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आज पूरी दुनिया बढ़ती वैश्विक तापमान को लेकर गंभीर चिंता में है। पर्यावरण असंतुलन, घटते हरे-भरे जंगल, बढ़ते सीमेंट और कंक्रीट के निर्माण, वाहनों की संख्या में लगातार इज़ाफा, एयर कंडीशनर और फ्रिज जैसे उपकरणों का बढ़ता उपयोग, पिघलते ग्लेशियर और उपभोक्तावादी जीवनशैली इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के खिलाफ पहला बड़ा आंदोलन 5 सितंबर 1730 को राजस्थान के अलवर में इमरती देवी के नेतृत्व में हुआ था इस आंदोलन में 363 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। इसी तरह का एक आंदोलन 26 मार्च 1974 को उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) के चमोली जिले में शुरू हुआ था। इस आंदोलन को ‘चिपको आंदोलन’ नाम दिया गया और इसका नेतृत्व रैणी गांव की एक साहसी महिला गौरा देवी ने किया था।
कौन थीं गौरा देवी?
गौरा देवी का जन्म 1925 में उत्तराखंड के जोशीमठ क्षेत्र के लाता गांव में हुआ था। उन दिनों शिक्षा को लेकर जागरुकता का अभाव था और वे स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकीं। उनका विवाह केवल 12 वर्ष की आयु में है रैणी गांव के मेहरबान सिंह से हुआ था। 19 वर्ष की उम्र में वे मां बनीं और 22 वर्ष की होते-होते उनके पति का निधन हो गया। पहाड़ी क्षेत्रों में जीवन उन दिनों आज के मुकाबले बहुत कठिन हुआ करता था। हालांकि, गौरा देवी ने कभी भी परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी, उन दिनों भारत-तिब्बत के बीच व्यापार हुआ करता था और उसी के सहारे उनकी आजीविका चला करती थी।
1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ तो यह व्यापार बंद हो गया। इसके बाद उनके बेटे ने ठेकेदारी और मजदूरी करने परिवार का खर्चा चलाना शुरू कर दिया। इस बीच अलकनंदा नदी में 1970 में भयंकर बाढ़ आ गई जिसके बाद लोगों में बाढ़ के कारण समझने के लिए जागरूकता बढ़नी शुरू हुई। इस बीच शासन ने 1973 में जंगलों को काटकर अकूत राजस्व बटोरने की नीति बनाई।
1973 की शुरुआत में वन विभाग ने सिमोन कंपनी के साथ 300 पेड़ों की कटाई का करार कर लिया। 24 मार्च 1973 को जब मंडल में ठेकेदार और श्रमिक पेड़ काटने पहुंचे, तो सैकड़ों ग्रामीणों ने ढोल-दमाऊ बजाते हुए उनका विरोध किया। इसके बावजूद, 20 जून 1973 को वन विभाग ने फाटा के जंगल में और अधिक पेड़ों की कटाई की अनुमति दे दी। जनवरी 1974 में, वन विभाग ने रैणी गांव के जंगलों में 2500 पेड़ों की कटाई के लिए निविदा जारी कर दी। 24 मार्च 1974 को पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट के नेतृत्व में रैणी गांव की महिलाएं विरोध के लिए जंगलों में पहुंचीं।
इसके दो दिन बाद 26 मार्च 1974 को गौरा देवी ने देखा कि मजदूर बड़े आरे लेकर ऋषिगंगा के पास देवदार के जंगल काटने जा रहे हैं। उस दिन गांव के सभी पुरुष किसी काम से जिला केंद्र चमोली गए हुए थे, जिससे पूरे विरोध की जिम्मेदारी महिलाओं पर आ गई। गौरा देवी ने तुरंत शोर मचाकर गांव की अन्य महिलाओं को बुला लिया, और सभी पेड़ों से लिपट गईं। उन्होंने ठेकेदार को साफ चेतावनी दी कि जब तक वे जीवित हैं, जंगल नहीं कटने देंगे। ठेकेदार ने पहले उन्हें समझाने की कोशिश की और फिर डराने के लिए बंदूक तक दिखा दी, लेकिन गौरा देवी अडिग रहीं। उन्होंने दृढ़ता से कहा कि कुल्हाड़ी का पहला वार पेड़ पर नहीं, बल्कि उनके शरीर पर होगा। यह सुनकर ठेकेदार घबरा गया और पीछे हट गया।
चार जुलाई 1991 को चिपको आंदोलन की प्रमुख गौरा देवी का निधन हो गया। हालांकि, जंगलों की कटाई आज भी जारी है। विशालकाय बांधों और जल विद्युत परियोजनाओं के कारण पहाड़ों और वहां के निवासियों के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा है। गंगा और यमुना जैसी प्रमुख नदियां भी इस खतरे से अछूती नहीं हैं। बावजूद इसके रैणी के जंगल अब भी हरे-भरे और जीवन से भरपूर हैं।
चिपको आंदोलन का प्रभाव
इस आंदोलन ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक नई जागरूकता फैलाई और दुनिया भर में चर्चित हुआ। इसके प्रभाव से कई अन्य पर्यावरणीय आंदोलनों को भी प्रेरणा मिली। इसके बाद भारत में वन संरक्षण से जुड़े कई कड़े कानून बनाए गए और स्थानीय समुदायों को जंगलों पर अधिक अधिकार दिए गए। चिपको आंदोलन केवल पेड़ों को बचाने की मुहिम नहीं थी, बल्कि यह आम लोगों की जागरूकता और उनके अधिकारों की रक्षा का प्रतीक भी था। यह आंदोलन दर्शाता है कि संगठित होकर और शांतिपूर्ण तरीके से भी बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। गौरा देवी और उनकी साथी महिलाओं की हिम्मत ने भारत के पर्यावरण आंदोलन को एक नई दिशा दी, जिसे आज भी याद किया जाता है।