सीएम पद गया तो कमजोर हो जाएगा कद, उपचुनाव कराने के लिए अब ममता की हताशा और बढ़ गई है

ममता बनर्जी पार्टी

PC: Business Today

जब धरती लगी फटने तब खैरात लगी बंटने…कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहा है जहां कुर्सी हाथ से निकलने पर पार्टी में दो फाड़ होना तय माना जा रहा है। यहाँ पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की बात हो रही है जो सत्ता में तो एक बार फिर आ गई पर जिन परिस्थितियों का सामना अभी पूरी पार्टी कर रही है वो घातक ही नहीं विनाशक हो सकती है। इन घटनाक्रमों के चलते आने वाले दिनों में टीएमसी प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वर्चस्व में तो गिरावट आएगी ही, साथ ही पार्टी भी गुटों में बंट जाएगी। इसी डर में तो आए दिन टीएमसी नेता चुनाव आयोग की परिक्रमा करने में लगे हुए हैं।

गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस के एक प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में चुनाव आयोग (ईसी) के अधिकारियों से मुलाकात की और पश्चिम बंगाल की सात खाली विधानसभा सीटों के लिए जल्द से जल्द उपचुनाव कराने का अनुरोध किया। दिनहाटा और शांतिपुर विधानसभा सीटें भाजपा नेताओं निसिथ प्रमाणिक और जगन्नाथ सरकार द्वारा अपनी संसद सदस्यता बनाए रखने के लिए विधायकों के पद से इस्तीफा देने के बाद खाली हो गई थी।

इसी तरह, मुर्शिदाबाद की समसेरगंज और जंगीपुर सीटों पर राज्य में हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान उम्मीदवारों की मौत के कारण चुनाव नहीं हो सके थे। उत्तर 24-परगना जिले में भी निधन के चलते सीट खाली हो गई थी। गोसाबा सीट भी टीएमसी उम्मीदवार जयंत नस्कर के चुनाव जीतने के बाद खाली हो गई जब उन्होंने जून में कोरोना संक्रमित होने के बाद दम तोड़ दिया था।

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निधन और अन्य विभिन्न कारणों के बीच खाली हुई सीटों पर चुनाव कराना एक सामान्य प्रक्रिया है। वहीं, इसके लिए टीएमसी द्वारा इतनी कौतूहलता उसके भय और ममता के कुर्सी प्रेम का एक मात्र कारण है। इस बार ममता को अपनी कुर्सी जाने का भय तो लग ही रहा है पर उसके जाने के बाद अपनी पार्टी में आंतरिक टूट का भी अंदेशा ममता को होने लगा है।

यह बात सत्य है कि ममता अब तक टीएमसी की रीढ़ हुआ करती थीं, पर दिसंबर 2020 से जबसे पार्टी से नेताओं का इस्तीफा देकर निकलना प्रारम्भ हुआ तबसे थोड़ा ही सही पर ममता को पार्टी बिखरने का खतरा दिखने लगा था। उस दौरान टीएमसी छोड़ने वाले नेताओं में शुभेंदु अधिकारी, सुनील मंडल, दिनेश त्रिवेदी, राजीव बनर्जीबैशाली डालमिया, प्रबीर घोषाल, रथिन चक्रवर्ती और रुद्रनील घोष शामिल थे। वहीं, चुनाव जीतने के उपरांत मुकुल रॉय ने फिरसे टीएमसी में वापसी की योजना बनाते हुए भाजपा छोड़ दी थी।

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ये गहरी शांति के बाद हुआ विस्फोट ही था जो एक के बाद एक टीएमसी नेता पार्टी छोड़ते हुए भाजपा का दामन थामने लगे थे। यही स्थिति ममता को अभी महसूस हो रही है। संविधान के अनुसार, इस साल नंदीग्राम सीट हारने वाली ममता बनर्जी राज्य को मुख्यमंत्री के रूप में चला सकती हैं, लेकिन उन्हें अपने पद पर बने रहने के लिए अगले छह महीनों में निर्वाचित होना होगा। ऐसे में विधानसभा की छह खाली सीटों पर 5 नवंबर, 2021 तक उपचुनाव हो जाना चाहिए। कोरोना संकर्मण की स्थिति को देखते हुए चुनाव आयोग उसी के अनुसार उपचुनावों पर फैसला लेगा। वहीं यदि ममता किसी भी सीट से विधायक नहीं चुनीं जाती हैं तो सीएम का पद तो हाथ से जाएगा ही, पार्टी में प्रभुत्व में धड़ल्ले से कमी आएगी।

यही कारण है कि लोकसभा के पांच सांसद सौगत रॉय, सजदा अहमद और मोहुआ मोइत्रा और राज्यसभा सदस्य सुखेंदु शेखर रे और जवाहर सरकार का प्रतिनिधिमंडल आए दिन चुनाव आयोग से मुलाकात करने का समय मांगते हुए ममता की ओर से याचना करते दिख जाता है।

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सौ बात की एक बात, प्रधानमंत्री बनने के सपने संजो रही ममता बनर्जी अब अपनी पार्टी को गुटों में टूटने और अपने हाथ से सीएम की कुर्सी छूटने के लिए हरसंभव प्रयास करती दिख रही हैं, वहीं तूफान के आने से पहले की शांति को भाँप चुकी ममता अब पार्टी को बचाने और अपने अस्तित्व को जीवंत रख पाने के लिए कमर कसती दिखाई दे रही हैं, जो निश्चित ही ममता की अहंकारी सोच पर चोट है।

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