दुनिया की कूटनीतिक बिसात पर अब भारत निर्णायक खिलाड़ी बनकर उभरा है। रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका, यूरोप और रूस सभी की रणनीति एक ही दिशा में केंद्रित है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने चुनावी एजेंडे को साधने के लिए शांति चाहते हैं, वहीं रूस और यूक्रेन दोनों ही मानते हैं कि केवल भारत ही उन्हें सम्मानजनक रास्ता दिला सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थ के रूप में भारत
नवंबर 2024 में हुए संघर्ष के बाद से स्थिति लगातार तनावपूर्ण रही है। लेकिन इस बीच भारत ने संतुलित कूटनीति के जरिए दोनों पक्षों का विश्वास हासिल किया। न्यायिक रिपोर्टों और वैश्विक मंचों पर भी माना जा रहा है कि मास्को और कीव के बीच किसी भी शांति-वार्ता का सूत्रधार अगर कोई हो सकता है, तो वह नई दिल्ली ही है।
रूस के लिए सीधा अमेरिकी दबाव स्वीकार करना असंभव है। वहीं यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की भी यूरोप और अमेरिका के इशारों पर चलते दिखना नहीं चाहते। ऐसे में मोदी की छवि उन्हें “तटस्थ और विश्वसनीय” मध्यस्थ का विकल्प देती है।
ट्रंप की जल्दबाज़ी और यूरोप की बेचैनी
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से युद्ध को शीघ्र समाप्त करने की इच्छा जताई है। लेकिन इसके पीछे साफ-साफ आर्थिक और राजनीतिक गणित है। अमेरिका चाहता है कि यूक्रेन के 16 ट्रिलियन डॉलर के रेयर अर्थ मिनरल्स पर उसकी पकड़ बने। अमेरिकी कंपनियां युद्धोत्तर पुनर्निर्माण में अरबों डॉलर के ठेके हासिल करें और रूस पर लगे प्रतिबंधों को ढील देकर अमेरिकी उद्योगपति नए अवसरों का लाभ उठाएं।
यूरोप की स्थिति इससे अलग है। जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों ने अब तक करीब 200 अरब डॉलर से अधिक की राशि यूक्रेन युद्ध में झोंक दी है। यदि अचानक भारत की मध्यस्थता से युद्ध समाप्त हो गया तो यूरोप का निवेश और राजनीतिक दांव दोनों डूब सकते हैं। यही कारण है कि यूरोपीय मीडिया में लगातार मोदी और ट्रंप को लेकर नकारात्मक लीक सामने लाई जा रही हैं।
भारत पर टैरिफ-दबाव की राजनीति
ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में भारत पर 50% का टैरिफ लगाकर दबाव बनाने की कोशिश की है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे तीन प्रमुख कारण हैं—
घरेलू राजनीति: ट्रंप अपने समर्थकों को दिखाना चाहते हैं कि वे सख्त और आत्मनिर्भर हैं।
पाकिस्तान समीकरण: अमेरिका पाकिस्तान के खनिज संसाधनों पर भी नजर गड़ाए बैठा है।
डॉलर की चुनौती: भारत जैसे देश वैश्विक व्यापार में डेडॉलराइजेशन को बढ़ावा दे रहे हैं, जो अमेरिका की वित्तीय सत्ता को कमजोर कर रहा है।
हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह का दबाव भारत को कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूती देगा।
मोदी की कूटनीति: नई विश्व व्यवस्था की धुरी
आज स्थिति यह है कि अमेरिका चाहता है कि भारत उसके साथ खड़ा हो। रूस चाहता है कि उसकी संप्रभुता को सम्मान दिलाए। यूक्रेन चाहता है कि उसकी वैधता सुनिश्चित करे। इन सबसे इतर यूरोप चाहता है कि भारत की बढ़ती भूमिका पर अंकुश लगे। दुनिया के चारों बड़े ध्रुव एक साथ भारत पर निर्भर हैं। यह वही स्थिति है जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद पहली बार देखने को मिल रही है।
भारत अब किसी का मोहरा नहीं, बल्कि पूरी बिसात है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता और स्वतंत्र विदेश नीति ने देश को वहां खड़ा कर दिया है, जहां से वह आने वाले वर्षों में वैश्विक शक्ति संतुलन की धुरी बन सकता है। इन सबसे यह साफ है कि जो भी शक्ति भारत को नज़रअंदाज़ करेगी, वह खेल से बाहर हो जाएगी और जो भारत को महत्व देगी, वही भविष्य की विश्व व्यवस्था तय कर पाएगी। आज का भारत सिर्फ “भागीदार” नहीं, बल्कि निर्णायक शक्ति है और यही 21वीं सदी का नया भू-राजनीतिक सत्य है।