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तानाशाही के मामलें में राहुल गांधी Modern इंदिरा गांधी हैं

Aniket Raj द्वारा Aniket Raj
1 October 2021
in समीक्षा
इंदिरा गांधी तानाशाही
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वंशवाद स्वार्थ को जन्म देता है। स्वार्थ लालच, सनक और चाटुकारिता को और यही सनक और चाटुकारिता तानाशाही में परिवर्तित हो जाती है। इसी तानाशाही से चाटुकारिता, अयोग्यता और अनैतिकता का सृजन होता है। अगर इस प्रक्रिया को शब्दों के आवर्तों के कारण आप नहीं समझ पा रहें है तो नेहरू गांधी परिवार की ओर देखिये। लोगों के मन में एक सामान्य भ्रांति रची बसी है कि नेहरू के कारण भारतीय राजनीति में वंशवाद का उदय हुआ जबकि नेहरू ने तो इसे विस्तारित किया और इन्दिरा ने इसे चरमोत्कर्ष तक पहुंचाया। आज उसी राह पर राहुल गांधी भी चल रहे हैं। ऐसे में उन्हें आज की इंदिरा गांधी कहा जाये तो कुछ गलत नहीं होगा। राहुल गांधी इंदिरा गांधी की तरह ही पार्टी में लोकतंत्र की बजाय फेवरेटिज्म को महत्व देते हैं। अमरिंदर सिंह का सीएम पद छीनना और सिद्धू का पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाना भी उसी का हिस्सा है।

असल में तो इसकी नींव मोतीलाल नेहरू और मोहनदास करमचंद गांधी ने रखी थी। जवाहरलाल नेहरू अयोग्य और अक्षम थे, सरदार वल्लभ भाई पटेल योग्य और सक्षम थे। इतिहास में सरदार वल्लभ भाई पटेल की क्षमता के बहुतेरे प्रमाण मिलते है, जैसै जम्मू-कश्मीर विलय और ऑपरेशन पोलो।  इन क्षमताओं के बावजूद चाटुकारिता में निपुणता का पुरस्कार नेहरू को मिला और स्वाभिमान और योग्यता का दुत्कार सरदार वल्लभ भाई पटेल को। इसमें गांधी का भी स्वार्थ निहित था, नेहरू सत्ता चाहते थे बिना किसी विवाद और विरोध के और गांधी सत्ता पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण चाहते थे बिना ज़िम्मेदारी और अपने तथाकथित आदर्शों पर प्रश्नचिन्ह के। दोनों ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को दरकिनार करते हुए सत्ता आपस में बाँट ली और जब कुछ लोग नहीं मानें तो देश बाँट दिया पर अपनी सत्ता को नहीं बटनें दिया।

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तानाशाही के उदय में समानता

जवाहरलाल नेहरू द्वारा इंदिरा गांधी की जिद पर डेमोक्रेटिक कम्युनिस्ट सरकार को गिराकर केरल में राष्ट्रपति शासन लगाना और संविधान में 9वीं अनुसूची जोड़कर उसे न्यायपालिका के परिधि से बाहर करना लोकतन्त्र को अप्रत्यक्ष राजशाही में परिवर्तित करने की पहली बीज थी। सरदार और लाल बहादुर शास्त्री के देहावसान ने इस बीज को विषवृक्ष में परिवर्तित कर दिया। इसके बाद इस वंशवाद के विषवृक्ष से विषफल निकलने लगे जिसमें प्रमुख है- तानाशाही, चाटुकारिता, निरंकुशता, महिमामंडन, आपातकाल, केन्द्रीकरण और मानमर्दन का युग। इसी मानमर्दन और चाटुकारिता ने ‘गूंगी गुड़िया’ को ‘दुर्गा’ और फिर स्वयं ‘भारत’ में परिवर्तित कर दिया; जो इस मानमर्दन और चाटुकारिता में शामिल नहीं हुआ उसे उखाड़ कर फेंक दिया गया, जैसे मोरारजी देसाई, कामराज और S. Nijalingappa (एस. निजलिंगप्पा)। इंदिरा गांधी अयोग्य, अक्षम और अनुभवहीन होते हुए भी आज़ादी के समय के वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई को पीछे कर प्रधानमंत्री बनी ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को पीछे कर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया। इंदिरा गांधी का इतने से भी मन नहीं भरा। कांग्रेस पार्टी की सरकार होने के बावजूद राष्ट्र हितों को ताक पर रखते हुए उन्होंने पार्टी को दो भागों में बांट दिया जिसका नाम इन्दिरा(आइ) और दूसरे दल का नाम इन्दिरा (जे) पड़ा।

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चाटुकारिता में समानता

इन्दिरा (आइ) उनके वस्तुतः उनके चाटुकारों का समूह था जो इंदिरा गांधी के तानाशाही को सुरक्षित रखने को प्रतिबद्ध थे जैसे मोतीलाल वोरा, जॉर्ज फर्नांडीस, सिद्धार्थ संकर रे (बंगाल के मुख्यमंत्री जिन्होंने आपातकाल का सुझाव दिया) और बंसीलाल जिन्होंने लोकतन्त्र खतम कर शाश्वत इन्दिरा शासन का सुझाव दिया और राजकुमार संजय को उनकी मारुति कार बनाने की बाल हाथ हेतु जमीन दी। दूसरी ओर वो नेता जो उनके निरंकुशता से संवैधानिक संस्थाओं को बचाने हेतु कटिबद्ध थे जैसे मोरार जी, कामराज और जैल सिंह जिन्हें उखाड़ फेंका गया। ठीक उसी तरह जैसे राहुल गांधी के चाटुकारिता में लिप्त अजय मांकन, रणदीप सिंह सुरजेवाला, मनमोहन, गहलोत और सिद्धू बार-बार पुरस्कृत होते रहे और प्रणब, ज्योतिरादित्य, सचिन, नितिन और अमरिंदर  जैसे नेता तिरस्कृत होते रहे।

निरंकुश शासन पद्द्ति में समानता

चाटुकारों के माध्यम से जब पार्टी पर कब्जा हो गया तब पार्टी के माध्यम से देश के संवैधानिक संस्थानों पर कब्जा करने की शुरुआत हुई। संविधान परिवर्तन का दौर शुरू हुआ, अध्यादेश पारित करने कर संसदीय कार्यवाहियों को ध्वस्त किया गया। अपने गुलामों के दल से इन्दिरा ने सर्वप्रथम संविधान के मूल संरचना को ही बदलने का प्रयास किया। यह बदलाव इतने व्यापक पैमाने पर हुआ कि उसे शब्दों में समेटना संभव नहीं है। 42वें संविधान संशोधन को तो लघु संविधान का दर्जा दिया गया। यह निर्णय इतना क्रूर और विभात्स था कि इसको बचाने हेतु न्यायपालिका को आगे आकर केशवानन्द भारती केस में संविधान के आधारभूत संरचना का सिद्धान्त प्रतिपादित करना पड़ा और इसको सुधारने हेतु जनता पार्टी को 44वां संशोधन करना पड़ा। संविधान का सारांश-प्रस्तावना तक को नहीं छोड़ा गया। एक तरफा फैसले लेकर प्रिवी पर्स, राष्ट्रीयकरण, लाइसेंस राज और लालफ़ीताशाही को वैधता प्रदान की गयी। राहुल गांधी का व्यक्तित्व भी शत प्रतिशत ऐसा ही है। कठपुतली और मूक मनमोहन के माध्यम से संवैधानिक संस्थाओं को कुचला गया। बड़े पैमाने पर अध्यादेश पारित किये गए। CBI को सरकारी तोता बनाया गया। CBI छोड़िए प्रधानमंत्री तक को पिट्टू बना लिया गया।

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महिमामंडन में समानता

विडम्बना देखिये, दोनों के महिमामंडन और सिद्धांतों में भी समानता थी। 1971 की भारत-पाक जंग जिसे भारतीय सेना ने Sam Manekshaw (सैम मानेकशॉ) के करिश्माई में जीता उसका भी श्रेय भी इन्दिरा गांधी को दे दिया गया जबकि द्विचित प्रवृति के ये कांग्रेस नेता बलकोट के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाने हेतु मोदी का मानमर्दन करते हैं। इससे भी आगे बढ़ते हुए ‘इन्दिरा ही भारत है और भारत ही इन्दिरा’ का नारा भी दिया गया। इन्हें दुर्गस्वरूप भी बताने की कोशिश की गयी जिसे अटल बिहारी ने खारिज कर दिया। वामपंथी इतिहासकारों ने पुस्तकों के पृष्ठ इनके और मुग़लों के गौरवगाथा से भर दिए। ठीक इसी तरह राहुल जैसे अनुभवहीन और राजनीतिक रूप से अज्ञानी व्यक्ति को आज भी इस सबसे पुराने दल ने सिर पर बैठा रखा है। इनके कृत्य से कांग्रेस का अस्तित्व खतरे में है, लेकिन मजाल है कोई इस राजकुमार के खिलाफ कुछ बोल दे। सारे नेता नतमस्तक और दंडवत रहतें हैं और सारे परियोजनाओं पर इनके परिवार का नाम लिखतें है। आपको राजकुमार का राज्यारोहण तो याद ही होगा जब उन्होंने अध्यक्ष पद पर निर्विवाद रूप से चुने जाने के बावजूद भी कैसे अपनी करुण कथा सुनाई थी। जब अगली पंक्ति में बैठे वरिष्ठ नेता भी उनकी इस व्यथा और करुण कथा पर नकली आँसू बहा रहे थे ताकि राजकुमार के प्रति अपनी वफादारी साबित की जा सके।

पतन में समानता

आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि इनके पतन में भी एक आधारभूत समानता और एक निर्णायक अंतर था। यही अंतर भ्रम और मिथ्या को निर्मित करता है और इतनी समानताओं के बावजूद भी हम इन्दिरा और राहुल के व्यक्तिव में मूलभूत अंतर करने की भूल कर बैठते है। दोनों का पतन हमारे संवैधानिक शासन के अंगों ने ही किया। इन्दिरा का पराभव न्यायपालिका ने तो राहुल का पतन विधायिका और जनता नें किया। सत्ता की सनक और ताकत की हनक में चूर इन्दिरा को जब न्यायपालिका ने केशवानन्द मामले में चुनौती दी तब इन्दिरा न्यायपालिका पर नियंत्रण को आतुर हो उठी। इंदिरा गांधी सम्पूर्ण और प्रत्यक्ष तानाशाही चाहती थीं इसिलिए सरकार का पक्ष लेने वाले जजों के नेतृत्वकर्ता ए एन रे को अनुभवहीन होने के बावजूद मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। वो तो भला हो न्यायपालिका का जो हंसराज खन्ना ने न्याय और नैतिकता का सर्वोच्च उदाहरण पेश करते हुए त्यागपत्र दे दिया और सभी न्यायाधीशों ने भी केशवानंद मामले को पलटने के विरोध में सामूहिक त्यागपत्र देने की धमकी दी। न्यायपालिका जब नहीं झुकी तो आपातकाल लगा दिया गया। आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि सबसे बड़ी पार्टी से समर्थित राष्ट्रपति उम्मीदवार एक प्रधानमंत्री के अभियान के कारण हारा और उपराष्ट्रपति को पद पर रहते चुनाव लड़ा राष्ट्रपति बनाया गया। न्यायपालिका, विधायिका, विरोधी और यहां तक कि खुद अपने पार्टी के नेताओं का ना तो आपातकाल के बारे में सूचना दी गयी, बल्कि लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से विरोध करने पर मीसा लगा क्रूर यातनाएँ दी गयी। परंतु, न्यायपालिका का पराक्रम ही था जो इन परिणामों की परवाह ना करते हुए ना सिर्फ राजनारायन के साथ उनके चुनाव को खारिज किया अपितु 6 साल के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंधित भी लगा दिया। इंदिरा गांधी के इतने कारनामों के बावजूद अपने पीआर के कारण एक मजबूत नेत के रूप में उभरीं जिसका कारण एक कमजोर विपक्ष भी था। हालांकि, राहुल जिन्हें हम मॉडर्न इंदिरा का टैग दे रहे उनके समय में एक मजबूत विपक्ष और सोशल मीडिया के विस्तार ने उनको उनकी अक्षमता के कारण पप्पू बनाकर रख दिया।

और पढ़ें: Reliance के अधिग्रहण से Future Group को बचाने का Amazon का दांव हुआ फेल, NCLT ने बिगाड़ा बना बनाया काम!

राहुल के समय में जनता अब उतनी मूर्ख नहीं थी। इनके सारे काली करतूतों से अवगत थी। सुचना के दौर ने इस काम को और भी सरल कर दिया। लोगों ने परिवार भक्ति छोड़ दी। उन्हे समझ आ गया कि जितना गांधी परिवार ने राष्ट्र को दिया राष्ट्र ने उनको इससे कहीं ज्यादा दे दिया। 70 साल तक शासन से नवाजा। लोगों ने कहा बस अब बहुत हुआ। अयोग्यता और छद्म धर्मनिरपेक्षता को नकार कर  योग्यता और राष्ट्र सर्वोपरि के सिद्धान्त को चुना गया अर्थात पीएम मोदी को चुना गया। हालांकि, अभी तक कांग्रेस का स्थायी अध्यक्ष का ना चुना जाना वंशवाद और तानाशाही को ही दर्शाता है। हमें एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते इसपर चिंतित होना चाहिए। देश की इस सबसे पुरानी पार्टी पर एक परिवार का वर्चस्व एक सशक्त विपक्ष की आवश्यकताओं को नकारती है। एक मजबूत विपक्ष नितांत आवश्यक है। अतः ये कांग्रेस का अंदरूनी मसला न होकर  पूरे देश की चिंता है और लगता है की राहुल गांधी अपने तानाशाही के कारण इस चिंता की चिता सजा देंगे।

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