बिहार के पूर्वी चंपारण में महात्मा गांधी की विरासत को पुनर्जीवित करने की कोशिश में उनके परपोते तुषार गांधी की कोशिश संवाद और शांति के बजाय विवाद और राजनीतिक ड्रामे में तब्दील हो गई। तुर्कौलिया गांव में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान तुषार गांधी को अपमानजनक रूप से मंच से हटने को कहा गया। यह वही गांव है, जो भारत की स्वतंत्रता संग्राम से गहराई से जुड़ा हुआ है। स्थानीय मुखिया (ग्राम प्रधान) ने खुले मंच से तुषार गांधी से कहा, “आप यहां से चले जाइए। हम आपके कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनना चाहते। आप केवल गांधी नाम ढो रहे हैं। यह गांधीवादी सोच नहीं है। आप महात्मा गांधी के वंशज नहीं हो सकते। आपको खुद पर शर्म आनी चाहिए।” स्थिति तनावपूर्ण होती देख तुषार गांधी को कार्यक्रम से बाहर जाना पड़ा।
बदलाव से बवाल तक
तुषार गांधी इन दिनों ‘बदलाव यात्रा’ नाम से एक पदयात्रा निकाल रहे हैं, जो महागठबंधन (कांग्रेस, राजद और वाम दल) के समर्थन में है। उनकी यह यात्रा भितिहरवा आश्रम से शुरू हुई थी, जहां से महात्मा गांधी ने 1917 में अपने सत्याग्रह की शुरुआत की थी। लेकिन महात्मा गांधी की समावेशी और रचनात्मक विचारधारा के विपरीत, तुषार गांधी का भाषण टकराव भरा और राजनीतिक आरोपों से भरा हुआ बताया गया। तुर्कौलिया में ऐतिहासिक नीम के पेड़ के पास एक सभा में उन्होंने वर्तमान सरकार पर तीखे हमले किए, जिससे माहौल बिगड़ गया।
पंचायत प्रमुख विनय साह, जो पहले कार्यक्रम के समर्थक थे, ने मंच पर आकर विरोध दर्ज किया और तुषार गांधी को “कांग्रेस का गुलाम” कहा, जो “नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार जैसे नेताओं को बदनाम कर रहा है, जिन्होंने गरीबों के लिए काम किया है।” हालात बिगड़ते देख तुषार गांधी ने कार्यक्रम छोड़ दिया, लेकिन जाते-जाते खुद को “पीड़ित” बताते हुए अपने परिवार के नाम का हवाला दिया।
विरासत का राजनीतिक इस्तेमाल?
एक ऐतिहासिक स्थल पर महात्मा गांधी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम, कुछ ही देर में एक पक्षपातपूर्ण राजनीतिक मंच में बदल गया। तुषार गांधी ने खुद की तुलना उस दौर के महात्मा गांधी से करते हुए कहा, “ब्रिटिश राज में जैसे बापू को रोका गया था, वैसे ही हमें आज रोका गया है।”
इस तुलना पर कई पक्षों से तीखी आलोचना हुई है। लोगों ने इसे विडंबना बताया कि जो व्यक्ति लोकतंत्र की बात करता है, वह खुद आलोचना नहीं झेल सका और फिर दूसरों पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगा बैठा।
वंशवाद बनाम जनता की सोच
तुषार गांधी की प्रतिक्रिया उस सोच को उजागर करती है जिसमें कुछ राजनैतिक वंशज यह मानते हैं कि उनका पारिवारिक नाम उन्हें सम्मान का अधिकारी बना देता है, चाहे उनके कर्म कुछ भी हों। लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए एक ग्राम प्रधान की आलोचना को झेल पाने में असमर्थ रहना, एक बड़े सवाल को जन्म देता है, क्या यह सचमुच गांधीवाद है?
आलोचकों का मानना है कि तुषार गांधी अपने परदादा की शिक्षाओं को आगे बढ़ाने के बजाय केवल नाम का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके बर्ताव से यह संकेत मिलता है कि लुप्त होती विचारधारा को बचाने के लिए बीते युग की नैतिक पूंजी का सहारा लिया जा रहा है, जबकि ज़मीन से जुड़ी जनता की भावनाओं का कोई आदर नहीं है।
असली अपमान चंपारण का
इस पूरी घटना में सबसे बड़ा नुकसान महात्मा गांधी की छवि का नहीं, बल्कि चंपारण की उस ज़मीन का हुआ, जिसे राजनीति ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। जहां कार्यक्रम सामाजिक जागरूकता और एकता का प्रतीक बन सकता था, वहीं यह एक राजनीतिक तमाशे में बदल गया। जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, यह घटना हमें यह याद दिलाती है कि केवल विरासत से मंच नहीं मिलता, मंच पाने के लिए आचरण और ईमानदारी ज़रूरी होती है।
अगर महात्मा गांधी का जीवन सच्चाई, विनम्रता और जनसेवा का प्रतीक था, तो तुषार गांधी का चंपारण में किया गया बर्ताव उस आत्मा के बिल्कुल विपरीत था। आज के भारत में जनता अब यह फर्क समझ चुकी है कि नाम नहीं, काम बोलता है।