ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। कई विश्लेषक अब वेनेज़ुएला में अमेरिका की कार्रवाई और ईरान की मौजूदा स्थिति के बीच समानताएँ खोज रहे हैं, जिससे एक अहम सवाल उठ खड़ा हुआ है—क्या वॉशिंगटन तेहरान के खिलाफ भी ऐसी ही रणनीति अपना सकता है?
क्या संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल ईरान के आंतरिक असंतोष का इस्तेमाल प्रत्यक्ष हस्तक्षेप को正 ठहराने के लिए कर सकते हैं?
कड़ी बयानबाज़ी और बढ़ते तनाव के बावजूद, ईरान में सीधे अमेरिकी या इज़राइली सैन्य हस्तक्षेप की संभावना फिलहाल कम ही नजर आती है। ईरान में जारी अशांति का मुख्य कारण घरेलू आर्थिक और राजनीतिक समस्याएँ हैं। देश के कई शहरों में हुए प्रदर्शन गहरे आर्थिक असंतोष से प्रेरित हैं—महंगाई में तेज़ बढ़ोतरी, बेरोज़गारी, गिरता जीवन-स्तर, और शासन व जवाबदेही से जुड़ी पुरानी शिकायतें।
इस्लामी सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों पर की गई सख्ती के चलते सुरक्षा बलों के साथ हिंसक झड़पें हुई हैं और कई लोगों के हताहत होने की खबरें भी सामने आई हैं। इन घटनाओं पर वॉशिंगटन और तेल अवीव से कड़ी प्रतिक्रियाएँ आई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गई, तो अमेरिका प्रतिक्रिया देगा।
हालांकि, ईरान में हस्तक्षेप की रणनीतिक और सैन्य लागत बेहद अधिक है, जिससे यह संभावना कम हो जाती है कि वॉशिंगटन—खासकर ट्रंप के नेतृत्व में—इस स्तर पर वह कीमत चुकाने को तैयार होगा।
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई और सत्तारूढ़ तंत्र ने इन प्रदर्शनों को विदेशी साज़िशों का नतीजा बताने की कोशिश की है और बाहरी शक्तियों पर देश को अस्थिर करने का आरोप लगाया है। फिर भी, अधिकांश स्वतंत्र विश्लेषक इस बात पर सहमत हैं कि अशांति की जड़ें मुख्य रूप से घरेलू कारणों में ही हैं।
अमेरिकी प्रतिबंधों के वर्षों ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर गहरा दबाव डाला है। ईरानी रियाल में भारी गिरावट आई है और इसकी कीमत कथित तौर पर एक डॉलर के मुकाबले लगभग 42,000 रियाल तक पहुंच गई है। खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू रही हैं, रोज़गार के अवसर घटते जा रहे हैं और सरकार पर जनता का भरोसा कमजोर हुआ है। पारदर्शिता की कमी और नागरिक स्वतंत्रताओं के दमन ने राज्य और समाज के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है।
इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, इस्लामिक रिपब्लिक की सत्ता पर पकड़ अब भी मज़बूत बनी हुई है। ईरान का सुरक्षा तंत्र—विशेष रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC)—अब भी वफादार, संगठित और सक्षम है। यही कारण है कि अचानक सत्ता परिवर्तन या वेनेज़ुएला, लीबिया अथवा इराक जैसी स्थिति बनने की संभावना निकट भविष्य में बेहद कम मानी जा रही है।
ईरान को लेकर अमेरिका की रणनीतिक सतर्कता
हालांकि वॉशिंगटन की भाषा आक्रामक रही है, लेकिन उसके कदम सतर्कता का संकेत देते हैं। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी कि ईरान प्रदर्शनकारियों की हत्या न करे और यह भी कहा कि अमेरिका “पूरी तरह तैयार” है। ऐसे बयान भले ही प्रदर्शनकारियों के प्रति समर्थन दर्शाते हों, लेकिन वे तत्काल सैन्य कार्रवाई का संकेत नहीं देते।
इतिहास बताता है कि ईरान के प्रति अमेरिकी नीति आक्रमण से ज़्यादा दबाव पर आधारित रही है। आर्थिक प्रतिबंध, कूटनीतिक अलगाव, साइबर ऑपरेशन और गुप्त कार्रवाइयाँ वॉशिंगटन के प्रमुख औज़ार रहे हैं। अमेरिकी नीति-निर्माता जानते हैं कि ईरान पर सीधा सैन्य हमला पूरे क्षेत्र को युद्ध में झोंक सकता है, जिसका असर फारस की खाड़ी, इराक, सीरिया और लेबनान तक फैल सकता है।
वेनेज़ुएला के विपरीत, ईरान कूटनीतिक रूप से अलग-थलग नहीं है। उसके रूस और चीन के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध हैं, और दोनों देश किसी भी एकतरफा अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का कड़ा विरोध करेंगे। यह व्यापक वैश्विक परिदृश्य वॉशिंगटन के विकल्पों को काफी हद तक सीमित करता है।
तेहरान की प्रतिक्रिया: संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून
ईरानी अधिकारियों ने अमेरिकी बयानों को सिरे से खारिज कर दिया है। वरिष्ठ नेता अली लारीजानी ने इन्हें ईरान के आंतरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप बताते हुए राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला दिया। तेहरान ने स्पष्ट कर दिया है कि ये प्रदर्शन एक घरेलू मुद्दा हैं और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को शत्रुतापूर्ण कार्रवाई माना जाएगा।
इसके अलावा, ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए अंतरराष्ट्रीय वैधता हासिल करना बेहद कठिन होगा, जिससे प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की संभावना और कम हो जाती है।
इज़राइल की भूमिका: रणनीतिक खतरा, लेकिन सामरिक संयम
इज़राइल की स्थिति कुछ हद तक अस्पष्ट बनी हुई है। तेल अवीव लंबे समय से ईरान को अपना सबसे बड़ा रणनीतिक खतरा मानता रहा है—खासकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम और हिज़्बुल्लाह जैसे समूहों को समर्थन देने के कारण। इज़राइली नेताओं ने खुले तौर पर ईरान पर अमेरिकी दबाव का समर्थन किया है और चेतावनी दी है कि यदि उनकी सुरक्षा को सीधा खतरा हुआ, तो इज़राइल एकतरफा कार्रवाई कर सकता है।
फिर भी, ईरान के आंतरिक संकट में इज़राइल की प्रत्यक्ष सैन्य भागीदारी फिलहाल अनिश्चित दिखती है। ऐसा कोई भी कदम लेबनान, ग़ज़ा, सीरिया और संभवतः रेड सी तक कई मोर्चे खोल सकता है। मौजूदा सैन्य प्रतिबद्धताओं को देखते हुए, सीधे टकराव के बजाय अमेरिका के नेतृत्व वाले प्रतिबंधों, खुफिया अभियानों और कूटनीतिक दबाव पर निर्भर रहना कहीं अधिक सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है।
आगे क्या होगी अमेरिका और इज़राइल की रणनीति?
इन सभी कारकों को देखते हुए, ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान की संभावना सीमित ही नजर आती है। अधिक संभावना यही है कि वॉशिंगटन अपने परिचित औज़ारों पर ही निर्भर रहेगा—प्रतिबंधों का विस्तार, गुप्त अभियानों में बढ़ोतरी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान को अलग-थलग करने के प्रयास।
यह रणनीति अमेरिका को बिना युद्ध की अनिश्चितता में पड़े, ईरान को आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर करने का अवसर देती है। इज़राइल भी इसी रणनीति के अनुरूप चलने की संभावना रखता है और सीधी सैन्य कार्रवाई को केवल तभी विकल्प बनाए रखेगा, जब ईरान कोई स्पष्ट ‘रेड लाइन’ पार करे।
ईरान की स्थिति निस्संदेह अस्थिर है—लेकिन वह अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची है, जो सीधे अमेरिकी या इज़राइली हस्तक्षेप को正 ठहराए। फिर भी, गलत आकलन का जोखिम बना हुआ है। यदि बड़े पैमाने पर प्रदर्शनकारियों की हत्या होती है या अमेरिकी अथवा इज़राइली हितों पर सीधा हमला होता है, तो हालात तेजी से बदल सकते हैं।






























