भोजपुरी सुपरस्टार्स की रिटायरमेंट पॉलिसी है बीजेपी!

भाजपा ये अनदेखा नहीं कर सकती!

पवन सिंह भाजपा

पवन सिंह जुड़ेंगे भाजपा से: राजनीति में निस्स्वार्थ भाव से शायद ही कोई जुड़ता है । सबके अपने अपने निहित स्वार्थ होते हैं, अन्यथा राजनीति फिर राजनीति थोड़े ही होती। परंतु विगत कुछ वर्षों से जो भोजपुरी उद्योग कर रही है, वह न तार्किक है, और न ही यह भाजपा को इससे कोई लाभ होने वाला।

इस लेख में पढिये कैसे भोजपुरी फिल्म उद्योग के कई सितारों ने भाजपा का अनुचित लाभ उठाना प्रारंभ कर दिया है। तो

अब पवन सिंह भी जुड़ेंगे भाजपा से

हाल ही में ये अफवाहें व्याप्त है कि भोजपुरी अभिनेता एवं गायक पवन सिंह, भाजपा जॉइन कर सकते हैं और संसदीय चुनाव भी लड़ सकते हैं। ये अफवाहें इसलिए भी उड़ी क्योंकि पवन सिंह हाल ही में एक समारोह में भाजपा के कद्दावर नेता, नितिन गडकरी के साथ देखे गए थे। ऐसे में सबसे ज्यादा यही प्रश्न उठ रहे हैं : पवन सिंह बीजेपी कब जॉइन करेंगे?

ठीक है, हर व्यक्ति की अपनी पसंद और नापसंद होती है, पर क्या हमें इस निर्णय से प्रसन्न होना चाहिए?  नहीं।

भोजपुरी सिनेमा के नाम पर क्या परोसा जाता है, इससे कोई भी अपरिचित नहीं है, और जिस प्रकार से ये फुहर लोग जिनके ना कोई आदर्श हैं ना कोई वसूल और ये  थोक के भाव में भाजपा जॉइन कर रहे हैं,  ये ना तो बीजेपी के लिए और ना ही देश के लिए शुभ संकेत हैं। जिन मौकापरस्त लोगों मे अपनी मां समान भाषा और संस्कृति को तार तार करने में एक बार ना सोचा हो वो पार्टी या देश का कैसे सगा होगा।

किसी के सगे नहीं

अगर ये लोग तनिक भी निष्ठावान होते, तो आज भोजपुरी उद्योग हास्य का विषय न बनता। चाहे मनोज तिवारी हो, रवि किशन हो या निरहुआ, ऐसा कौन सा व्यक्ति, जिसने भोजपुरी उद्योग के उत्थान के लिए ठोस प्रयास किया हो। कोई है?

जैसा कि पहले भी बताया ये लोग किसी पार्टी के भी सगे नहीं थे। मनोज तिवारी, जो आज भाजपा के चरवाहे बने फिरते हैं, कभी योगी आदित्यनाथ के विरुद्ध ही गोरखपुर में 2009 में समाजवादी पार्टी की ओर से लोकसभा चुनाव लड़े थे। रवि किशन शुक्ला भी पहले सपा समर्थक थे, फिर कांग्रेस की ओर से 2014 लोकसभा चुनाव में फूलपुर क्षेत्र के प्रत्याशी थे, जहां वे बुरी तरह से पिटे थे। फिर जाने क्या अक्ल आई कि 2018 तक वे भाजपा से जुड़े, और 2019 में गोरखपुर से चुनाव जीतने में सफल रहे। दिनेश लाल यादव “निरहुआ” अन्य की भांति पलटीखोर तो नहीं निकले, परंतु भाजपा जॉइन करने के अलावा इन्होंने ऐसा कोई कार्य नहीं किया, जिससे लगे कि भोजपुरी उद्योग या भोजपुरी समाज का कोई उद्धार हुआ हो जो इन कला के नाम पर फुहरता फैलाने वालों को तनिक गंभीरता से भी लेले

ऐसे लड़ेगी भाजपा?

देखिए, अगर “जय मोदी जय योगी” करने से ही किसी व्यक्ति की प्रतिबद्धता एवं परिपक्वता तय होती है, तो फिर प्रकाश जावडेकर और रविशंकर प्रसाद में क्या कमी थी? वे सारे काम छोड़के बस यही तो करते थे, परंतु धरातल की सच्चाई ये है कि इससे ना प्रशासन चलता, और न ही पार्टी।

भोजपुरी के तथाकथित सुपरस्टार्स को समझना होगा कि  “बेबी बियर पीके” और “छलकत हमरो जवानिया” के आगे भी जीवन है, परंतु ये उन लोगों को कैसे समझ में आएगा, जिन्होंने आधे से अधिक समय केवल ऑन स्क्रीन नौटंकी और फूहड़ता में ही व्यतीत किया है।

भोजपुरी हो या मैथली या हो कोई ओर दूसरी बिहार मूल की भाषा अगर इसमें लोग सेक्स से जुड़े विषयों पर सर्च कर रहे हैं तो इसके पीछे का करण मानसिकता में आया बदलाव है, जो यह पिछले

कुछ दशकों से भोजपुरी फिल्मों और गानों के जरिए भरे गए अश्लील कंटेन्ट के कारण है।

5 करोड़ से अधिक वक्ताओं के साथ मुख्य रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में बोली जाने वाली भाषा को भोजपुरी सिनेमा के स्टार्स ने धज्जियाँ उड़ाने और फूहड़ता से भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। रही सही कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी जिससे ऐसे कंटेन्ट स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हो गए और इससे न सिर्फ भोजपुरी भाषा दूषित हुआ बल्कि यौनिकता और भड़काऊपन से भर गया।

अब इन लोगों की इन हरकतों को देख सच कहें तो भोजपुरी कलाकारों के लिए भाजपा किसी रिटायरमेंट पैकेज से कम नहीं है। जीवन भर नौटंकी करो, अपने साथ साथ अवध और बिहार की संस्कृति भी मिट्टी में मिलाओ, और जब कुछ न बचे, तो राजनीति राजनीति खेलों। उसमें भी जिसकी लाठी उसकी भैंस और उसे बड़ी विडंबना तो ये है  कि ऐसे लोगों के बल पर 2024 के लोकसभा चुनाव जीतने का स्वप्न देख रही है भाजपा? हाय रे भाजपाई और तुम्हारे तथाकथित भोजपुरी सुपरस्टार

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