केसीआर के प्रोग्राम में बदलाव आ गया; और अब वो दिल्ली दौरे के दौरान किसानों के अराजक विरोध प्रदर्शन में भी शामिल होंगे। उनके ही राज्य यानी तेलंगाना के ही किसानों को उनका ये काम नाराज़ कर सकता है क्योंकि तेलंगाना में कृषि कानूनों के मुद्दों पर कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हो रहा है। यानी वहां किसान इस कानून से खुश हैं, ऐसे में केसीआर का इस फायदेमंद कानून का विरोध उन्हें अपने राज्य में राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है।

दरअसल, केसीआर पर कांग्रेस लगातार आरोप लगा रही है कि वो अंदरखाने बीजेपी से सांठ- गांठ कर चुक हैं। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस प्रवक्ता दासोजू सरवन ने केसीआर को चुनौती दी है और कहा, “अगर केसीआर दिल्ली दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के घर के बाहर किसानों के समर्थन में आंदोलन करते हैं तो वो मान जाएंगे कि केसीआर बीजेपी विरोधी हैं।” उन्होंने आरोप लगाया, “केसीआर हैदराबाद की सड़कों में बीजेपी के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं लेकिन दिल्ली में उनसे दोस्ती कर रखी है।”

कांग्रेस ने इस मुद्दे पर केसीआर को चुनौती दी और जोश में केसीआर ने ये चुनौती स्वीकार भी कर ली है। खबरों के मुताबिक केसीआर अपने तीन दिवसीय दिल्ली दौरे के दौरान विपक्षी बीजेपी विरोधी पार्टी के नेताओं से मिलेंगे। यही नहीं, वो दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं में चल रहे किसानों के आंदोलन का हिस्सा भी बनेंगे। इस दौरान वो मोदी सरकार द्वारा संसद से पारित कराए गए तीनों कृषि कानूनों का भी विरोध करेंगे। खास बात ये भी है कि उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने की संभावनाएं भी जताई जा रही हैं।

केसीआर पहले ही बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोलते रहे हैं। वो बीजेपी के खिलाफ जितना ज्यादा बोलते हैं, उतना ज्यादा फायदा बीजेपी को होता है। ऐसे में कृषि कानूनों के मुद्दे पर विरोध कर केसीआर अपने लिए मुसीबत खड़ी कर सकते हैं क्योंकि यह बात किसी से छिपी नहीं है कि किसानों का सारा आंदोलन केवल पंजाब और हरियाणा में ही हो रहा है। इसके अलावा पूरे देश में कहीं भी किसानों के आंदोलन की कोई खबर सामने नहीं आई है। छुटपुट घटनाएं केवल राजनीतिक पार्टियों की साजिशों का हिस्सा हैं।

किसान आंदोलन का केवल पंजाब और हरियाणा में सीमित होना बताता है कि पूरे देश का किसान इस कृषि कानून से खुश है, जिसमें तेलंगाना भी शामिल है।  ऐसे में जिस कानून का तेलंगाना के किसान विरोध नहीं कर रहे हैं, ऐसे कानून का विरोध करना और अराजक हो चुके पंजाब और हरियाणा के किसानों के आंदोलन में शामिल होना केसीआर को भारी पड़ सकता है।

पहले ही एआईएमआईएम वाले असदुद्दीन ओवैसी के साथ उनके अघोषित गठबंधन का पर्दा हटने से उनकी मुश्किलें बढ़ गईं हैं, और अब इन अराजक तत्वों के आंदोलन का समर्थन करके केसीआर अपने राज्य की जनता की नजरों में अपनी छवि बर्बाद कर लेंगे, जिसका अंजाम यह होगा कि उनके राजनीतिक पतन की गति पहले से कई गुना तेज हो जाएगी और कांग्रेस की बेहूदा चुनौती के चक्कर में वो अपने किसानों के जनाधार को भी खो देंगे।

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