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हमारा संविधान: मौलिक अधिकार बाहर से नहीं आए, इनकी संकल्पना भारतीय ज्ञान परंपरा में सदियों से मौजूद है

भारतीय संविधान पर भारतीय ज्ञान परंपरा की गहरी छाप है और इसे हम अपनी संविधान सीरीज़ के ज़रिए समझाने का प्रयास कर रहे हैं। सीरीज़ के इस हिस्से में हम धर्म, शिक्षा और संवैधानिक उपचारों के मूल अधिकारों पर भारतीय दर्शन की छाप को दिखाएंगे।

Dr Alok Kumar Dwivedi द्वारा Dr Alok Kumar Dwivedi
3 January 2026
in ज्ञान, संस्कृति
भारतीय संविधान और मौलिक अधिकार

भारतीय संविधान पर भारतीय दर्शन का प्रभाव आसानी से समझा जा सकता है

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सनातन दृष्टि में धर्म ही अधिकारों का आधार है – जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को सत्य, जीवन, सम्मान, विचार और आस्था की स्वतंत्रता प्राप्त है, बशर्ते वह समाज और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करे। यही भाव संविधान में समानता का अधिकार (समता), स्वतंत्रता के अधिकार (वाक्, विचार, आचरण), धार्मिक स्वतंत्रता, और जीवन व गरिमा के संरक्षण में प्रतिबिंबित होता है। बृहदारण्यक उपनिषद 5.7 का “आत्मवत् सर्वभूतेषु” और गीता का लोकसंग्रह का सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि किसी एक के अधिकार दूसरे के अधिकारों के विरुद्ध नहीं हो सकते। इसी संतुलन को संविधान में उचित प्रतिबंधों और न्यायिक संरक्षण के माध्यम से स्थापित किया गया है। इस प्रकार, संविधान का भाग–3 सनातन परंपरा के धर्म, करुणा, समता और मानव–गरिमा के सिद्धांतों को आधुनिक विधिक भाषा में व्यक्त करता है, जहाँ मौलिक अधिकार व्यक्ति को स्वच्छंद नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण, जिम्मेदार और राष्ट्रोन्मुख नागरिक बनाते हैं।

इनका लक्ष्य भारत के नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अवसर प्रदान करना है। मूल अधिकार भारत के नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन जीने, उनके कर्तव्य और राष्ट्र के प्रति नागरिक बोध का जीवंत दस्तावेज़ है। परंतु यह भारत के लिए कोई नयी संकल्पना नहीं है वरन इसकी झलक भारतीय सनातन परंपरा में प्रारम्भ से ही दिखाई पड़ती है। सनातन भारतीय परंपरा में अधिकारों की अवधारणा कर्तव्य, धर्म और मानव–गरिमा से जुड़ी रही है।

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धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion): (25 -28)

धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत किसी भी धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता भारत के समस्त नागरिकों को प्राप्त होती है। भारतीय ज्ञान परंपरा में धर्म को किसी एक मत, पंथ या उपासना–पद्धति तक सीमित नहीं किया गया, बल्किउसेजीवनकोधारणकरनेवालासार्वभौमिकनैतिकसिद्धांतमानागयाहै।

ऋग्वेद (1.164.46) का प्रसिद्ध सूत्र— “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”, यह स्पष्ट करता है कि सत्य एक है, पर उसे अनेक प्रकार से अभिव्यक्त किया जा सकता है। यही बहुलतावादी दृष्टि भारतीय सभ्यता में धार्मिक स्वतंत्रता का मूल आधार रही है।

                       धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता उपनिषदों, बौद्ध–जैन परंपरा और भक्ति आंदोलन में स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। बुद्ध ने किसी पर अपने मत को थोपने के बजाय विवेकपूर्ण स्वीकृति  पर बल दिया।अंगुत्तर निकाय के कलाम सूत्र में एहिपस्सिको – ‘आओ और स्वयम् को जाँचों’ का उल्लेख मिलता है।  जैन परंपरा ने अनेकांतवाद के माध्यम से विचारों की सहअस्तित्व भावना को सुदृढ़ किया। भक्ति परंपरा में भी व्यक्ति को अपने इष्ट, मार्ग और उपासना का स्वतंत्र चयन प्राप्त था, जिससेधार्मिकआचरणव्यक्तिगतआस्थाकाविषयबना।

धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन की स्वतंत्रता भी भारतीय परंपरा में स्पष्ट रूप से मिलती है। मठ, आश्रम, संघ, विहार और देवालय स्वशासित संस्थाओं के रूप में कार्य करते थे, जिनका संचालन उनके अपने नियमों, आचार संहिताओं और परंपराओं के अनुसार होता था। राज्य का हस्तक्षेप सीमित और धर्मरक्षा तक ही माना गया, न कि धार्मिक नियंत्रण तक। राजा को भी आदेश किया गया है कि राज्य का संचालन न्याय और धर्म से हो। महाभारत के शांति पर्व का कथन है –  “धर्मेण राज्यं संचरेत्”।
                       
इस प्रकार संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भारतीय ज्ञान परंपरा की सहिष्णुता, बहुलता, विवेक और आध्यात्मिक स्वातंत्र्य की उसी सनातन भावना का आधुनिक संवैधानिक रूप है, जहाँ धर्म व्यक्तिगत आस्था भी है और सामाजिक सौहार्द का माध्यम भी।

सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (Cultural and Educational Rights): (29 – 30)

सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार के अंतर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक को अपनी संस्कृति, भाषा और लिपि को सुरक्षित रखने का अधिकार, अल्पसंख्यकों को शैक्षिक संस्थान चलाने का अधिकार सम्मिलित है। भारतीय ज्ञान परंपरा मूलतः बहुलतावादी और समावेशी रही है, जहाँ विविध भाषाओं, संस्कृतियों और शिक्षण परंपराओं को समान सम्मान प्राप्त रहा है। “विविधता में एकता” भारतीय सभ्यता का केंद्रीय तत्त्व है, जिसका दर्शन वैदिक काल से ही मिलता है। ऋग्वेद में विभिन्न जन, भाषाओं और परंपराओं के सहअस्तित्व का स्वीकार इस बात का प्रमाण है कि संस्कृति को एकरूपता में नहीं, बल्कि सामंजस्य में देखा गया।

भाषा और संस्कृति की रक्षा का अधिकार भारतीय परंपरा में स्वाभाविक माना गया। पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, तमिल, संस्कृत जैसी अनेक भाषाएँ समानांतर रूप से विकसित हुईं, जिन्हें राज्य या समाज ने दबाया नहीं, बल्कि संरक्षण दिया। भक्ति और सूफी परंपराओं ने स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की, जिससे सांस्कृतिक विविधता सुदृढ़ हुई।

शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और संरक्षण की परंपरा भी प्राचीन भारत में अत्यंत समृद्ध रही है। गुरुकुल, मठ, विहार, मदरसा और पाठशालाएँ समुदाय–आधारित शिक्षण संस्थाएँ थीं, जिन्हें विभिन्न संप्रदायों और समूहों द्वारा स्वतंत्र रूप से संचालित किया जाता था। नालंदा, तक्षशिला, वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों में विभिन्न मतों, दर्शनों और क्षेत्रों के विद्यार्थी बिना भेदभाव अध्ययन करते थे।

                        इस प्रकार संविधान में अल्पसंख्यकों को सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार देना भारतीय ज्ञान परंपरा की उसी सहिष्णुता, बहुलता और सांस्कृतिक संरक्षण की भावना का आधुनिक संवैधानिक रूप है, जो हर समुदाय को अपनी पहचान सुरक्षित रखते हुए राष्ट्रीय एकता में सहभागी बनने का अवसर देता है।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies): (32)

संवैधानिक उपचारों का अधिकार के अंतर्गत व्यवस्था है कि इन अधिकारों के उल्लंघन होने पर प्रत्येक नागरिक को न्यायालय (सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट) जाने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों का रक्षक कहा गया है। भारतीय ज्ञान परंपरा में न्याय को केवल शासन का कार्य नहीं, बल्कि धर्म का अनिवार्य अंग माना गया है। उपनिषदों और स्मृतियों में न्याय, धर्म और सत्य को सामाजिक व्यवस्था का आधार कहा गया है। महाभारत में स्पष्ट रूप से कहा गया है— “धर्मेण राज्यं संचरेत”,  अर्थात राज्य का संचालन न्याय और धर्म के अनुसार ही होना चाहिए। जहाँ धर्म का अर्थ है – निष्पक्ष न्याय और अधिकारों की रक्षा।

मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर न्याय की शरण लेने की अवधारणा प्राचीन भारत में भी विद्यमान थी। राजा को सर्वोच्च न्यायाधीश माना गया, परंतु उसकी न्याय–शक्ति निरंकुश नहीं थी। सभाएँ, परिषदें, ग्रामसभा और गण–संघ जैसे संस्थान नागरिकों को न्याय प्राप्त करने के वैकल्पिक मंच प्रदान करते थे। यदि राजा अधर्म करता था, तो उसे पदच्युत करने का नैतिक अधिकार भी समाज को प्राप्त था—यह राजधर्म की मूल भावना थी। रिट (Writ) जैसी न्यायिक अवधारणाओं का दार्शनिक आधार भी भारतीय परंपरा में मिलता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में शासकों और अधिकारियों पर नियंत्रण, दंड–विधान और शिकायत–निवारण की स्पष्ट व्यवस्थाएँ दी गई हैं, जो आधुनिक रिट प्रणाली की पूर्वपीठिका मानी जा सकती हैं। राजा और अमात्यों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना शासन का अनिवार्य कर्तव्य था।

                 इस प्रकार संविधान का संवैधानिक उपचारों का अधिकार भारतीय ज्ञान परंपरा के न्याय, धर्म, लोक–कल्याण और उत्तरदायी शासन के सिद्धांतों का आधुनिक संवैधानिक रूप है। यही कारण है कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने इसे संविधान की “आत्मा” कहा, क्योंकि इसके बिना अधिकार निरर्थक हो जाते हैं।

(डा. आलोक कुमार द्विवेदी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्ञ में पीएचडी हैं। वर्तमान में वह KSAS, लखनऊ में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। यह संस्थान अमेरिका स्थित INADS, USA का भारत स्थित शोध केंद्र है। डा. आलोक की रुचि दर्शन, संस्कृति, समाज और राजनीति के विषयों में हैं।)

Tags: fundamental rightIndian Constitutionबाबा साहेब आम्बेडकरभारतीय ज्ञान परंपराभारतीय दर्शनभारतीय संविधानमूल अधिकारमौलिक अधिकारसंविधान
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