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1969 में सोवियत ने जो माओ के साथ किया, 2020 में वो गलवान में भारत ने जिनपिंग के साथ कर डाला

दो साल, दो जगह, दो नेता लेकिन नतीजा एक!

Vikrant Thardak द्वारा Vikrant Thardak
10 April 2021
in समीक्षा
गलवान
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पिछले वर्ष मई महीने में लद्दाख के गलवान में भारत और चीन के बीच मुठभेड़ देखने को मिली थी। इस टकराव के दौरान भारत के 20 सैनिकों को वीरगति प्राप्त हुई थी तो वहीं चीन के भी 50 से 55 सैनिकों की मौत हुई थी। इसी वर्ष जिनपिंग के नेतृत्व वाले ने स्वीकार किया है कि लद्दाख हमले में उसके चार सैनिकों ने अपनी जान गंवाई थी। हालांकि, यह भी सच है कि इस आंकड़ों पर सवाल खड़ा करने वाले चीनी नागरिकों और चीन के प्रभावशाली लोगों पर चीनी सरकार ने कार्रवाई की है। हालांकि, यह अपनी तरह का पहला मामला नहीं है जब चीन की सीमावर्ती सेना ने इस प्रकार किसी दूसरे बड़े देश के खिलाफ एकतरफा मोर्चा खोला हो। पूर्व में चीनी सेना सोवियत के खिलाफ भी इसी तरह की आक्रामकता का प्रदर्शन कर चुकी है।

दरअसल, वर्ष 1969 में Ussuri नदी के आसपास के विवादित इलाके में स्थित Zhenbao Island पर सोवियत और चीनी सेना के बीच सीधा टकराव हुआ था। शुरुआत में दोनों पक्षों के सैनिकों के बीच हाथापाई हुई जो बाद में चलकर दोनों पक्षों की ओर से गोलीबारी में बदल गयी। कई हफ्तों तक दोनों ओर से गोलीबारी के बाद Rocket Artilleries तक को मैदान में उतार दिया गया था। इस टकराव के दौरान दोनों ओर से सैकड़ों लोग मारे गए थे और सिर्फ दो ही हफ्तों में चीन और सोवियत के बीच न्यूक्लियर जंग का खतरा मंडराने लगा था।

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बता दें कि चीनी और रूसी इतिहासकर इस बात पर सहमत होते हैं कि वर्ष 1968 से ही चीन की माओ सरकार Cultural Revolution के बाद उपजे घरेलू विरोध को शांत करने और देश में राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा देने हेतु सोवियत के खिलाफ यह हमला करने की योजना बना रहे थे। हालांकि, इसके साथ ही यह भी एक थ्योरी चलती है कि सोवियत के खिलाफ इस जंग में सबसे बड़ा हाथ Mao के टॉप जनरल Lin Biao का था, जिसने खुद से इस टकराव का नेतृत्व किया।

वर्ष 1969 में जो कुछ भी हुआ, उसका एकमात्र मकसद घरेलू राजनीति में CCP के दबदबे को बढ़ावा देना था, ताकि देश में राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा दिया जा सके। हालांकि, न्यूक्लियर जंग के खतरे को देखते हुए तब चीनी सरकार इस विवाद को एक बड़े युद्ध में बदल नहीं पायी। अब अगर इस वाकये को पिछले वर्ष के गलवान हमले से जोड़कर देखा जाये तो समझ में आ सकता है कि पिछले वर्ष किस प्रकार राष्ट्रपति जिनपिंग ने माओ के नक्शेकदम पर चलते हुए भारत के खिलाफ विवाद भड़काने की कोशिश की। वर्ष 1969 में जहां चीन ने सोवियत को निशाना बनाया था तो वहीं वर्ष 2020 में चीन ने भारत को निशाना बनाने की कोशिश की।

करीब 50 साल पहले भी चीन को सोवियत के हाथों मुंह की खानी पड़ी थी तो वहीं पिछले वर्ष भी चीन को भारत के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा। गलवान हमले ने चीनी सेना के इर्द-गिर्द बने उस हौवे को भी समाप्त कर दिया कि चीनी सेना दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में से एक है, क्योंकि युद्ध में अनुभव के नाम पर चीन के पास ज़्यादा कुछ है नहीं! जिस प्रकार सोवियत के खिलाफ जंग छेड़कर वर्ष 1969 में माओ को पछताना पड़ा था, उसी प्रकार वर्ष 2020 में भारत के खिलाफ आक्रामकता को बढ़ावा देकर जिनपिंग को पछताना पड़ा। वर्ष 1971 में माओ को अपने कमांडर Lin Biao को बर्खास्त करना पड़ा था, तो वहीं वर्ष 2020 में जिनपिंग को अपनी Western Theater Command के अध्यक्ष का तबादला करना पड़ा था। दोनों घटनाओं में हमें कई समानताएँ देखने को मिलती हैं।

Tags: गलवानचीनजिनपिंगभारतमाओरूस
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