‘रिलिजन फोबिया’ पर दोहरे मापदंड को लेकर भारत ने UN को जमकर लताड़ा

कब-तक आंखें मूंदकर बैठा रहेगा संयुक्त राष्ट्र?

Religiofobia

Source- TFIPOST

संसार में सबसे वेला संगठन यदि कोई है तो वह है संयुक्त राष्ट्र। न घर का न घाट का, पर ज्ञान बांचे ब्रह्मांड का! अब जब ये लोग नूपुर शर्मा प्रकरण पर भारत को ज्ञान देने चल दिए, तो इसपर भारत कैसे चुप बैठता? अब उन्हें भारत ने ऐसा धोया है कि यदि वे पुनः पलट कर फिर से कुछ नौटंकी करने की सोचें भी, तो उन्हें भारत की बातों का स्मरण स्वत: हो जाएगा।

दरअसल, धार्मिक भय पर UN के कथित विचारों को आड़े हाथों लेते हुए भारत के प्रतिनिधि टी एस तिरुमूर्ति ने करारी प्रतिक्रिया दी है। हेट स्पीच (Hate Speech), गैर-भेदभाव और शांति के मूल कारणों को लेकर शिक्षा की भूमिका नामक शीर्षक से अंतरराष्ट्रीय दिवस की पहली वर्षगांठ के उत्सव पर एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा, “जैसा कि हमने बार-बार जोर दिया है कि केवल एक या दो धर्मों को शामिल कर रिलिजियोफोबिया के मुकाबले की कवायद चुनिंदा नहीं होनी चाहिए, बल्कि गैर-अब्राहम धर्मों के खिलाफ भी यह फोबिया पर एकसमान रूप से लागू होनी चाहिए। जब तक ऐसा नहीं किया जाता, ऐसे अंतरराष्ट्रीय दिवस अपने उद्देश्यों को कभी हासिल नहीं कर पाएंगे। धार्मिक घृणा पर दोहरे मापदंड नहीं हो सकते।”

परंतु तिरुमूर्ति वहीं पर नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा, “भारत की बहुसांस्कृतिक विशेषता ने सदियों से इसे भारत में शरण लेने वाले सभी लोगों के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल बना दिया है, चाहे वह यहूदी समुदाय हो या पारसी या तिब्बती। यह हमारे देश की अंतर्निहित ताकत है जिसने समय के साथ कट्टरपंथ और आतंकवाद का सामना किया है। कट्टरपंथ, उग्रवाद और आतंकवाद का मुकाबला करने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है।”

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इससे पहले भी UN को लपेट चुके हैं तिरुमूर्ति

इससे पूर्व में भी टी एस तिरुमूर्ति ने UN को उसके दोहरे मापदंडों के लिए आड़े हाथों लिया है। कुछ ही माह पूर्व जब UN ने ‘Islamophobia’ को आधिकारिक रूप से मान्यता प्रदान दी, तो UN को आड़े हाथों लेते हुए तिरुमूर्ति बोले,पिछले दो वर्षों में कई सदस्य देश, अनेक कारणों से, चाहे वह राजनैतिक हो, धार्मिक हो या फिर कुछ और, आतंकवाद को विभिन्न श्रेणियों में बांटना चाहते हैं, जैसे हिंसक उग्रवाद, हिंसक राष्ट्रवाद, दक्षिणपंथी उग्रवाद इत्यादि। यह प्रवृत्ति बहुत ही चिंताजनक है और खतरनाक भी।”

उन्होंने आगे कहा, “रोचक बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र के ‘वैश्विक आतंकरोधी रणनीति’ यानी ‘Global Counter Terrorism Strategy’ में केवल Abrahamic पंथ, जैसे इस्लाम, ईसाईयत एवं यहूदी धर्म के अनुयाइयों के विरुद्ध घृणा और भेदभाव का उल्लेख किया गया है। परंतु वर्तमान में गैर-Abrahamic पंथ, जैसे सनातन धर्म (Hinduism), बौद्ध धर्म और सिख धर्म के विरुद्ध भेदभाव का कोई उल्लेख नहीं है। हिन्दूफोबिया जैसी बातें एक गंभीर विषय हैं और संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों को इस विषय पर चर्चा करनी चाहिए तथा इस समस्या का समाधान निकालने में समय नहीं व्यर्थ जाने देना चाहिए!”

बस, अब और नहीं!

गौरतलब है कि कई दशकों से भारत को संसार ने अपने इशारों पर नचाया है, ये जानते हुए भी कि अनेकों बार हमने वैश्विक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में अभूतपूर्व और निस्स्वार्थ भाव से योगदान दिया है। अब Islamophobia (इस्लाम विरोध या घृणा) और उससे जुड़े शोध, ट्रेंड्स एवं चर्चाओं से हम अनभिज्ञ नहीं हैं और भारतीयों को अनेकों बार ऐसे मामलों में अकारण ही अपमानित करने के लिए घसीटा जाता हैl लेकिन दूसरी ओर सनातन धर्म को नीचा दिखाने के लिए वैश्विक स्तर पर जो अभियान चलाया जा रहा है, उसपर सभी मानों चिरनिद्रा में लीन है और कानों में तेल डालकर सोए हुए हैं। ‘Dismantling Global Hindutva’ जैसी ओछी कॉन्फ्रेंस तो ऐसे होती है, जैसे कोई आम वाद-विवाद प्रतियोगिता हो और विश्व के बड़े-बड़े देश तो छोड़िए, UN तक पलक नहीं झपकाता। परंतु भारत ने भी स्पष्ट कर दिया है – बस, अब और नहीं!

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