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डेरा डालने के लिए गैर-इस्लामी मुल्क ही क्यों चुनते हैं मुस्लिम प्रवासी

इन शरणार्थियों द्वारा अपने देश को छोड़ने का कारण ये कि अधिकांश मुस्लिम देश में जीवन नर्क समान है और अधिकार ना के बराबर।

Aniket Raj द्वारा Aniket Raj
20 August 2021
in समीक्षा
डेरा डालने के लिए गैर-इस्लामी मुल्क ही क्यों चुनते हैं मुस्लिम प्रवासी
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तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर जबरदस्ती कब्जा करने से दुनिया भर में यह आशंका पैदा हो गई है कि यह इस क्षेत्र में मानवीय आपदा को जन्म दे सकता है। जैसा कि 2011 में सीरिया में गृहयुद्ध की शुरुआत के बाद हुआ था, अब यह माना जा रहा है कि यह संकट यूरोप और उत्तरी अमेरिका में प्रवासी संकट को बढ़ा सकता है। आंकड़ों से पता चलता है कि सीमाओं के पार विस्थापित होने वाले अधिकांश शरणार्थी मुस्लिम देशों से आते हैं।

भारत में भी विस्थापितों और शरणार्थियों का पुराना इतिहास रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदीजी द्वारा 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका दिवस मनाने की अपील की गयी। इसका मुख्य उद्देश्य आज़ादी के समय के शरणार्थी संकट और उसके विभीषिका को रेखांकित करना था। भारत ने बांग्लादेशी मुसलमान, रोहिंग्या, विस्थापित तमिल मुस्लिम, के शरणार्थी संकट को झेला। इसके साथ-साथ इस्लामिक देशों में धार्मिक प्रताड़ना के कारण हिन्दू, सीख, जैन, पारसी, ईसाई और यहूदियों का भी खूब पलायन हुआ। भारत ने सभी को स्वीकार किया। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल ये है कि मुस्लिम आखिरकार भारत जैसे गैर-मुस्लिम देश में ही शरण क्यों लेते है? इसके कुछ ठोस कारण है परंतु पहले कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं।

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तेल, हीरे और हिंदुस्तान की नई भू-राजनीति: जब अफ्रीका की धरती पर एक साथ गूंजेगी भारत की सभ्यता, रणनीति और शक्ति की आवाज

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यूएनएचसीआर के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2019 के अंत तक रिकॉर्ड 79.5 मिलियन लोग विस्थापित हुए थे। 45.7 मिलियन अपने ही देशों में विस्थापित हुए हैं और बाकी ने कहीं और शरण ली है। देखा जाए तो दुनिया भर में दो तिहाई से अधिक शरणार्थी सिर्फ पांच देशों से आते हैं: सीरिया, अफगानिस्तान, दक्षिण सूडान, म्यांमार और सोमालिया। वर्ष 2015 में लगभग आधे शरणार्थी सिर्फ तीन देशों: सीरिया (378,000), अफगानिस्तान (193,000) और इराक (127,000) से हैं। अर्थात,अधिकांशतः शरणार्थी मुसलमान होते हैं। जो थोड़े बहुत बचते हैं वो मुस्लिम भले न हो लेकिन आते मुस्लिम देश से ही हैं। इस साल अमेरिका में प्रवेश करने वाले लगभग आधे शरणार्थी मुस्लिम हैं। अमेरिका ने सबसे अधिक मुस्लिम शरणार्थियों को स्वीकार किया है। गंतव्य देशों में, एक साथ शरण चाहने वालों के आधे से अधिक आवेदान जर्मनी (4,42,000 आवेदन), हंगरी (1,74,000 आवेदन) और स्वीडन (1,56,000 आवेदन) ने प्राप्त किए।

50 से अधिक ‘इस्लामी राष्ट्र’ होने के बावजूद, दुनिया भर के मुसलमान पश्चिमी देशों में बसने के इच्छुक रहते हैं। Jcpa.org की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि लगभग 166 मिलियन लोग, जिसमें बड़े पैमाने पर मुस्लिम हैं वे अमेरिका में प्रवास करने के इच्छुक हैं। साथ ही, उनमें से लगभग 46 मिलियन यूनाइटेड किंगडम और 39 मिलियन फ्रांस में प्रवास करने के इच्छुक हैं। इससे यह स्पष्ट है कि दुनिया भर के मुसलमान गैर-मुस्लिम देशों में ही बसना पसंद करते हैं।

इन शरणार्थियों द्वारा अपने देश को छोड़ने का कारण ये कि अधिकांश मुस्लिम देश में जीवन नर्क समान है और अधिकार ना के बराबर। औरतों का नहीं सम्मान है और न ही अधिकार प्राप्त है। नागरिक अधिकार तो लगभग नगण्य ही है। अगर कुछ है तो वो है गृह युद्ध, अराजकता और नरसंहार। हालिया उदाहरण अफगानिस्तान का ले सकते है। तालिबान द्वारा कब्जा के बाद अब वहाँ के मुस्लिम दूसरे देश पलायन कर रहे हैं और भारत, अमेरिका तथा यूरोप जैसे देश जाना चाहते हैं। उदाहरण के लिए जिस तरह से अफगानी अमेरिकी लोगों को ले जा रहे प्लेन से लटके हुए थे उससे यह स्पष्ट भी होता है।

समस्या यह है कि विस्थापन करने वाले मुस्लिम भी जहां जाते हैं वहाँ अपनी कट्टर विचारधारा और जीवन पद्धति को अपने साथ दूसरे देशों में प्रवेश करते हैं। यही नहीं वहाँ शरण लेकर उसी देश की संस्कृति पर अपनी कट्टर जीवन पद्धति को थोपने का प्रयास करते हैं तथा उसे तहस-नहस कर देते हैं। 19वीं सदी में मुसलमानों ने मुल्क जीतने के लिए मजहब का इस्तेमाल किया लेकिन 21वीं सदी में वो देश जीतने के लिए शरणार्थी संकट का इस्तेमाल कर रहें हैं। अगर यह कहा जाए कि वे गैर-मुस्लिम देश मे शरणार्थी के तौर पर प्रवेश करते हैं और चरणबद्ध तरीके से इसे साकार करते हैं। ऐसे उदाहरण भी हैं जहां इस सामूहिक प्रवास को कुछ देशों, विशेष रूप से तुर्की द्वारा अपने भू-राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए हथियार बनाया गया है। इस्लाम यूरोप में सबसे तेजी से बढ़ने वाला प्रमुख धर्म है, मुख्य रूप से मुसलमानों के बीच आप्रवास और उच्च प्रजनन दर के कारण। पश्चिमी एशिया और अफ्रीकी महाद्वीप में लगातार उथल-पुथल की स्थिति के साथ, सीरिया और लीबिया जैसे मुस्लिम देशों के अप्रवासी पश्चिमी यूरोप, विशेष रूप से जर्मनी, फ्रांस और बेल्जियम में शरण लेते हैं।

और पढ़ें: 1996 में, UAE और सऊदी तालिबान का समर्थन करने वाले पहले देश थे, इस बार ऐसा नहीं होगा

जनसांख्यिकीय अधिग्रहण

समान्यतः मुस्लिमों में उच्चा प्रजनन दर होती है। बच्चों को वो अल्लाह का वरदान तथा परिवार नियोजन को इस्लाम के खिलाफ मानतें हैं। यही कारण है कि वे किसी देश के जनसांख्यिकीय संतुलन असामान्य कर देते हैं तथा एक के बाद एक क्षेत्र में जनसांख्यिकीय अधिग्रहण करने में सफल होते हैं। लोकतन्त्र बहुमत से चलता है। इसीलिए मुसलमान लोकतान्त्रिक शासन को इस्लामिक शासन में बदलने के लिए अपनी जनसंख्या बढ़ाते हैं। चाहे व प्रजनन से हो या फिर दूसरे देश से आए अवैध घुसपैठियों को पनाह देने से हो। उदाहरण के तौर पर हम भारत को ले सकते हैं। सीएए कानून, जनसंख्या नियंत्रण कानून और एनआरसी इन्ही आशंकाओं से उपजे कानून हैं।

और पढ़ें: सनातन धर्म, हिंदू संस्कृति और भारत को कलंकित करने के लिए एक वैश्विक अभियान प्रारंभ हो चुका है

विशेष समूह के रूप मे पहचान

जब ये जनांख्यिकी रूप से थोड़े सशक्त होते हैं तब धीरे-धीरे अपनी संस्कृति को उस देश में थोपना शुरू करते हैं। जर्मनी हो या लंदन आज मुस्लिम शरणार्थी यूरोपियन संस्कृति पर अपना प्रभाव कई गुना बढ़ा चुके हैं। पर्सिया जिसे आज का ईरान कहा जाता है, वह भी इस संदर्भ का सार्थक उदाहरण है। जनसांख्यिकीय अधिग्रहण के बाद ये एक समुदाय के रूप में अपनी विशेष पहचान के लिए लड़ने लगते हैं। देश के कानून को नकार कर शरीय शासन की मांग करते हैं। वहाँ की व्यवस्था से संघर्षरत रहते है तथा इस्लाम के आगे देश को गौण मानते हैं। भारत में समान आचार संहिता का विरोध, शहबानों प्रकरण, तीन तलाक और रोड पर नमाज़ इत्यादि इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं।

अल्पसंख्यक, धर्मनिरपेक्षता और सहानुभूति

जब वो अपनी विशेष पहचान कायम कर लेते हैं तब शुरू होता है धर्मनिरपेक्षता और सहानुभूति का दौर। उदाहरण के लिए फिर से भारत की ओर देखिये। जिन मुसलमानों ने वर्षों तक राज़ किया आज़ादी के समय उनमें ही सबसे अधिक असुरक्षा की भावना प्रबल हुई जबकि सालों से सताये गए दलित और आदिवासियों ने भारत को स्वीकार किया। जो मुसलमान यहाँ रह गए उन्होंने ने भी अल्पसंख्यक की हैसियत से देश का बेड़ा गर्क किया। छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपनी नाजायज मांगे मनवायी। तुष्टीकरण की राजनीति को बढ़ावा दिया। राष्ट्रहित को अल्पसंख्यक अधिकार के आगे तिलांजलि दी और तो और इस ‘’माइनॉरिटि स्टेटस’’ पर एकाधिकार कर लिया ।

और पढ़ें: काबुल के पतन से भारत को यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि उसका भी कोई सहयोगी नहीं है

ये सारी सुविधाएं, नाजायज मांगे और अंत में उस देश पर एकाधिकार कर लोकतन्त्र को ध्वस्त करके इस्लामिक शासन को बर्बर रूप में स्थापित करने की सुविधा सिर्फ गैर-इस्लामिक देश में ही मिलेगी। यदि पश्चिमी दुनिया इस आक्रमण से बचना चाहती है, तो उसे अपने देशों में मुस्लिमों के बढ़ते खतरे के प्रति जागना होगा।

 

 

Tags: अमेरिकायूरोप
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