आतंकवाद से समझौता? संजय राउत के रुख से शिवसेना (ठाकरे) की साख पर सवाल
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आतंकवाद से समझौता! संजय राउत के रुख से शिवसेना (ठाकरे) की साख पर सवाल

शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने दावा किया है कि आतंकवाद का मूल कारण गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा का अभाव है।

Vibhuti Ranjan द्वारा Vibhuti Ranjan
4 August 2025
in राजनीति
आतंकवाद से समझौता? संजय राउत के रुख से शिवसेना (ठाकरे) की साख पर सवाल

संजय राउत के बयान से राष्ट्रीय सुरक्षा को लगा धक्का।

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शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने एक चौंकाने वाला और बेहद ही गैर-जिम्मेदाराना बयान में दावा किया है। उन्होंने कहा है कि आतंकवाद का मूल कारण गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा का अभाव है। मीडिया को संबोधित करते हुए संजय राउत ने कहा, “लोग आतंकवाद की ओर क्यों रुख करते हैं? क्योंकि उनके पास आजीविका, रोजगार और शिक्षा का अभाव है। यही कारण है कि नक्सलवाद बढ़ा।” आतंकवाद का यह आश्चर्यजनक औचित्य न केवल 26/11 जैसे आतंकवादी हमलों के निर्दोष पीड़ितों की स्मृति का अपमान करता है, बल्कि राउत जैसे नेताओं की राजनीतिक नैतिकता पर भी गंभीर सवाल उठाता है, जो सामाजिक-आर्थिक बहानों के ज़रिए सामूहिक हत्या को तर्कसंगत ठहराते हैं। क्या अजमल कसाब इसलिए आतंकवादी था क्योंकि उसने दोपहर का भोजन नहीं किया था? क्या ओसामा बिन लादेन ने इमारतें इसलिए उड़ाईं क्योंकि उसे नौकरी नहीं मिली थी? यह बेतुका तर्क न केवल आतंकवाद को महत्वहीन बनाता है, बल्कि उसे खतरनाक रूप से वैध भी बनाता है।

राजनीतिक लाभ के लिए आतंक का दुरुपयोग

संजय राउत की टिप्पणी न केवल असंवेदनशील है, बल्कि राजनीति से प्रेरित भी है। ऐसे समय में जब भारत सीमा पार आतंकवाद और घरेलू उग्रवाद, दोनों से जूझ रहा है, ऐसे बयान राष्ट्रीय संकल्प को कमज़ोर करते हैं और सीधे भारत-विरोधी ताकतों के हाथों में खेल जाते हैं। संजय राउत ने आतंकवाद और नक्सलवाद को वैचारिक या धार्मिक प्रभाव से रहित सामाजिक-आर्थिक परिणामों के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया। उन्होंने दावा किया, “आतंकवाद आतंकवाद है, यह न तो हरा है, न भगवा, न ही लाल।” हालांकि सतही तौर पर यह आतंकवाद का राजनीतिकरण करने की कोशिश जैसा लगता है, लेकिन वास्तविक प्रभाव इसके ठीक विपरीत है: यह इस्लामी आतंकवाद, नक्सली हिंसा और अन्य विचारधारा-प्रेरित कृत्यों को व्यवस्थागत गरीबी का दोष देकर उन्हें छुपाता है।

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यह बयानबाजी कांग्रेस और वामपंथी वोट बैंकों को पसंद आ सकती है, लेकिन यह आतंकवाद का सामना करने के लिए आवश्यक नैतिक और राष्ट्रीय स्पष्टता को ख़तरनाक रूप से कमज़ोर करती है। भारत यह नहीं भूला है कि कैसे 26/11 के मुंबई हमलों की योजना और क्रियान्वयन प्रशिक्षित पाकिस्तानी आतंकवादियों ने स्पष्ट वैचारिक उद्देश्यों के साथ किया था। न ही हम उन नक्सलियों की क्रूरता को भूल सकते हैं जो भारतीय सुरक्षा बलों को भोजन या रोज़गार के लिए नहीं, बल्कि एक हिंसक माओवादी एजेंडे के तहत निशाना बनाते हैं।

बालासाहेब के राष्ट्रवाद से उद्धव के तुष्टिकरण की राजनीति तक

यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि बालासाहेब ठाकरे द्वारा राष्ट्रवादी आदर्शों पर खड़ी की गई पार्टी, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में इतनी गहराई तक गिर गई है। कभी हिंदू गौरव और प्रखर राष्ट्रवाद की प्रतीक रही शिवसेना, अब कांग्रेस और वामपंथियों की ही बातें दोहरा रही है। बालासाहेब के निधन के बाद, उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाकर विचारधारा की बजाय राजनीतिक स्वार्थ को चुना। तब से, शिवसेना (यूबीटी) ने न केवल अपने मूल आधार को त्याग दिया है, बल्कि अपने राष्ट्रवादी रुख को भी कमज़ोर कर दिया है।

उद्धव गुट का एक प्रमुख चेहरा, संजय राउत, इस वैचारिक पतन का मुखपत्र बन गए हैं। आतंकवाद के बहाने ढूंढ़ने की उनकी कोशिश, छद्म उदारवादी, सत्ता-विरोधी रुख अपनाकर राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने की पार्टी की हताशा को दर्शाती है। लेकिन ऐसा करके, वे न केवल मूल्यों से समझौता कर रहे हैं, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

ऑपरेशन सिंदूर पर भी किया था हमला

यह पहली बार नहीं है जब संजय राउत ने अपनी सीमाएं लांघी हों। कुछ हफ़्ते पहले ही, 27 मई को, उन्होंने भारत के सीमा पार आतंकवाद-रोधी अभियान, ऑपरेशन सिंदूर को “विफल” घोषित करके एक और विवाद खड़ा कर दिया था। पहलगाम में 26 नागरिकों की हत्या के जवाब में शुरू किए गए इस अभियान में पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया था। हालांकि इस हमले का विवरण गोपनीय रखा गया है, लेकिन कई रिपोर्टों में आतंकी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचने की बात कही गई है।

हालांकि, संजय राउत ने बिना किसी सबूत के इसे खारिज कर दिया और कहा, “ऑपरेशन सिंदूर विफल रहा। राष्ट्रहित में, विपक्ष इस बारे में ज़्यादा बात नहीं करना चाहता।” उन्होंने आगे बढ़कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की और दावा किया कि उन्हें “प्रायश्चित” के तौर पर मंत्रिमंडल से हटा दिया जाना चाहिए। इन बयानों ने न केवल भारतीय सशस्त्र बलों और सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल गिराया, बल्कि पाकिस्तान और उसके समर्थकों को बयानबाज़ी का हथियार भी मुहैया कराया। इस व्यवहार से यह स्पष्ट होता है कि संजय राउत केवल असहमति ही नहीं व्यक्त कर रहे हैं, बल्कि तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करते हैं ऐसे बयान

संजय राउत द्वारा आतंकवाद को तर्कसंगत ठहराने, भारत के सैन्य अभियानों पर सवाल उठाने और विचारधाराओं से गरीबी पर दोष मढ़ने की बार-बार की गई कोशिशें सिर्फ़ राजनीतिक भूल नहीं हैं, ये राष्ट्रीय ख़तरा हैं। अगर नेता आर्थिक स्थिति पर उंगली उठाकर आतंकवादी कृत्यों को सही ठहराने लगें, तो फिर सीमा रेखा कहां खींची जाए? क्या हमें हर हिंसक कृत्य को भूख या बेरोज़गारी का नतीजा बताकर सही ठहराना चाहिए? इस तरह के विचार अतिवादी औचित्य के लिए ख़तरनाक दरवाज़े खोलते हैं और आतंकवाद के ख़िलाफ़ सामूहिक राष्ट्रीय लड़ाई को कमज़ोर करते हैं।

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) को जवाब देना होगा कि कैसे एक अटूट राष्ट्रवाद पर आधारित पार्टी अब एक ऐसे संगठन में बदल गई है, जो वैचारिक माफ़ी मांगने और आतंकवाद को उचित ठहराने में लिप्त है। एक लोकतंत्र के रूप में, भारत असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्व देता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद पीड़ितों की गरिमा की कीमत पर नहीं। संजय राउत को देश से माफ़ी मांगनी चाहिए और अगर शिवसेना (यूबीटी) में बालासाहेब ठाकरे की विरासत का ज़रा भी अंश बचा है, तो उसे सार्वजनिक रूप से ऐसे अपमानजनक बयानों से दूरी बनानी चाहिए और अपनी राष्ट्रवादी जड़ों की ओर लौटना चाहिए।

Tags: hungerPovertySanjay RautShivsena(UBT)Terrorismआतंकवादगरीबीभूखशिवसेना-यूबीटीसंजय राअत
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