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साम्राज्य का क्षय बनाम राष्ट्र का उत्थान: अमेरिका और भारत की दो राहें

कागज़ पर अमेरिका अब भी दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक और सैन्य साम्राज्य है। लेकिन, जब उसकी जनता पर नज़र डालें तो तस्वीर बिल्कुल अलग है—भूख, मेडिकल कर्ज़, ड्रग्स, घटती उम्र और रोज़गार की असुरक्षा।

Vibhuti Ranjan द्वारा Vibhuti Ranjan
3 October 2025
in AMERIKA, अर्थव्यवस्था, फैक्ट चेक, भारत, वाणिज्य, विश्व, व्यवसाय
साम्राज्य का क्षय बनाम राष्ट्र का उत्थान: अमेरिका और भारत की दो राहें

अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन चीन या रूस नहीं है, बल्कि उसकी अपनी व्यवस्था है।

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21वीं सदी का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किस देश का GDP सबसे बड़ा है या किसके पास सबसे ताकतवर सेना है। असली सवाल यह है कि किस देश की व्यवस्था अपने नागरिकों के लिए गरिमा, सुरक्षा और अवसर सुनिश्चित करती है। कागज़ पर अमेरिका अब भी दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक और सैन्य साम्राज्य है। लेकिन, जब उसकी जनता पर नज़र डालें तो तस्वीर बिल्कुल अलग है-भूख, मेडिकल कर्ज़, ड्रग्स, घटती उम्र और रोज़गार की असुरक्षा। यह वह “महाशक्ति” है, जिसकी नींव खोखली हो चुकी है।

उसके सामने भारत है, वह भारत जिसे दशकों तक पश्चिमी मीडिया ने पिछड़ा, अराजक, असंगठित कहकर खारिज किया। लेकिन आज वही भारत, जनता-केन्द्रित नीतियों और सामाजिक अभियानों के बल पर, एक नया मॉडल खड़ा कर रहा है, जहां विकास का मतलब केवल आंकड़ों की छलांग नहीं बल्कि गरीब की थाली, आम नागरिक का बैंक खाता और हर घर तक सुविधाएं पहुंचाना है। इस आलेख का उद्देश्य यह दिखाना है कि अमेरिका कैसे अपने ही लोगों को कुचल कर साम्राज्य बनाए बैठा है और भारत कैसे अपनी जनता को सशक्त कर राष्ट्र को विश्वगुरु की ओर ले जा रहा है।

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अमेरिका में श्रम शक्ति का पतन

1950 के दशक में अमेरिका में यूनियन सदस्यता 30% से ऊपर थी। यूनियनें मज़दूरों की ताकत थीं। वेतन, स्वास्थ्य बीमा, रिटायरमेंट सुरक्षा सब सुनिश्चित था। लेकिन योजनाबद्ध तरीके से कॉर्पोरेट लॉबियों और राजनीतिक तंत्र ने इन्हें तोड़ दिया। आज यूनियन की सदस्यता महज़ 10% रह गई है। इसके साथ ही गिग इकॉनमी का जाल फैल गया-Uber, DoorDash, Amazon डिलीवरी जैसी नौकरियां सुनने में लचीली हैं, लेकिन असल में ये मजदूरी की नई गुलामी हैं। कोई मेडिकल इंश्योरेंस नहीं, कोई स्थायी वेतन नहीं, कोई पेंशन नहीं।

इसका नतीजा यह है कि करोड़ों अमेरिकी ज्यादा घंटे काम करते हैं, लेकिन उनकी ज़िंदगी ऊपर नहीं उठती। आर्थिक लाभ ऊपर कॉर्पोरेट और वित्तीय पूंजी तक सीमित हो जाते हैं। मतलब मजदूर की जेब खाली और मालिक की तिजोरी भरी।

वित्तीयकरण और रोज़मर्रा की असुरक्षा

अमेरिका की अर्थव्यवस्था उत्पादन से हटकर अब सट्टेबाजी और वित्तीयकरण पर टिकी है। इससे सबसे ज़्यादा चोट जनता को हुई है, क्योंकि जीवन की बुनियादी ज़रूरतें ही मुनाफ़ाखोरी का ज़रिया बना दी गईं।

घर : जो इंसान की सबसे बुनियादी ज़रूरत है—वह अब हेज फंड्स और कॉर्पोरेट मकान मालिकों का खेल बन गया है। बड़े-बड़े निवेश फर्म पूरी की पूरी कॉलोनियां खरीद लेते हैं और किराया बढ़ा देते हैं। नतीजा: अमेरिका में मध्यम किराया अब औसतन घर की आय का 30% खा जाता है। लाखों परिवार हर महीने eviction notice के डर में जीते हैं।

स्वास्थ्य : अमेरिका अपनी GDP का 18% स्वास्थ्य पर खर्च करता है, लेकिन परिणाम—WHO की रैंकिंग में 37वां स्थान। यह विडंबना नहीं तो और क्या है? दुनिया का सबसे अमीर देश, लेकिन 100 मिलियन से ज़्यादा नागरिक मेडिकल कर्ज़ में डूबे हुए हैं। बीमारी यहां सिर्फ शारीरिक पीड़ा नहीं, बल्कि आर्थिक मौत भी है।

शिक्षा : अमेरिकन ड्रीम का रास्ता कभी शिक्षा से होकर जाता था। आज वही शिक्षा करोड़ों को आजीवन गुलामी का कर्ज़ देती है। 45 मिलियन अमेरिकी छात्र ऋण (student debt) में जकड़े हैं। कर्ज की कुल राशि 1.7 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा। यानी कॉलेज की डिग्री अब सामाजिक उन्नति नहीं बल्कि कर्ज़ का जाल है।

महंगाई : विदेश नीति और व्यापार युद्ध सीधे घर की थाली को प्रभावित करते हैं। 2018 में सिर्फ चीन पर लगे अमेरिकी टैरिफ्स ने हर घर का सालाना खर्च औसतन $1277 बढ़ा दिया। यानी भू-राजनीति का बिल भी जनता को ही चुकाना पड़ता है।

राजनीतिक तंत्र: कॉर्पोरेट का औज़ार

अमेरिका का लोकतंत्र दुनिया को मॉडल बताता है। लेकिन असलियत यह है कि यह जनता का नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट का तंत्र बन चुका है।

टैक्स नीति : 2017 के ट्रंप टैक्स कट्स में 83% लाभ टॉप 1% को गया। अरबपतियों के टैक्स घटे, लेकिन स्कूल, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर का बजट काटा गया। फिर यही घाटे दिखाकर “austerity” के नाम पर जनता से कल्याण योजनाएं छीनी जाती हैं।

रेगुलेटरी कैप्चर : बैंक और वित्तीय कंपनियां उन्हीं कानून बनाने वालों की जेब में हैं, जिन्हें उन्हें नियंत्रित करना चाहिए। 1999 में Glass-Steagall Act हटाया गया, जिससे सट्टा का खेल बढ़ा। 2008 की मंदी आई तो बैंक बचा लिए गए, लेकिन लाखों अमेरिकियों के घर छीन लिए गए।

सैन्य खर्च : 2023 में अमेरिका ने रक्षा पर $877 बिलियन खर्च किया, यानी अगले 10 देशों के कुल खर्च से भी ज्यादा। अगर यही पैसा हेल्थकेयर या शिक्षा पर लगाया जाता तो हर अमेरिकी को यूनिवर्सल हेल्थकेयर और मुफ़्त कॉलेज शिक्षा मिल सकती थी।

मानवीय कीमत : गरीबी, बीमारी और निराशा

इन नीतियों का असर सीधा आम आदमी की ज़िंदगी पर दिखता है। 3.7 करोड़ अमेरिकी आधिकारिक गरीबी रेखा के नीचे हैं, और करोड़ों उससे ज़रा ऊपर। यानी अमीरी के साम्राज्य में भूख और बेबसी हर जगह फैली है।

जीवन प्रत्याशा: लगातार तीन साल से अमेरिकी जीवन प्रत्याशा घट रही है। ओपिऑयड ड्रग्स, आत्महत्या और शराब—इन “deaths of despair” ने समाज को खोखला कर दिया है।

भोजन की असुरक्षा: 3.4 करोड़ लोग—जिनमें 90 लाख बच्चे भी हैं जो खाने की गारंटी से वंचित हैं।

ओपिऑयड महामारी: हर साल 1 लाख से ज़्यादा लोग नशे की ओवरडोज़ से मर रहे हैं। यह आंकड़ा किसी युद्ध से कम नहीं।

क्या यह किसी सुपरपावर की तस्वीर है? नहीं। यह भीतर से बिखरते साम्राज्य की पहचान है।

विदेश नीति: बाहर ताकत, भीतर कमजोरी

अमेरिका की साम्राज्यवादी विदेश नीति का बोझ भी आम जनता ढोती है। प्रतिबंध और व्यापार युद्ध: तेल उत्पादकों पर प्रतिबंध और चीन से व्यापार युद्ध ने अमेरिकी परिवारों के लिए गैस, दूध और ब्रेड तक महंगा कर दिया। इराक और अफगानिस्तान में 20 साल का युद्ध—Brown University के अनुसार $8 ट्रिलियन खर्च। यह पैसा स्वास्थ्य, मकान, स्कूल पर खर्च होता तो आज अमेरिका की तस्वीर अलग होती। राष्ट्रीय कर्ज़ अब $34 ट्रिलियन से ज़्यादा हो चुका है। इसका ब्याज ही अब सरकार का बड़ा खर्च बन गया है, जिससे जनता की योजनाओं पर और कटौती होती है।

भारत का जनता-केन्द्रित मॉडल

अब देखते हैं भारत, जिसे पश्चिम अक्सर कमतर बताता रहा। लेकिन, भारत ने पिछले दशक में साबित किया है कि असली ताकत जनता की भागीदारी और कल्याण में है।

वित्तीय समावेशन: प्रधानमंत्री जनधन योजना से 50 करोड़ से ज़्यादा बैंक खाते खुले। वह गरीब जो पहले साहूकार पर निर्भर था, अब सीधे बैंक और डिजिटल पेमेंट से जुड़ा है।

स्वास्थ्य सुरक्षा: आयुष्मान भारत ने 20 करोड़ से ज़्यादा लोगों को स्वास्थ्य बीमा दिया। अमेरिका जहां मेडिकल कर्ज़ से त्रस्त है, वहीं भारत गरीब को मुफ्त इलाज देकर मेडिकल गरीबी रोक रहा है।

अन्न सुरक्षा: प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना से 80 करोड़ लोगों तक मुफ्त अनाज पहुंचा। अमेरिका में 3.4 करोड़ भूखे, भारत में 80 करोड़ को भोजन सुरक्षा।

आवास और स्वच्छता: प्रधानमंत्री आवास योजना और स्वच्छ भारत मिशन से करोड़ों को घर और शौचालय मिले। यह न केवल स्वास्थ्य बल्कि गरिमा की भी गारंटी है।

डिजिटल क्रांति: UPI ने हर छोटे दुकानदार, किसान, मजदूर को डिजिटल लेन-देन की ताकत दी। आज भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा मासिक डिजिटल ट्रांजैक्शन करता है-10 अरब से भी ऊपर।

गरीबी पर प्रहार: विश्व बैंक के अनुसार, 2023 तक भारत ने चरम गरीबी (extreme poverty) 2% से नीचे ला दी।

भारत और अमेरिका की तूलना

अमेरिका:

जनता भूखी, बीमार और कर्ज़ में डूबी।

व्यवस्था कॉर्पोरेट और युद्ध उद्योग की गुलाम।

साम्राज्य बाहर मजबूत, भीतर खोखला।

भारत:

जनता सशक्त, खाते-पीते, डिजिटल और कम कर्ज।

नीतियां कल्याण और समावेशन पर आधारित।

राष्ट्र नीचे से ऊपर मजबूत हो रहा।

फर्क साफ है, कोई साम्राज्य जनता की कुर्बानी पर नहीं टिकता। अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन चीन या रूस नहीं है, बल्कि उसकी अपनी व्यवस्था है, जो अपनी जनता को कुचल रही है। दूसरी ओर भारत ने दिखाया है कि असली ताकत जनता है। अगर जनता मजबूत है तो राष्ट्र अजेय है। भारत का यह सफर ही उसे विश्वगुरु की राह पर ले जा रहा है, जबकि अमेरिका का साम्राज्य अपनी ही जनता की बेबसी में धीरे-धीरे डूब रहा है।

Tags: AmericaAmerican capitalismAmerican paradoxForeign PolicyIndiaअमेरिकाअमेरिकी पूंजीवादअमेरिकी विरोधाभासभारतविदेश नीति
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