Waqf Amendment Bill पास होने के साथ सियासी संग्राम तेज हो गया है। कई मुस्लिम संगठन इसके विरोध में उतर आए हैं। ओवैसी, समेत कई दल और नेता सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। इसके बाद आदतन अब अपने वोट बैंक को साधने के लिए कांग्रेस भी बहती गंगा में हाथ धोने के लिए पहुंच गई है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है। उनके एक सांसद ने याचिका लगा भी दी है। अब सवाल ये उठता है कि कांग्रेस कोर्ट में कई हार मिलने के बाद भी संसद के फैसलों को लेकर कोर्ट क्यों पहुंच जाती है?
कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश X पोस्ट में लिखा ‘कांग्रेस बहुत जल्द वक्फ संशोधन बिल की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी।’ जयराम रमेश ने अपनी पोस्ट में बताया कि वक्फ बिल से पहले भी कांग्रेस ने CAA, RTI संशोधन 2019, चुनाव नियमावली 2024 और प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी है।
क्या कहते हैं लीगल एक्सपर्ट?
कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षियों ने वक्फ बिल को लेकर कोर्ट जाने की बात कही है। ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि क्या कोर्ट इस मामले में सुनवाई करेगा या नहीं। अगर सुनवाई होती है तो क्या विपक्ष इस केस में जीतेगा। आइये जानें इसे लेकर लीगल एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
कोर्ट के पास कानून रद्द करने का अधिकार
भारत के संविधान के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट संविधान का संरक्षक है। वो संसद के बनाए कानून की समीक्षा करने के बाद संविधान के अनुरूप न मिलने पर उसे रद्द कर सकता है। वहीं संसद को देश के लिए कोई भी कानून बनाने का अधिकार है। इसके साथ ही वो संविधान में संशोधन भी कर सकती है लेकिन मूल ढांचे में संसद कुछ नहीं कर सकती है।
ऐसे में NBT से बात करते हुए वरिष्ठ वकील अनिल कुमार सिंह श्रीनेत ने केस में आगे की संभावनाओं को लेकर बात की है। उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 13 में के आधार पर कानून से मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर सुप्रीम कोर्ट उसे रद्द कर सकता है। इसके लिए कोर्ट हैबियस कॉर्पस, मैंडमस, सर्टियोरारी, प्रोहिबिशन और क्वो वारंटो जैसे रिट्स जारी कर सकती है। हालांकि, इसके लिए याचिका दायर करने वाले को ये सिद्ध करना होगा कि संबंधित कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
क्या हो सकता है चुनौती का आधार?
अनुच्छेद 25: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
अनुच्छेद 26: धार्मिक संस्थानों के प्रशासन का अधिकार
अनुच्छेद 29 और 30: अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार
वरिष्ठ वकील अनिल सिंह की मानें तो इस बात की संभावना है कि कोर्ट इसकी समीक्षा करे। हालांकि, इस बात की भी पूरी संभावना है कि कोर्ट इसे विधायी नीति का विषय मानते हुए खारिज कर दे। क्योंकि, इस विधेयक को अनुच्छेद 25, अनुच्छेद 26, अनुच्छेद 29 और 30 का उल्लंघन साबित कर पाना मुश्किल है।
पहले भी कोर्ट कर चुका है खारिज
फरवरी 2023 में उम्मीदवार को दो सीटों से चुनाव लड़ने से रोकने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि कानून बनाना संसद की संप्रभुता है। अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। तत्कालीन CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि यह संसद की विधायी नीति का विषय है। वक्फ संशोधन विधेयक को लेकर भी कोर्ट का ऐसा ही रुख हो सकता है। हालांकि, ये कोर्ट के अंतिम फैसले पर निर्भर करता है।
बता दें काफी बहस और हंगामे के बाद वक्फ संशोधन विधेयक (Waqf Amendment Bill) संसद के दोनों सदनों में पास हुआ है। अब विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बन जाएगा। अब देखना होगा कि विपक्ष पर्याप्त सपोर्ट न होने के बाद भी क्या कोर्ट में अपनी बात को सिद्ध कर पाता है या अन्य हार की तरह कोर्ट में फिर से पटखनी खाकर वापस आ जाता है।