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डॉ. मुखर्जी से मोदी तक: भारतीय जनसंघ का विचार भारत का स्वरूप कैसे गढ़ गया

21 अक्टूबर 1951 यही वह दिन था जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिल्ली के एक छोटे से सम्मेलन में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। आज़ादी के चार साल बाद उनका यह कदम केवल एक राजनीतिक संगठन की नींव नहीं था, बल्कि उस विचारधारा का औपचारिक अवतरण था।

Vibhuti Ranjan द्वारा Vibhuti Ranjan
21 October 2025
in इतिहास, चर्चित, ज्ञान, धर्म, भारत, भू-राजनीति, मत, राजनीति, समीक्षा, संस्कृति
डॉ. मुखर्जी से मोदी तक: भारतीय जनसंघ का विचार भारत का स्वरूप कैसे गढ़ गया

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जिस एक भारत का सपना देखा था, वह आज साकार होता दिखता है।

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भारत के राजनीतिक इतिहास में कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो केवल संगठन की नहीं, बल्कि एक विचार की जन्मतिथि होती हैं। 21 अक्टूबर 1951 यही वह दिन था जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिल्ली के एक छोटे से सम्मेलन में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। आज़ादी के चार साल बाद उनका यह कदम केवल एक राजनीतिक संगठन की नींव नहीं था, बल्कि उस विचारधारा का औपचारिक अवतरण था जो राष्ट्रवाद को भारत की राजनीति का केंद्र बनाना चाहती थी। उस समय भारत में नेहरूवादी समाजवाद और कांग्रेस की एकछत्र सत्ता का युग था। लेकिन, जनसंघ ने एक वैकल्पिक आवाज़ दी, वह आवाज़ जो कहती है कि भारत को अपनी पहचान पश्चिम की विचारधाराओं से नहीं, बल्कि अपने सांस्कृतिक स्रोतों से मिलनी चाहिए।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कोई साधारण नेता नहीं थे। वे एक शिक्षाविद, अर्थशास्त्री, प्रशासक और राष्ट्रवादी चिंतक थे। बंगाल विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति के रूप में उन्होंने शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ा। आज़ादी के बाद जब नेहरू सरकार ने कश्मीर को विशेष दर्जा देने का निर्णय लिया, तो मुखर्जी ने उसे भारत की एकता पर प्रहार माना। उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा देकर जनसंघ की स्थापना की, और कहा एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे। यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि उस युग के लिए एक चेतना का सूत्रवाक्य था।

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जनसंघ का उदय ऐसे समय में हुआ जब कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को अपने राजनीतिक प्रभुत्व में बदल दिया था। देश में वामपंथी और सेकुलर विचारधाराएं तेजी से पैर पसार रही थीं। भारत का नेतृत्व पश्चिमी मॉडलों समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता से प्रेरणा ले रहा था, जबकि जनसंघ इस धारणा को चुनौती देता था कि राष्ट्रवाद का अर्थ सांप्रदायिकता है। उनका मानना था कि भारत की आत्मा उसकी सभ्यता, संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता के भारतीय रूप में बसती है, जो विभाजनकारी नहीं, समन्वयकारी है। जनसंघ का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद इसी विचार पर टिका था कि भारत का राष्ट्रभाव वेदों, उपनिषदों और रामायण-महाभारत की उस चेतना से निर्मित हुआ है, जो सहिष्णुता और एकता में विश्वास करती है।

हालांकि, 1950 और 1960 के दशक में जनसंघ को राजनीतिक स्तर पर सीमित सफलता मिली, पर वैचारिक स्तर पर उसने भारतीय राजनीति की धारा बदलनी शुरू कर दी थी। जब दूसरे दल समाजवादी और वर्ग संघर्ष की भाषा बोल रहे थे, जनसंघ राष्ट्र-प्रेम और भारतीयता की भाषा बोल रहा था। इसकी लोकप्रियता का केंद्र उत्तर भारत में तेजी से बढ़ने लगा। स्वयंसेवक संगठन आरएसएस के साथ इसके वैचारिक संबंध ने इसे मजबूत ढांचा दिया। पार्टी का संगठन अनुशासन, त्याग और विचारनिष्ठा पर आधारित था, जो इसे अन्य दलों से अलग करता था।

1967 में देश की राजनीति ने करवट ली। पहली बार कांग्रेस की पकड़ ढीली पड़ी और जनसंघ ने कई राज्यों में सत्ता में साझेदारी की। इस दौर ने साबित किया कि जनसंघ अब केवल विचार का प्रतीक नहीं रहा, वह राजनीति की वास्तविक शक्ति बन रहा था। परंतु 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया, तो जनसंघ के नेताओं को भी जेल में डाल दिया गया। यहीं से भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा शुरू हुई और जनसंघ ने उस परीक्षा में अपने संघर्ष, संयम और समर्पण से भारतीय जनता के मन में जगह बना ली।

आपातकाल के बाद जब विपक्षी दल एकजुट हुए, तब जनसंघ ने अन्य दलों के साथ मिलकर जनता पार्टी बनाई। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी और डॉ. मुखर्जी के विचार पहली बार सत्ता में पहुंचने की स्थिति में आए। हालांकि, यह प्रयोग ज्यादा दिन नहीं चल सका, क्योंकि विचारधारात्मक मतभेदों ने जनता पार्टी को तोड़ दिया। लेकिन, यह टूटन भी एक नए जन्म का संकेत थी। 1980 में, इसी वैचारिक प्रवाह ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रूप में पुनर्जन्म लिया और तब से आज तक यह धारा निरंतर प्रवाहित है।

डॉ. मुखर्जी के जनसंघ से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की भाजपा तक, यह यात्रा विचार की स्थायित्व का प्रमाण है। भाजपा ने संगठनात्मक रूप से जनसंघ की मूल आत्मा को बनाए रखा। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, आर्थिक स्वावलंबन और राष्ट्रीय एकता। वाजपेयी के नेतृत्व में इस विचार ने समरसता और मध्यमार्ग अपनाया, जबकि नरेंद्र मोदी के दौर में इसने आत्मविश्वास और निर्णायकता का रूप लिया। मोदी का सबका साथ, सबका विकास उसी राष्ट्रवादी सोच का विस्तार है जो जनसंघ के समय में एकात्म मानववाद के रूप में प्रस्तुत हुई थी। पं. दीनदयाल उपाध्याय की वह विचारधारा जो राज्य और समाज को एकजुट इकाई मानती थी।

जनसंघ ने भारत को राजनीति की उस दिशा में मोड़ा, जहां राष्ट्रवाद अपराध नहीं बल्कि गौरव बन गया। उसने यह दिखाया कि धर्म और संस्कृति को राजनीति से बाहर नहीं किया जा सकता, बल्कि वही उसके मूल्य और नैतिकता की जड़ हैं। आज जब भारत की विदेश नीति में आत्मविश्वास है, जब सेना की क्षमता पर गर्व है, जब भारत अपनी सभ्यता की बात वैश्विक मंचों पर करता है तो यह सब उसी वैचारिक आधार की परिणति है, जो 1951 में रखी गई थी।

जनसंघ का योगदान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक भी था। उसने भारतीय जनमानस को यह विश्वास दिया कि राष्ट्रवाद किसी विदेशी विचारधारा का विस्तार नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। आज की भाजपा, चाहे वह सामाजिक योजनाओं में आत्मनिर्भरता की बात करे या अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की पहचान को दृढ़ता से रखे, यह सब जनसंघ के विचार का ही विकास है।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जिस एक भारत का सपना देखा था, वह आज साकार होता दिखता है। अनुच्छेद 370 का हटना, आतंकवाद पर सख्त नीति और वोकल फॉर लोकल की अवधारणा ये सभी जनसंघ के राष्ट्रवादी दर्शन की आधुनिक व्याख्या हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार उसी विचार की परिणति है, जिसने जनसंघ के समय कहा था कि भारत को अपनी जड़ों से जुड़कर ही आधुनिक बनना होगा।

जनसंघ ने जो बीज बोया था, वह आज वटवृक्ष बन चुका है। उसका तना भाजपा है, उसकी जड़ें संघ की विचारधारा में हैं और उसकी शाखाएं राष्ट्र के कोने-कोने तक फैली हैं। आज जब भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जब भारत का नेतृत्व वैश्विक मंचों पर निर्णायक भूमिका निभा रहा है, तो यह उसी आत्मविश्वास का विस्तार है जो 1951 के उस छोटे से सम्मेलन में अंकुरित हुआ था।

भारत की राजनीति में जनसंघ का योगदान इसलिए अमर है, क्योंकि उसने केवल सत्ता पाने के लिए राजनीति नहीं की, बल्कि उसने राजनीति को राष्ट्र सेवा का माध्यम बनाया। उसके लिए राष्ट्र भूगोल नहीं, संस्कार था। और यही विचार भारत के भविष्य का आधार बन गया। आज जब हम जनसंघ की स्थापना का दिवस मना रहे हैं, तो यह केवल एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं, बल्कि उस विचार की पुनर्पुष्टि है जो कहता है कि भारत केवल एक देश नहीं, एक जीवंत सभ्यता है। इस सभ्यता को राजनीति में स्वर देने का श्रेय सदा के लिए भारतीय जनसंघ को रहेगा।

Tags: BJPDr. Syama Prasad MukherjeeIndiaJan SanghNationalismPM Modirssआरएसएसजनसंघडॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जीपीएम मोदीभाजपाभारतराष्ट्रवाद
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