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भारत में ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ का औचित्य…?

एक गहरी साजिश के तहत, भारत में ‘मूल निवासी दिवस’ को ‘आदिवासी दिवस’ बनाया गया हैं। यह देश की एकता तोड़ने वाला कृत्य हैं और इसे पूरी ताकत लगाकर रोकना चाहिए. भारत में हम सभी मूल निवासी हैं, यही सत्य हैं और यही भाव होना चाहिए..!

Prashant Pole द्वारा Prashant Pole
8 August 2025
in इतिहास, मत
भारत में ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ का औचित्य…?

भारत में ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ का औचित्य...?

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अगले कल अर्थात शनिवार 9 अगस्त को ‘विश्व मूलनिवासी दिवस’, विश्व के कुछ हिस्सों मे मनाया जाएगा। वामपंथियों ने, ‘फॉल्ट लाईन चौडी करने’ की रणनीति के अंतर्गत, उसे भारत मे भी मनाने का प्रयास किया, जिसे दुर्भाग्य से कांग्रेस की सरकारों ने खूब उठाया। अन्य दलों की सरकारें भी, कुछ वर्ष पहले तक, भारत को तोडने वाले इस प्रवाह मे बहती दिखी… किंतु, इस दिवस का भारत से क्या संबंध..? इस विषय पर मेरे आलेख को पुनः प्रेषित कर रहा हूं।

9 अगस्त को ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ (World Indigenous Day) हैं. सन 1994 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिवस की घोषणा की थी. इस कल्पना को लेकर सन 1982 में Working Group on Indigenous People इस समूह की पहली बैठक 9 अगस्त को हुई थी. इसलिए 9 अगस्त को ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ मनाया जाता हैं।

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इसके पीछे संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका बड़ी स्पष्ट हैं. उनके अनुसार विश्व के लगभग 90 देशों में 47.6 करोड़ मूल निवासी रहते हैं, जो विश्व की जनसंख्या के 5% के बराबर हैं. किन्तु दुनिया भर के गरीबों में मूल निवासियों की संख्या 15% हैं. ऐसे मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए, उनका जीवन स्तर बढ़ाने के लिए, संयुक्त राष्ट्र संघ, यह दिवस मनाता हैं.

प्रश्न हैं, मूल निवासी कौन हैं ? हम सभी जानते हैं, की सन 1492 में भारत जाने के प्रयास में, कोलंबस अमेरिका पहुच गया. पहुंचने के बाद उसे लगा, यही ‘इंडिया’ हैं. इसलिए वहां पहले से जो लोग रहते थे, उन्हे ‘इंडियन’ नाम दिया गया. बाद में कोलंबस की गलतफहमी दूर हुई और उसे पता चला की यह इंडिया (भारत) नहीं हैं. किन्तु वहां के मूल रहवासियों को दिया गया नाम, ‘इंडियन्स’, वैसे ही चलता रहा. पहले उन्हे ‘रेड इंडियन्स’ कहा जाता था. आज ‘अमेरिकन इंडियन्स’ (या नेटिव अमेरिकन्स) कहा जाता हैं.

ये हैं मूल निवासी..!

1492 मे, जब सबसे पहले कोलंबस के साथ यूरोपियन्स वहां पहुचे, तब वहां के मूल निवासी, अर्थात अमेरिकन इंडियन्स की संख्या, हेनरी डोबीन्स (Henry F Dobyns) के अनुसार 1 करोड़ 80 लाख थी. जनसंख्या वृद्धि के अनुपात के अनुसार, आज यह संख्या 15 करोड़ के लगभग होना चाहिए थी. लेकिन पिछले चार सौ / पांच सौ वर्षों में, अमेरिका में बसने आए अंग्रेज़, फ्रेंच, स्पेनिश आदि यूरोपियन्स ने इन मूल निवासियों पर जबरदस्त अत्याचार किए, उनका वंशच्छेद किया। कई फैलने वाली बीमारियां इन ‘इंडियन्स’ के बीच लायी गई, जिनके कारण बड़ी संख्या में ये अमेरिकी इंडियन्स चल बसे. इन सबके कारण 2010 की अमेरिकी जनगणना के अनुसार, इन मूल निवासियों की संख्या हैं, 55 लाख, जो अमेरिकी जनसंख्या की 1.67 % मात्र हैं.

ये हैं अमेरिका के मूल निवासी…!

ऑस्ट्रेलिया में सर्वप्रथम सन 1770 में जेम्स कुक नाम का ब्रिटिश सेना का लेफ्टिनेंट पहुंचा।तब ब्रिटिश सरकार अपने कैदियों को रखने के लिए एक बड़ा सा द्वीप खोज रही थी. जेम्स कुक और उसके साथी जोसेफ बैंक्स के कहने पर ब्रिटिश सरकार ने ऑस्ट्रेलिया नाम का वो द्वीप इस कार्य के लिए निश्चित किया। 13 मई 1787 को 11 जहाजों में भरकर, डेढ़ हजार से ज्यादा अंग्रेज़ इस द्वीप पर पहुंचे, जिसमें 737 कैदी थे। यह ऑस्ट्रेलिया में उपनिवेशवाद की शुरुआत थी।

उस समय ऑस्ट्रेलिया में जो मूल निवासी रहते थे, वे दो प्रमुख समूहों में थे और उनके नाम भी इन अंग्रेजों ने ही रखे। वे थे – Torres Strait Islanders और Aboriginal। दोनों को मिलकर, उन दिनों उनकी कुल संख्या 10 लाख से ज्यादा थी। जनसंख्या वृद्धि के अनुपात के अनुसार, आज वह 60 लाख से ज्यादा होनी चाहिए थी, लेकिन 2016 की जनगणना के अनुसार यह मात्र 7 लाख 90हजार हैं, जो ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या का मात्र 3.3% है।

ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की संख्या इतनी कम कैसे हुई..? वही, जो अमेरिका में हुआ। इन मूल निवासियों का बर्बरता से नरसंहार किया गया और बाहरी देशों से आए नागरिकों के साथ आई बीमारियों के कारण इन मूल निवासियों की स्वाभाविक दिखने वाली मृत्यु भी हुई।

अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों में मूल निवासियों की हालत अत्यंत खराब थी। इन यूरोपियन्स ने उनको कहीं का नहीं छोड़ा था। अमेरिका ने उनको ‘सिविलियन’ बनाने की ठानी। पहले राष्ट्राध्यक्ष, जॉर्ज वॉशिंग्टन के जमाने से इन मूल निवासी अर्थात ‘अमेरिकन इंडियन्स’ को जबरदस्ती ‘सिविलियन’ बनाने की नीति आज तक जारी है। इन सारे मूल निवासियों को इन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने जड़ों से तोड़ा हैं।  वे कही के नहीं बचे हैं। अनेक अमेरिकी मूल निवासी, आज गरीबी रेखा के अंदर आते हैं।

ऐसे वंचित और उपेक्षित लोगों के लिए है ‘मूल निवासी दिवस’

भला भारत में इस दिवस का क्या औचित्य ? यहां तो हम सभी मूल निवासी हैं। हां, मुस्लिम आक्रांता जरूर बाहर से आए थे। ये हमलावर ईरान (पर्शिया), इराक, अफगानिस्तान, तुर्कस्तान, किर्गिस्तान, उजबेकिस्तान… आदि अनेक देशों से भारत भूमि पर आए। ऐसे में यदि संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार चलें तो, इन आक्रांताओं को छोडकर, भारत में सभी मूल निवासी हैं।

बाहर से तो अंग्रेज़ भी आए थे, किन्तु 1947 में स्वतंत्रता मिलने के पश्चात वे भारत छोडकर चले गए। तो फिर भारत में इस ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ का बहुत ज्यादा औचित्य नहीं होना चाहिए। विश्व के अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के मूल निवासियों के हक के प्रति सहानुभूति और समर्थन, इतनी सीमित भूमिका हमारी होनी चाहिए थी।

किन्तु ऐसा हुआ नहीं, आजकल अपने देश में भी यह दिवस मनाने का चलन प्रारंभ हुआ हैं। अनेक राज्य इसे ‘आदिवासी दिवस’ के रूप में मनाते हैं. छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश जैसे राज्य तो कुछ वर्ष पहले तक, 9 अगस्त को ऐच्छिक अवकाश घोषित करते थे।

यह सब कैसे हो गया…?

इसका उत्तर हैं, वामपंथियों की एक बहुत सोची समझी रणनीति

अब इसमें वामपंथ कहां से आया ?

वामपंथ की मूल सोच हैं, समाज में वर्गसंघर्ष खड़ा करना। प्रस्थापित व्यवस्था के विरोध में संघर्ष निर्माण करना। इस संघर्ष से अराजकता फैलेगी और अराजकता में ही क्रांति के बीज होते हैं, इसलिए इसमें से सर्वहारा क्रांति होगी। अर्थात वर्गसंघर्ष के लिए ‘मूल निवासी दिवस’ एक अच्छा साधन हैं। इसका पूरा फायदा वामपंथी विचारकों ने उठाया।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ‘मूल निवासी दिवस’ की घोषणा होने के बाद, अपने देश में ‘आदिवासी ही इस देश के असली (मूल) नागरिक हैं, और बाकी सारे बाहर से आए हैं’ यह विमर्श चल पड़ा। ‘आर्य बाहर से आएं’ यह सिद्धांत तो स्थापित था ही, जो शालाओं में भी पढ़ाया जाता था। यह सिद्धांत अंग्रेजों ने बनाया था। उन्होने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों में जाकर, वहाँ के मूल निवासियों को भगाकर या मारकर अपना साम्राज्य प्रस्थापित किया था। इसलिए ‘भारत में भी सारे बाहर से ही आएं हैं, तो अंग्रेजों के आने से कोई फर्क नहीं पड़ता’ यह उस सिद्धांत का आधार था।

किन्तु स्वतंत्रता मिलने के बाद भी, हमारे वामपंथी विचारकों द्वारा इस प्रकार का विमर्श खड़ा करना यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण था। आज से चौदह वर्ष पहले, अर्थात 12 जनवरी, 2011 को ‘द हिन्दू’ इस अंग्रेजी समाचार पत्र में एक आलेख छपा, “India, largely a country of immigrants’। इस में कहा गया, “If North America is predominantly made up of new immigrants, India is largely a country of old immigrants. इस में ज़ोर देकर प्रतिपादित किया गया हैं, की इस देश के मूल निवासी तो केवल आदिवासी ही हैं, जो 8 % हैं. बाकी सारे 92% लोग बाहर से आए हुए हैं। These facts lend support to the view that about 92 per cent of the people living in India are descendants of immigrants.“

इस बात का आधार क्या हैं…?

अंग्रेजों ने लिखी हुई, The Cambridge History of India (Volume 1) का उद्धहरण इस आलेख के लिए लिया गया हैं।

इससे बड़ा व्यंग क्या हो सकता हैं…? ऐसे अनेक आलेख पिछले कुछ वर्षों में माध्यमों में आए हैं। ‘आर्य बाहर से आए’ यह विमर्श अब गलत साबित हुआ हैं. सारे तथ्य, प्रमाण और DNA की जांच से यह सिध्द हुआ हैं, की हम सब इसी भारत देश के मूल निवासी हैं। इसके ठीक विपरीत, OIT (Out ऑफ India Theory) की मान्यता बढ़ रही हैं। इस सिद्धांत के अनुसार भारत जैसे संपन्न देश से, कुछ समुदाय भारत से बाहर स्थांतरित हुए हैं। केल्टिक समुदाय, येजीदी समुदाय इनके उदाहरण हैं। कोनराड ईस्ट जैसे विचारकों ने इसे प्रतिपादित किया हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ, लगभग पांच सौ से एक हजार वर्षों में, जिन देशों में बाहर से आए लोगों ने सत्ता और शासन प्राप्त किया, उन्ही देशों के मूल निवासियों को यह ‘मूल निवासी’ का दर्जा दे रहा हैं। किन्तु अपने देश में तो वेद / उपनिषद / पुराण कई हजार वर्ष पहले के हैं। सारे उदाहरण, सारे प्रमाण, सारे तथ्य कम से कम आठ / दस हजार वर्षों तक के इतिहास तक हमे पहुचाते हैं। अर्थात मुस्लिम आक्रांताओं का अपवाद छोड़ा, तो हम सभी मूल निवासी हैं।

और जिन्हे ‘आदिवासी’ कहा जाता हैं, वे ‘आदिम युग’ में जीने वाले आदिवासी नहीं हैं, अपितु वनों में, ग्रामों में रहने वाले ‘जनजातीय समाज’ हैं। ये अत्यंत प्रगत और प्रगल्भ समाज हैं। इनका जल व्यवस्थापन, इनका समाज जीवन, इनका पर्यावरण के साथ जीना…. सभी अद्भुत हैं। लगभग पांच सौ वर्ष पहले, हमारे गोंडवाना की वनवासी रानी दुर्गावती, बंदूक चलाने में माहिर थी, ऐसा समाज वंचित, शोषित कैसे हो सकता हैं ? इसलिए मूल निवासियों में मामले में हमारी तुलना अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ करना गलत और अन्यायपूर्ण हैं।

एक गहरी साजिश के तहत, भारत में ‘मूल निवासी दिवस’ को ‘आदिवासी दिवस’ बनाया गया हैं।यह देश की एकता तोड़ने वाला कृत्य हैं। इसे पूरी ताकत लगाकर रोकना चाहिए। भारत में हम सभी मूल निवासी हैं, यही सत्य हैं और यही भाव होना चाहिए..!

– प्रशांत पोळ

(यह लेख सुप्रसिद्ध लेखक और विचारक प्रशांत पोळ जी के लेख का पुनर्प्रकाशन है)

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