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सलमान रुश्दी की ‘द सैटैनिक वर्सेज़’ के कारण 59 लोगों की जान जा चुकी है

कई दशकों ने इनके पीछे पड़े हैं कट्टरपंथी!

Deeksha Sharma द्वारा Deeksha Sharma
13 August 2022
in समीक्षा
Salman Rushdie

Source- Google

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12 अगस्त 2022 को अमेरिका के न्यूयॉर्क में एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान जब मशहूर लेखक सलमान रुश्दी जैसे ही मंच पर अपनी स्पीच देने पोडियम के पास पहुंचे तभी अचानक भीड़ में से एक अनजान व्यक्ति मंच पर चढ़ा और रुश्दी पर हमला कर दिया. जब तक कोई कुछ समझ पाता और इस घटना को रोक पता तब तक वह हमलावर 75 वर्षीय लेखक पर कई प्राणघातक वार कर चुका था. इस हमले में रुश्दी के साथ-साथ साक्षात्कारकर्ता हेनरी रीज़ को भी सिर में चोट लगी. खबरों के अनुसार, करीब 20 सेकेंड के इस हमले ने आरोपी ने सलमान रुश्दी को मंच पर 10 से 15 बार छुरा घोंपा. रुश्दी की गर्दन और पेट में घातक और गहरे घाव हैं. लेखक के एजेंट एंड्रयू वाइली ने हमले के बारे में बताते हुए कहा कि सलमान रुश्दी के एक हाथ की नसें इस हमले में टूट गई हैं और उनके लीवर को नुकसान पहुंचा है. यह भी संभव है कि उनकी एक आंख भी चली जाये. इस समय लेखक वेंटिलेटर पर हैं और उनकी स्थिति कुछ अधिक अच्छी नहीं लग रही है.

और पढ़ें: सलमान रुश्दी की किस्मत राजीव गांधी ने 1988 में ही लिख दी थी

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कौन है हमलावर?

इस अपराध को अंजाम देने वाला 24 वर्षीय हादी मातर नाम का आरोपी पुलिस की गिरफ्त में है. हादी के फ़ोन रिकॉर्ड जब खंगाले गए तो जांच में यह पता चला है कि वो एक “शिया चरमपंथ” और ईरानी सरकार का समर्थक है. ध्यान देने वाली बात है कि ईरान की सरकार ने ही रुश्दी की फांसी की मांग की थी. हमलावर ने अपने फेसबुक पेज पर अयातुल्ला खोमैनी और अयातुल्ला खामेनेई की एक तस्वीर पोस्ट की है. खोमैनी वर्ष 1989 में रुश्दी के खिलाफ फतवा जारी करने वाले ईरानी राष्ट्रपति थे. खोमैनी की तो उसी वर्ष मृत्यु हो गयी लेकिन उनका जारी फतवा शायद उनके अनुयायी अभी तक नहीं भूले हैं.

क्या है हमले के पीछे का कारण?

सलमान रुश्दी कश्मीरी मुस्लिम परिवार में जन्मे भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक हैं जो पिछले 20 वर्षों से अमेरिका में रह रहे है. उनकी लिखी किताबों में अक्सर ऐतिहासिक कल्पना के साथ जादुई यथार्थवाद जुड़ा होता है. आज तक उन्होंने 14 उपन्यास लिखे हैं. उनके दूसरे उपन्यास “मिडनाइट्स चिल्ड्रेन” के लिए उन्हें वर्ष 1981 में बुकर प्राइज से सम्मानित किया गया. उसके बाद वर्ष 1988 में उन्होंने एक किताब लिखी जिसका शीर्षक था “द सैटनिक वर्सेज”. इस उपन्यास में लिखी कुछ सामग्री मौलवियों को पैगंबर मोहम्मद के प्रति अपमानजनक लगी जिसके बाद से ही सलमान रुश्दी और उनकी इस किताब को कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है. उन्हें कई दशकों से जान से मारने की धमकियां भी मिलती रही हैं.

रुश्दी पर इनाम

ज्ञात हो कि ईरानी नेता अयातुल्ला रूहोल्लाह खोमैनी ने इसी किताब को लेकर रुश्दी की हत्या करने वाले को 30 लाख अमेरिकी डॉलर से अधिक का इनाम देने का ऐलान किया था. राज्य से जुड़े ईरानी धार्मिक फाउंडेशन ने इनाम को बढ़ाकर 2.5 मिलियन डॉलर कर दिया और हालिया वर्षों में इनाम को बढ़ाकर 3.9 मिलियन डॉलर कर दिया गया, जिसमें एक ईरानी मीडिया आउटलेट भी शामिल है. वर्ष 1998 में एक कट्टर ईरानी छात्र समूह ने रुश्दी के सिर के लिए एक अरब रियाल (तब $333,000) का इनाम घोषित किया था. बढ़ते वर्षों के साथ उनके सर पर रखी इनाम की रकम भी बढ़ती गयी, जो मौजूदा समय में 6 मिलियन अमेरिकी डॉलर के करीब पहुंच चुकी है.

अज्ञातवास में रुश्दी

जान पर आये जोखिम के कारण रुश्दी ने यूनाइटेड किंगडम में पुलिस सुरक्षा में लगभग एक दशक बिताया. वो छिपते रहें और बार-बार घर बदलते रहें ताकि उनके किसी एक ठिकाने का पता किसी को न चले. हालांकि, वर्ष 1998 में ईरानी सरकार ने ऐलान कर दिया कि वह उस ‘फतवे’ या फरमान को लागू नहीं करेगी, जिसमें उन्होंने रुश्दी के सर पर इनाम रखा था. इस ऐलान के बाद धीरे-धीरे सलमान वापस अपनी ज़िंदगी में आने लगे. वर्ष 2000 से रुश्दी अमेरिका में रह रहे हैं. हाल के वर्षों में ईरान ने लेखक पर ध्यान केंद्रित नहीं किया है और शायद यही कारण है कि उनकी सुरक्षा में ढील कर दी गयी. ध्यान देने वाली बात है कि इस पुस्तक के केवल लेखक ही नहीं बल्कि इसके अनुवादकों और इसे प्रकाशित करने वालों पर भी फतवे जारी किये जा चुके हैं, कई लोगों की तो हत्या भी हो चुकी है. वर्ष 1991 में उपन्यास के एक जापानी अनुवादक की टोक्यो में चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी. एक इतालवी (Italian) अनुवादक उसी वर्ष अपने मिलान फ्लैट में एक ईरानी व्यक्ति द्वारा किए गए चाकू के हमले से बच गया. वर्ष 1993 में पुस्तक के नॉर्वेजियन प्रकाशक को तीन बार गोली मारी गई लेकिन वह बच गया. किताब को लेकर कई दंगों में कम से कम 59 लोग मारे गए हैं.

और पढ़ें: 17 वर्ष पहले भारत ने किया था ‘वन चाइना’ का जिक्र, इसके मायने बहुत गहरे हैं

फिर कभी भारत नहीं लौटे रुश्दी

द सैटेनिक वर्सेज के रिलीज होने के महीनों बाद उसे भारत समेत दर्जनों देशों में बैन कर दिया गया था. 1989 में लिखे इस उपन्यास को शायद कोई नहीं भूला और यही कारण है कि जब इस घटना के लगभग 10 वर्ष बाद भारत सरकार ने उपन्यासकार को देश का दौरा करने के लिए वीजा प्रदान किया तो मुस्लिम समुदाय ने विरोध शुरू कर दिया. वर्ष 2012 में, उन्हें मुस्लिम समूहों के विरोध के कारण जयपुर में एक प्रमुख साहित्य उत्सव में भाग लेने की अपनी योजना रद्द करनी पड़ी थी. बुकर पुरस्कार विजेता उपन्यासकार सलमान रुश्दी पर हुए हमले ने दुनिया को झकझोर कर रख दिया है.

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Tags: अयातुल्ला रूहोल्लाह खोमैनीईरानसलमान रुश्दी
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