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भारत के उस जासूस की कहानी जिससे प्रेरित था जेम्स बॉड का किरदार

भगत राम तलवार कुछ भी थे, परंतु स्वतंत्रता सेनानी नहीं !

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
21 February 2023
in इतिहास
Bhagat Ram Talwar is anything but the freedom fighter

Source: TFI MEDIA

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Bhagat Ram Talwar Biography: यदि आपको गुप्तचर और उनकी कार्यशैली में रुचि है, तो आपने जेम्स बॉन्ड पर अवश्य ध्यान दिया होगा। ब्रिटिश इंटेलिजेंस सेवा के लिए कार्यरत इस गुप्तचर को इयान फ्लेमिंग ने रचा था। जिनके भ्राता, पीटर फ्लेमिंग स्वयं ब्रिटिश इंटेलिजेंस में कार्यरत थे। परंतु क्या आपको पता है कि जेम्स बॉन्ड की प्रेरणाओं में से एक भारतीय भी था, जिसको स्वयं पीटर फ्लेमिंग प्रशिक्षित कर रहे थे? इस व्यक्ति ने एक नहीं, अपितु चार देशों को अपनी सेवाएँ दी और अपने काम में इतना दक्ष था कि इसने एक बड़े नेता को उल्लू तक बना दिया था।

इस लेख में भगत राम तलवार (Bhagat Ram Talwar) के बारे में पढ़िए, जिन्होंने अपनी विचारधारा के लिए अपनी मातृभूमि से भी विश्वासघात किया।

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नेता जी की मदद की

यदि आपने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कारनामों का तनिक भी अध्ययन किया है, तो आप ये भी जानते होंगे कि उन्होंने कैसे बड़ी ही चतुराई से ब्रिटिश प्रशासन को चकमा देते हुए कलकत्ता से काबुल तक का सफर तय किया। परंतु काबुल से यूरोप तक का सफर तय करने में उन्हे काफी अड़चनों का सामना करना पड़ा, जिसमें उनकी सहायता भगत राम तलवार (Bhagat Ram Talwar) नामक व्यक्ति ने की, जो कथित तौर पर कीर्ति किसान पार्टी का सदस्य था और जिसके भाई हरीकिशन तलवार को पंजाब के राज्यपाल पर प्राणघातक हमला करने हेतु फांसी दी गई थी।

बताइए, कितना देशभक्त व्यक्ति है, जिसने अपना सर्वस्व अपने देश पर अर्पण कर दिया- लेकिन रुकिए, ये तो वह कथा है, जो कम्युनिस्टों ने काफी वर्षों से सुनाई थी और श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित “बोस – द फोर्गॉटेन हीरो” में प्रचारित भी किया गया।

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परंतु किसी अन्य को छोड़िए, स्वयं नेताजी तक को नहीं पता था कि जो व्यक्ति रहमत खान के नाम से उन्हे अफ़गानिस्तान में रहने का प्रबंध कराएगा, वही उनके उद्देश्य को ऐसा धूमिल करेगा, जिसका उल्लेख भी बड़ी कठिनाइयों से मिलता है।

इस कथा का आरंभ होता है द्वितीय विश्वयुद्ध से, जहां Allies एवं Axis गुट के देशों ने एक-दूसरे की जासूसी के लिए कई जासूस बनाए थे। दरअसल, उनका मकसद एक-दूसरे की खुफिया जानकारी हासिल करना था। एक ऐसा ही जासूस ब्रिटेन ने बनाया था। उस जासूस का खुफिया नाम ‘सिल्वर’ था। ये इतना तेज तर्रार था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इसने हिटलर तक को मूर्ख बना दिया था। भगत राम तलवार (Bhagat Ram Talwar) यही गुप्तचर था।

उस वक्त युद्ध ब्रिटिश राज और कॉमनवेल्थ के देशों और नाजी और उनके इटली साझेदार के बीच चल रहा था। इस दौरान रूस और अमेरिका इस युद्ध से दूर थे। ब्रिटिश मिलिटरी इंटेलिजेंस के लिए काम करने वाले पीटर फ्लेमिंग नामक शख्स ने ‘सिल्वर’ की नियुक्ति की थी।

किताब में पत्रकार मिहिर बोस ने किया खुलासा

दरअसल, सिल्वर का असली नाम भगत राम तलवार (Bhagat Ram Talwar) था। गौरतलब है कि पीटर फ्लेमिंग के भाई इयान फ्लेमिंग ने ही दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जासूसों की कहानी को देखते हुए मशहूर किरदार ‘जेम्स बॉन्ड’ की रचना की थी। बाद में ही इसे 007 के नाम से जाना गया।

मशहूर लेखक और पत्रकार मिहिर बोस ने अपनी किताब ‘Silver: The Spy Who Fooled the Nazis’ ने रहमत खान उर्फ भगत राम तलवार (Bhagat Ram Talwar) के बारे में खुलासा किया था। बोस ने लिखा है कि युद्ध के दौरान कई जासूस दोहरी भूमिका में थे और अलग-अलग देशों के लिए काम कर रहे थे। लेकिन भगत राम ऐसे जासूस थे जो दावा कर सकते थे कि उन्होंने 5 देशों के लिए काम किया था।

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तो प्रश्न ये उठता है कि Bhagat Ram Talwar ने सुभाष चंद्र बोस की सहायता क्यों और किसलिए की थी? कई लोग कहते हैं कि वे कट्टर देशभक्त थे, परंतु भगत के मन की बात तो वही जानें। फरवरी 22, 1941 की बात है।

एक क्लीन शेव शख्स काबुल में इटली दूतावास तक पहुंचता और वहां दरवाजा पर खड़े गार्ड से कहता है वह एक खानसामा है और उसे राजदूत के लिए काम करने को भेजा गया है। वेशभूषा से वह शख्स एकदम अफगान लग रहा था तो गार्डों को कोई शक भी नहीं हुआ।

उसे अंदर जाने दिया गया। राजदूत उसे देखकर खुश तो नहीं हुआ लेकिन उससे पूछा कि उसे किसने भेजा है? उस शख्स ने बताया कि उसे अफगान में एक जर्मन कंपनी सिमंस के हेड हेर थॉमस ने भेजा है। इसपर राजदूत ने पूछा किसलिए?

तब Bhagat Ram Talwar ने कहा कि मुझे नहीं पता, मुझे बस आपको देखने के लिए भेजा गया है। इस जवाब के बाद इटली के राजदूत समझ गए कि ये कोई आम अफगान नहीं है। इसके बाद राजदूत ने वहां बैठे लोगों को जाने के लिए कहा और कहा कि मेरा नाम पीटर क्योरिनी है और मैं इटली का राजदूत हूं। जब शख्स ने राजदूत को बताया कि उसका नाम “रहमत खान” है वह न तो कोई रसोइया है न अफगान है।

बल्कि वह एक भारतीय है और वह सुभाष चंद्र बोस को काबुल लाना चाह रहे हैं। वह इसके लिए इटली की मदद चाह रहे थे। इसके बाद बोस “रहमत खान” की मदद से भारत से भागकर काबुल पहुंच गए। करीब एक महीने काबुल की सड़कों की खाक छानने के बाद इटली के राजदूत की मदद से अफगानिस्तान से निकलकर जर्मनी पहुंच गए। खैर ये तो बात हुई बोस के जर्मनी पहुंचने की लेकिन उस जासूस का क्या हुआ जिसने हिटलर तक को बेवकूफ बना दिया। इसे आगे जानिए।

दरअसल, क्योरिनी से मीटिंग के बाद Bhagat Ram Talwar बहुत मशहूर हो गए थे और दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सबसे महंगे जासूसों में शुमार हो गए थे। 1945 तक उन्होंने इटली, जर्मनी, रूस, जापान और ब्रिटेन के लिए जासूसी की थी। लेकिन असल में वह कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादार थे। कुछ महीने तक इटली के लिए काम करने के बाद भगत को जर्मनी भेजा गया था। नाजियों ने उन्हें जासूसी की ट्रेनिंग देकर फिर से काबुल भेज दिया था।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया की मदद की

1941 से 1945 के बीच सिल्वर ने पैदल ही 12 बार काबुल की यात्राएं कीं। जर्मन ने उन्हें काबुल में एक किराए का फ्लैट दिला दिया था। उन्हें ख़ूब पैसे भी दिए गए, जिसका इस्तेमाल भगत ने पैसे की तंगी से जूझ रही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की मदद के लिए किया।

और पढ़ें: “चीन की जासूसी की, पिस्तौल लेकर चलते थे, 15 वर्ष हिमालय में घूमते रहे”, स्वामी प्रणवानंद की कहानी

लेकिन दिल से कम्युनिस्ट सिल्वर यानी भगत की इच्छा नाजियों और इटली की मदद की कतई नहीं थी। इसी का लाभ पीटर फ्लेमिंग ने उठाया, और भगत राम तलवार (Bhagat Ram Talwar) लग गए नेताजी के पीठ में “छुरा घोंपने”!

उन्होंने हिटलर और इटली को झूठी जानकारियां देनी शुरू कर दी। उस दौरान इस तरह की जानकारी को चेक करने का कोई तरीका नहीं होता था। इस दौरान सिल्वर एक बार फिर अपने पुराने बॉस फ्लेमिंग से मिलते हैं। उन्हें एक अफगान के मौत की शायद झूठी कहानी सुनाते हैं, जिसपर फ्लेमिंग विश्वास भी कर लेते हैं।

इस यात्रा के दौरान सिल्वर ने अपने जर्मन रहनुमाओं को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह काबुल में रह रहे जापानी अताशे इनोयू से उन्हें मिलवाएं। जापानी अताशे ने भी क्यूरोनी की तरह ही भगत के झूठ को सच मान लिया। इस दौरान जापान भारत पर आक्रमण की योजना बना रहा था। इस दौरान फ्लेमिंग ने सिल्वर को डबल एजेंट बनने के लिए राजी कर लिया था। अब कल्पना कीजिए, यदि हरीकिशन की भांति भगत ने इसी कला का उपयोग देशसेवा में किया होता, तो?

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद सिल्वर गायब हो गए। इसके बाद जासूसी के दौरान मिले करोड़ों रुपये लेकर वो भारत पहुंच गए। इतना ही नहीं, स्वतंत्र भारत में भी उनकी अच्छी आवभगत हुई। सिल्वर उर्फ भगत का 75 साल की उम्र में 1983 में निधन हो गया।

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