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CM योगी द्वारा अखिलेश को “दंगेश” कहे जाने के पीछे कई भयंकर कारण है!

कर्म आधारित नामकरण किया है योगी आदित्यनाथ ने!

Utkarsh Upadhyay द्वारा Utkarsh Upadhyay
28 February 2022
in राजनीति
CM योगी द्वारा अखिलेश को “दंगेश” कहे जाने के पीछे कई भयंकर कारण है!

SOURCE- GOOGLE

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किसी भी राज्य में शासन व्यवस्था को उसकी स्वास्थ्य प्रणाली, कानून और अन्य कुछ अहम बिंदुओं को मद्देनज़र रखते हुए आँका जाता है। उत्तर प्रदेश में हमेशा से कानून सबसे बड़ा मुद्दा रहा है क्योंकि यहाँ के क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा की आड़ में राज्य के लॉ एंड ऑर्डर की बखियां उधेड़ने का काम करते थे। समाजवादी पार्टी समर्थकों की गुंडई से उत्तरप्रदेश परेशान रहा है। उन्हीं पुराने दिनों को आधार बनाते हुए हाल ही में रायबरेली चुनाव प्रचार के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर तीखे हमले करते हुए, उनके शासन में हुए दंगों को जोड़ते हुए उनका नाम “दंगेश” रख दिया है।

प्रचार में सभा को संबोधित करते हुए सीएम योगी ने अखिलेश को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि- “तुम तो दंगावादी हो, तुम्हें तो आग लगाना आता है। तुम्हारा नाम समाजवादी नही दंगावादी होना चाहिए। जिस तरह रामायण सीरियल में एक नाम लंकेश का होता है, उसी तरह इनका नाम दंगेश होना चाहिए, क्योंकि यह दंगा कराते हैं।”

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अखिलेश यादव के गृह प्रवेश में जाने से काशी के पंडितों ने किया इनकार, जानें क्या है मामला?

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बुधवार को सलोन विधानसभा क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी अशोक कुमार कोरी के समर्थन में चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे। इस बयान के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तिलमिला उठे, जिसके बाद ‘दंगेश’ सुनते ही सपाइयों का पारा चढ़ गया। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में अखिलेश के कार्यकाल में इतने दंगे हुए थे जो सीएम योगी ने उन्हें “दंगेश” की संज्ञा दे डाली? उत्तर है हाँ!

और पढ़ें- चुनाव से पहले ही UP हार चुकी है समाजवादी पार्टी

आंकड़े झूठ नहीं बोलते साहब!

2017 में सीएम योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद से योगी , अखिलेश के कार्यकाल और अपने कार्यकाल में जमीन आसमान का अंतर बताते आए हैं। निस्संदेह, जमीन और आसमान का ही अंतर है क्योंकि 2012 से पूर्व बसपा कार्यकाल में जहाँ आँकड़ों की रिपोर्ट के अनुसार 2007 से 2012 में रही मायावती सरकार की तुलना में अखिलेश सरकार में क्राइम का दर 16 फीसद बढ़ा था।

बसपा शासन में यूपी में औसतन 5783 आपराधिक घटनाएँ हो रही थीं और अखिलेश सरकार में ये नंबर 6433 तक जा पहुँचा। मुंह से बकैती करना आसान है, शायद इसीलिए निराधार आरोप लगाने वाले अखिलेश यादव अब भी जड़ें खोदकर बस यही तलाशते रहते हैं कि कहीं से एक ही सही पर सीएम योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल वाला कोई दंगा तो निकले जिससे वो उन्हें घेर सके पर अपने कर्मकांडों से अनुमान लगाकर यदि अखिलेश अगर पागल होकर भी खोजेंगे तो उन्हें ऐसा कोई भी दंगा नहीं मिलेगा जो सीएम योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में हुआ हो।

5 साल, पचासों कांड

बसपा के शासनकाल के बाद जैसे ही राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार आई, बसपा कार्यकाल में दर्ज़ हुए दंगों के रिकॉर्ड की तुलना में सपा सरकार के दौरान हुए दंगों के बीच एक बड़ा उछाल दर्ज़ किया गया। यह सपा के ही शासनकाल की हालत थी जहाँ दंगों के कारण उत्तरप्रदेश को दंगा प्रदेश तक कहा जाने लगा था। यह अखिलेश यादव का ही किया धरा था जो उनके सरकार में आते ही सांप्रदायिक दंगों की बयार आ गई जिनमें 2013 से जो सांप्रदायिक हिंसा का तांडव शुरू हुआ, वह रुकने का नाम लेने की तो बात छोड़िए, बाद में हुए दंगे उससे भी भयावह स्वरुप में परिवर्तित हुए जिसका श्रेय  अखिलेश यादव को जाता है।

15 मार्च 2012 को अखिलेश ने राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी और साल के अंत तक राज्य में कुल 27 दंगे तो यूँही चलते-चलते हो गए थे, जिन्हें स्वयं माननीय मुलायम पुत्र ने स्वीकार भी किया था।

और पढ़ें- योगी के खौफ से “ए पुलिस, ए पुलिस” चिल्लाने लगे हैं अखिलेश यादव!

बता दें जिन प्रमुख दंगों से अखिलेश यादव और उनकी सपा सरकार का संबंध रहा उनमें 2013 में हुआ मुजफ्फरनगर , कैराना दंगा और 2014 में हुआ सहारनपुर दंगा प्रमुख रूप से आज भी राज्य पर पड़ी सरकारी कुशासन की लाठी के रूप में याद किया जाता है।

मुज्जफरनगर, कैराना और सहारनपुर तो याद ही होगा!

अगस्त सितंबर 2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच संघर्ष ने राज्य में हिन्दुओं के भीतर एक डर पैदा कर दिया था। 2013 में ही कैराना के कव्वाल गांव की एक छेड़छाड़ की घटना ने दंगों का रूप ले लिया था। कांधला और लिसाढ़ जैसे इलाके बुरी तरह से दंगों के चपेट में आ गए थे और राज्य की सारी सुरक्षा व्यवस्था धरातल पर आ गई थी। उसके बाद आया वर्ष 2014 का सहारनपुर दंगा, जिसमें प्रमुख रूप से समाजवादी पार्टी और उसके नेता मुहर्रम अली पप्पू की शह पर मुसलमानों और श्री गुरु सिंह सभा के नेतृत्व में सिखों के बीच एक धार्मिक मतभेदों के बीच दंगे हुए। इसकी पूरी साजिश सपा के नेताओं के नियोजन के तहत हुई थी।

पश्चिमी यूपी को सांप्रदायिक केंद्र माना जाता है, जो धार्मिक आधार पर विभाजित है और मुजफ्फरनगर उसका केंद्र है, जहां अगस्त और सितंबर 2013 में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इन दंगों में 60 लोगों की जान गई थी और 40,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए थे। 2010 और 2015 के बीच, मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा पांच गुना बढ़ गई, जैसा कि उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक के कार्यालय से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, राज्य के 90 प्रतिशत में तनाव की प्रवृत्ति को दर्शाता है।

और पढें- मुस्लिम समुदाय पर टिकी है निराश और हताश अखिलेश यादव की नज़र

ऐसे में यदि अखिलेश यादव के शासन को लेकर यदि सीएम योगी आदित्यनाथ ने उन्हें आइना दिखाते हुए यह कहा है की अखिलेश दंगाइयों को शरण देने वाले “दंगेश” हैं, इसमें कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। यह तो योगी आदित्यनाथ की सरलता और सौम्यता थी जो उन्होंने अभी मात्र अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए दंगों को गिनाया, वहीं यदि बात मुलायम के शासनकाल की उठती तो निस्संदेह बात दूर तलक जाती। राजनीतिक शिष्टाचार ने सपा और सपाइयों की खिल्ली उड़ने से बचा ली वर्ना आज उन्हें चुनाव में वोट मांगने के भी लाले पड़ जाते।

Tags: अखिलेश यादवमुजफ्फरनगर दंगेयूपी चुनाव 2022योगी अदित्यानाथ
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