धर्म परिवर्तन किए जाने या जबरन कराए जाने को लेकर देश में आए दिन चर्चा होती रहती है और इससे जुड़े तमाम मामले अदालतों में पहुंचते हैं। धर्म परिवर्तन किन उद्देश्यों से किया गया है और इसके पीछे की सोच क्या है, इसे लेकर अदालतों ने समय-समय पर अपने निर्णय दिए हैं। हाल ही में इस्लाम धर्म अपनाने से जुड़े से एक मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कई अहम टिप्पणियां की हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन की वैधता को लेकर कहा कि इस्लाम में धर्म परिवर्तन तभी वैध माना जा सकता है जब धर्म परिवर्तन करने वाला वयस्क और स्वस्थ दिमाग वाला हो।
‘बार ऐंड बेंच’ की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी धार्मिक परिवर्तन तभी वैध माना जाता है जब किसी व्यक्ति का उसके मूल धर्म के सिद्धांतों के स्थान पर किसी नए धर्म के सिद्धांतों में ‘हृदय परिवर्तन’ और ‘ईमानदारी से विश्वास’ हो। इस्लाम में धर्म परिवर्तन को लेकर जस्टिस मंजू रानी चौहानकी पीठ ने कहा कि यह तभी वैध है जब किसी ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से और ‘ईश्वर (अल्लाह) की एकता’ व ‘मुहम्मद के पैगम्बर चरित्र’ में अपने विश्वास और आस्था के कारण इस्लाम धर्म अपनाया हो। बकौल हाईकोर्ट, धर्म परिवर्तन में आस्था और विश्वास में परिवर्तन किए जाना भी शामिल होता है। कोर्ट ने इस मामले में तौफीक अहमद द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि यदि किसी शख्स का धर्म परिवर्तन धार्मिक भावना से प्रेरित होकर नहीं किया गया है बल्कि अपने स्वार्थ के लिए मोहम्मद के पैगंबर होने की एकता में आस्था के बिना, किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए किया गया तो यह धर्म परिवर्तन सद्भावनापूर्ण नहीं होगा। कोर्ट में इस्लाम में धर्म परिवर्तन के लिए धर्म बदलने वाले वाली शख्स की अल्लाह में आस्था होना ज़रूरी माना है। अन्यथा लोग केवल अधिकार के किसी दावे के लिए आधार बनाने के लिए या विवाह से बचने के उद्देश्य से इस्लाम अपना सकते हैं जो की सही नहीं माना जाएगा।