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अपना अस्तित्व बचाने के लिए कनाडा के पास सिर्फ एक विकल्प है – भारत

खालिस्तानियों के समर्थक 'कनाडा' के पेट पर लात पड़ी है तो अब भागते भागते भारत के पास पहुंचा है.

Yogesh Sharma द्वारा Yogesh Sharma
30 November 2022
in विश्व
कनाडा भारत

Source- TFI

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कनाडा और भारत के संबंध काफी मधुर नहीं हैं क्योंकि खालिस्तानियों को शह देने के कारण आये दिन बयानबाजियां होती रहती हैं। कनाडा खालिस्तानियों का गढ़ है और वहीं से खालिस्तानी अपने कुकर्मों को अंजाम देते आए हैं। वहां बैठे खालिस्तान समर्थक आए दिन भारत के खिलाफ षड्यंत्र रचते रहते हैं और उन्हें कनाडा की सरकार का पूर्ण समर्थन भी मिलता है। ये हमेशा से भारत तोड़ने का अपना एजेंडा चलाते आए हैं और इसी मामले को लेकर भारत और कनाडा के बीच तनातनी रही है। लेकिन समय का फेर ऐसा हुआ है कि आज यही कनाडा, भारत के सामने घुटने टेकने पर मजबूर है। अब आप भी सोच रहे होंगे कैसे? तो चलिए समझते हैं।

दरअसल, हाल में ही चीन ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के 19 देशों के साथ बैठक की थी और इस बैठक में भारत को नहीं बुलाया गया था। अब आप ये सोच रहे होंगे कि इस बैठक का कनाडा से क्या संबंध? लेकिन संबंध है। ज्ञात हो कि चीन का हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के साथ बैठक करने का उद्देश्य एक तो भारत पर दबाव बनाने से जुड़ा है तो वहीं दूसरी ओर अपनी डूबती अर्थव्यवस्था और व्यापार को बढ़ाने हेतु ‘चतुर’ चीन ने ये बैठक की है।

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इस समय चीन की अर्थव्यवस्था डांवाडोल है, जिसके कारण वह कुछ भी कर रहा है। इंडो पैसिफिक क्षेत्र में अपना वर्चस्व बढ़ाने हेतु वह अपनी विस्तारवादी कूटनीति का सहारा ले रहा है और इस बैठक में भारत को न बुलाने की वजह हिंद महासागर में भारत का बढ़ता वर्चस्व है। वह भारत को इस क्षेत्र में अलग थलग करने की कोशिशों में जुटा है। हालांकि, आस्ट्रेलिया और मालदीव समेत अभी भी कई देश भारत के साथ ही हैं।

और पढ़ें: हिंद महासागर में अंतत: भारत ने अपना कब्जा जमा ही लिया

कनाडा के खड़े हो गए हैं कान

यह स्पष्ट है कि चीन की अर्थव्यवस्था इंडो पैसिफिक पर टिकी हुई है। लेकिन यह ऐसा क्षेत्र है जिस पर पूरे विश्व की नजर है। QUAD बनाने का उद्देश्य भी यही था। आपको बता दें कि कनाडा और चीन के बीच भी रिश्ते बहुत अच्छे नहीं हैं। हाल ही में जी20 शिखर सम्मेलन में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच सार्वजनिक मंच पर तीखी बहस देखने को मिली थी। हालांकि, वैश्विक मंचों पर किसी भी देश के राष्ट्राध्यक्षों के बीच ऐसी बहस बहुत कम ही देखने को मिलती है। लेकिन ट्रूडो और जिनपिंग एक दूसरे पर टूट पड़े थे और उसके बाद कनाडा और चीन के बचे-खुचे रिश्ते रसातल में पहुंच गए हैं। ज्ञात हो कि अमेरिका के बाद कनाडा, इंडो पैसिफिक क्षेत्र में सबसे अधिक निर्यात करता है यानी कनाडा भी काफी हद तक इंडो पैसिफिक क्षेत्र पर निर्भर है।

अब इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते वर्चस्व के कारण कनाडा के कान खड़े हो गए हैं। वह अब अपनी इंडो पैसिफिक स्ट्रैटेजी के साथ मैदान में उतर गया है। कनाडा की इंडो-पैसिफिक स्ट्रेटजी की ख़ास बात ये है कि इसमें चीन को लेकर आशंकाएँ जताई गई और ये बताया गया है कि उसके बढ़ते असर का सामना करने के लिए वह क्या करेगा। वहीं, इस क्षेत्र में उसने भारत के बढ़ते रणनीतिक, आर्थिक और इसकी आबादी की अहमियत को देखते हुए इसे एक अहम पार्टनर माना है। कनाडा ने इस स्ट्रैटेजी में कहा है कि इस क्षेत्र में कई ऐसे देश हैं जिनसे कनाडा बुनियादी तौर पर असहमत है, लेकिन उसे ऐसे देशों से पैदा होने वाले ख़तरों और जोख़िमों को लेकर अपना रुख़ स्पष्ट रूप से रखना होगा।

और पढ़ें: हिंद महासागर में भारत की शक्ति से घबराया चीन, अब अपना सारा ध्यान किया अटलांटिक पर केन्द्रित

कनाडा ने भारत को बताया भागीदार

कनाडा ने अपनी इंडो-पैसिफ़िक स्ट्रैटेजी में कहा है कि चीन एक अस्थिरता पैदा करने वाला ग्लोबल पावर है। इसलिए कनाडा की रणनीति होगी कि अपने सहयोगी देशों के साथ मिल कर काम करे ताकि चीन का सामना किया जा सके। कनाडा ने अपनी इस स्ट्रैटेजी में कहा है कि चीन का उदय जिन अंतरराष्ट्रीय नियम-क़ानूनों से हुआ है वो उन्हीं को ठुकराने में लगा है। चीन जिस तरह से उसका सैन्यीकरण कर रहा है और यहाँ समुद्री और वायु मार्गों को नियंत्रित करना चाहता है, उससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक बड़ा ख़तरा पैदा हो सकता है। चीन यहाँ अपने आर्थिक, राजनयिक और आक्रामक सैन्य और टेक्नोलॉजी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए बड़ा निवेश कर रहा है।

इसमें कहा गया है कि दक्षिण चीन सागर में चीन जिस तरह से संयुक्त राष्ट्र के फ़ैसलों की अनदेखी कर रहा है, उससे ये ख़तरा पैदा हो गया है कि इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र में भी वह ऐसा कर सकता है। इस स्ट्रैटेजी में कहा गया है कि इस क्षेत्र में कनाडा भारत को अपना स्वाभाविक सहयोगी मानता है। उसका मानना है कि इस क्षेत्र और दुनिया के दूसरे इलाकों में भी भारत की रणनीतिक अहमियत और नेतृत्व का दायरा बढ़ेगा। यानी कनाडा भी समझ चुका है कि इंडो पैसिफिक क्षेत्र में उसे अपनी पकड़ बनानी है तो उसे भारत के शरण में जाना ही होगा। इसी के मद्देनजर कनाडा ने अपनी स्ट्रैटेजी में भारत को स्वाभाविक भागीदार बताया है। इसके अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत का समूह क्वाड भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ाने में लगा है।

भारत का बढ़ता वर्चस्व है इसका कारण

आपको बताते चलें कि हिंद महासागर, इंडो-पैसिफिक का ही हिस्सा है और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन में इसकी अहम भूमिका है। इस मार्ग पर चीन द्वारा अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश भारत के लिए चिंता का विषय है। दूसरी ओर कनाडा चीन के बाज़ार पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और इसी कारण वह इस क्षेत्र में निवेश भी करना चाहता है। उसकी नज़र भारत के बढ़ते वर्चस्व पर भी है। चीन के साथ ख़राब रिश्तों की वजह से कनाडा अब नए गठजोड़ की तलाश में है और इंडो पैसिफिक क्षेत्र में उसके पास भारत ही एकमात्र विकल्प है। इसी के कारण भारत को तोड़ने का एजेंडा चलाने वालों का समर्थन करने वाला कनाडा भी आज भारत का गुणगान कर रहा है और कनाडा ने भारत के बढ़ते रणनीतिक, आर्थिक कद का लोहा मानते हुए भारत को एक अहम पार्टनर माना है।

और पढ़ें: प्रोजेक्ट 75 और 75 I: भारत का हिंद महासागर पर अंतिम अधिकार था, है और रहेगा

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