एयरबस ने 29 जनवरी को कहा कि भारत का विमान क्षेत्र आने वाले वर्षों में तेज़ी से बढ़ने वाला है। कंपनी के मुताबिक, अगले 10 साल में भारतीय एयरलाइंस अपने विमानों की संख्या तीन गुना बढ़ाकर करीब 2,250 कर लेंगी।
इससे पहले बोइंग भी अनुमान जता चुका है कि भारत और दक्षिण एशिया की एयरलाइंस को 2044 तक लगभग 3,300 नए विमानों की ज़रूरत पड़ेगी। यह इलाका विमान बनाने वाली कंपनियों के लिए तेज़ी से उभरता हुआ बाज़ार बन रहा है, जहाँ इस समय एयरबस की मज़बूत पकड़ है।
एयरबस इंडिया और साउथ एशिया के प्रमुख युर्गेन वेस्टरमायर ने कहा कि जैसे-जैसे यात्रियों की संख्या बढ़ेगी, वैसे-वैसे पूरे विमानन सिस्टम और इंफ्रास्ट्रक्चर का भी विस्तार होगा। उन्होंने बताया कि अगले 10 साल में हवाई यात्रियों की संख्या हर साल औसतन 8.9 प्रतिशत बढ़ेगी। इस बढ़ती मांग को संभालने के लिए देश में करीब 50 नए एयरपोर्ट बनाए जाएंगे, जिससे कुल एयरपोर्ट की संख्या लगभग 200 हो जाएगी। इसी दौरान विमानों का बेड़ा भी तीन गुना बढ़कर 2,250 तक पहुँच जाएगा।
भारत इस समय अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार है। इंडिगो और एयर इंडिया जैसी बड़ी एयरलाइंस इस बाज़ार पर हावी हैं, इसलिए पूरी दुनिया का एयरोस्पेस उद्योग भारत पर नज़र बनाए हुए है। इसके बावजूद, भारत में हवाई यात्रा अभी भी काफी कम है। वेस्टरमायर के मुताबिक, एक व्यक्ति औसतन साल में सिर्फ 0.13 बार ही हवाई यात्रा करता है, जो दूसरे देशों की तुलना में बहुत कम है। इसका मतलब है कि भारत में हवाई यात्रा के बढ़ने की बहुत बड़ी संभावना अभी बाकी है।
वेस्टरमायर यह बातें भारत के द्विवार्षिक सिविल एविएशन एयर शो के दौरान कह रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि हाल ही में हुए भारत–यूरोपीय संघ व्यापार समझौते से एयरोस्पेस सेक्टर को फायदा मिल सकता है, क्योंकि कुछ सेवाओं पर टैक्स कम हो सकता है।
भारत फिलहाल दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ता घरेलू विमानन बाज़ार है। इसी वजह से भारतीय एयरलाइंस ने बड़ी संख्या में नए विमानों के ऑर्डर दिए हैं। ये ऑर्डर सिर्फ पुराने विमानों को बदलने के लिए नहीं, बल्कि तेज़ी से बेड़ा बढ़ाने के लिए हैं।
एयरबस के मुताबिक, इस समय भारतीय एयरलाइंस से कंपनी के पास 1,250 विमानों के ऑर्डर लंबित हैं। आने वाले समय में एयरबस हर साल 120 से 150 विमान, यानी लगभग हर हफ्ते दो विमान, डिलीवर करने की तैयारी में है।
पिछले साल इंजन की कमी और सप्लाई चेन की समस्याओं के बावजूद एयरबस दुनिया की सबसे बड़ी विमान निर्माता कंपनी बनी रही। विमानों की संख्या बढ़ने से भारत की एयर कार्गो क्षमता भी काफ़ी बढ़ेगी।
अनुमान है कि भारतीय एयरलाइंस की सालाना कार्गो क्षमता 50 लाख टन से ज़्यादा हो जाएगी, जो अभी के मुकाबले लगभग तीन गुना है।
इस तेज़ विस्तार के लिए कर्मचारियों की ज़रूरत भी बहुत बढ़ेगी। साल 2035 तक पायलटों की संख्या 12,000 से बढ़कर 35,000 तक पहुँच सकती है, जबकि तकनीकी कर्मचारियों की संख्या 11,000 से बढ़कर लगभग 34,000 होने का अनुमान है। इसके अलावा, विमान की मरम्मत और रखरखाव का बाज़ार भी तेज़ी से बढ़ेगा। अगले 10 साल में यह सेक्टर 3 अरब डॉलर से बढ़कर करीब 9.5 अरब डॉलर का हो सकता है। एयरबस भारत में अपने H125 हेलीकॉप्टरों की असेंबली लाइन भी शुरू कर रहा है, जिनकी डिलीवरी अगले साल से शुरू होने की उम्मीद है। फिलहाल एयरबस भारत से करीब 1.5 अरब डॉलर के विमान पुर्ज़े खरीदता है। इनमें से ज़्यादातर जटिल हिस्से होते हैं, जैसे विमान के दरवाज़े। कंपनी भविष्य में भारत से कंपोज़िट मटीरियल्स की खरीद भी बढ़ाने की योजना बना रही है।



























