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हमारा संविधान: मौलिक अधिकारों की संकल्पना हमारे लिए नई नहीं है, ये भारतीय ज्ञान परंपरा का अभिन्न हिस्सा है

भारतीय संविधान पर भारतीय ज्ञान परंपरा की गहरी छाप है, संविधान सीरीज़ में हम मौलिक अधिकारों की भारतीय दर्शन के आलोक में व्याख्या करेंगे

Dr Alok Kumar Dwivedi द्वारा Dr Alok Kumar Dwivedi
31 December 2025
in ज्ञान, शिक्षा, संस्कृति
भारतीय संविधान

मौलिक अधिकारों की संकल्पना भारतीय दर्शन में पहले से ही है

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मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक हैं। इनका लक्ष्य भारत के नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अवसर प्रदान करना है। मूल अधिकार भारत के नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन जीने, उनके कर्तव्य और राष्ट्र के प्रति नागरिक बोध का जीवंत दस्तावेज़ है। मौलिक अधिकारों को संविधान के अनुच्छेद 12 से लेकर  अनुच्छेद 35 तक रखा गया है और ये भी संविधान के भाग–3 (Part III) में शामिल हैं।

वर्तमान में भारतीय संविधान में कुल 6 मौलिक अधिकार हैं, क्योंकि 44वें संविधान संशोधन (1978) के द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया था।

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मौलिक अधिकारों में समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार के साथ–साथ संवैधानिक उपचारों का अधिकार शामिल हैं– जिसे डॉ. अंबेडकर ने संविधान की आत्मा बताया था।

बताया जाता है कि हमारे ये मौलिक अधिकार अमेरिका, ब्रिटेन, आयरलैंड और फ्रांस जैसे देशों के संविधानों से प्रेरित हैं और वहीं से हमारे संविधान में आए हैं।
परंतु ये बात अनुचित प्रतीत होती है क्योंकि भारतीय दर्शन और ज्ञान परंपरा का अध्यन करने पर पता चलता है कि मौलिक अधिकारों के लिए हमें ब्रिटेन, अमेरिका या फ्रांस से सीखने की आवश्यता नहीं थी, बल्कि ये हमारे भारतीय समाज और संस्कृति में पहले से ही रचे–बसे थे।
इसे उदाहरण के साथ समझते हैं।

      समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 – 18) :

समानता के अधिकार के अंतर्गत कानून के समक्ष समानता, धर्म, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध, और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर को सम्मिलित किया गया है। भारतीय ज्ञान परंपरा में समानता का सिद्धांत केवल कानूनी नहीं, बल्कि गहरे दार्शनिक और नैतिक आधार पर स्थापित है। उपनिषदों का “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “एकोऽहम् बहुस्याम्” यह दर्शाता है कि समस्त मानव एक ही चेतना से उत्पन्न हैं, इसलिए सबके साथ समान व्यवहार धर्म का मूल है। महाभारत में कहा गया है— “धर्मेण हीनः पशुभिः समानः”, अर्थात जो धर्म से रहित है वह मनुष्य होकर भी पशु के समान है; यहाँ धर्म का अर्थ न्याय और समता से है। कानून के समक्ष समानता का भाव मनु, याज्ञवल्क्य और कौटिल्य की परंपरा में स्पष्ट मिलता है, जहाँ राजा को आदेश है कि वह मित्र–शत्रु, स्वजन–परजन में भेद किए बिना न्याय करे। शांति पर्व में राजा को “सर्वभूतेषु समदर्शी” होने का निर्देश है।

                      भेदभाव का निषेध बौद्ध और जैन परंपराओं में और अधिक स्पष्ट हुआ है। बुद्ध ने जन्म, जाति और कुल के आधार पर श्रेष्ठता को अस्वीकार कर आचरण और कर्म को व्यक्ति का मूल आधार माना। जैन दर्शन में भी  “समता” और “अहिंसा” सभी जीवों के प्रति समान दृष्टि के पक्ष को प्रबल रूप से प्रदर्शित करता है। समान अवसर की अवधारणा गीता के कर्मसिद्धांत से भी जुड़ी है।  “कर्मण्येवाधिकारस्ते” अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्म के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर समानता का ही उद्घोष है। इस प्रकार संविधान का समानता का अधिकार भारतीय ज्ञान परंपरा की उसी सनातन दृष्टि का आधुनिक, संवैधानिक रूप है, जहाँ समानता अधिकार के साथ–साथ न्यायपूर्ण और धर्मसम्मत सामाजिक व्यवस्था का आधार भी है।

स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom): (19 – 22)

स्वतंत्रता का अधिकार के अंतर्गत बोलने, संघ बनाने, घूमने, बसने और व्यवसाय की स्वतंत्रता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा,  शिक्षा का अधिकार को सम्मिलित किया गया है। भारतीय ज्ञान परंपरा में स्वतंत्रता का अर्थ स्वेच्छाचार नहीं, बल्कि स्वधर्म, आत्मानुशासन और उत्तरदायित्वपूर्ण आचरण से जुड़ा हुआ है। उपनिषदों का “आत्मा की परम स्वतन्त्रता” और गीता का कर्मयोग यह स्पष्ट करता है कि सच्ची स्वतंत्रता वही है जो विवेक और धर्म से नियंत्रित हो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आधार वैदिक संवाद परंपरा में मिलता है। उपनिषद संवाद, शास्त्रार्थ और बुद्धकालीन वाद–विवाद सभाएँ यह दर्शाती हैं कि सत्य की खोज के लिए विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आवश्यक है। ऋग्वेद का “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” जिसके अनुसार वैदिक ऋषि नवीन विचारों के लिए सदैव तैयार है। शांतिपूर्ण सभा और संघ बनाने की स्वतंत्रता बौद्ध संघ, जैन संघ और प्राचीन गण–राज्यों (जैसे वैशाली) की परंपरा से जुड़ी है, जहाँ सामूहिक निर्णय, सहभागिता और अनुशासन के साथ संगठन बनाए जाते थे। यह स्वतंत्रता सामाजिक जिम्मेदारी के साथ संतुलित थी।

                  आवागमन, निवास और व्यवसाय की स्वतंत्रता भारतीय समाज की खुली आर्थिक–सामाजिक संरचना को प्रदर्शित करती है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में व्यापार, श्रम और आजीविका की स्वतंत्रता को राज्य द्वारा संरक्षित बताया गया है, ताकि प्रजा आत्मनिर्भर और संतुष्ट रह सके। जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भारतीय दर्शन में अत्यंत मूलभूत है। “अहिंसा परमो धर्मः” और “जीवेत शरदः शतम्” जीवन की पवित्रता और गरिमा को सर्वोच्च मानते हैं। राज्य का कर्तव्य है कि वह व्यक्ति के जीवन, सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा करे, यही भाव आज संविधान के अनुच्छेद 21 में परिलक्षित होता है।

                 इस प्रकार संविधान का स्वतंत्रता का अधिकार भारतीय ज्ञान परंपरा की स्वतंत्र लेकिन अनुशासित, अधिकार–सहित कर्तव्यपरक दृष्टि का आधुनिक संवैधानिक रूप है, जहाँ व्यक्ति की स्वतंत्रता समाज और धर्म के व्यापक हित से जुड़ी रहती है। इसके साथ ही स्वतन्त्रता स्वेच्छाचारिता न हो जाए इसके लिए संविधान में युक्ति – युक्ति निर्बंधन का प्रावधान है जो सामाजिक गरिमा और राष्ट्रीय हितों के साथ नागरिकों की स्वतन्त्रता को व्याख्यायित करता है। ईशावास्य उपनिषद के प्रथम मंत्र “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्” जो  त्याग और संयम के साथ जीवन जीने की बात कहता है एक प्रकार से स्वतंत्रता के अधिकार के साथ उचित प्रतिबंध  की सनातन अवधारणा ही है।   

शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right against Exploitation): (23 – 24)

शोषण के विरुद्ध अधिकार के अन्तर्गत मानव तस्करी, बेगार और बाल श्रम (14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए) पर प्रतिबंध सम्मिलित है। भारतीय ज्ञान परंपरा में शोषण को अधर्म और अन्याय का स्पष्ट रूप माना गया है। वेद, उपनिषद, स्मृतियाँ और महाकाव्य सभी मानव गरिमा, श्रम की पवित्रता और व्यक्ति की स्वतंत्रता पर बल देते हैं। ऋग्वेद का भाव, “मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि” तथा उपनिषदों की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना किसी भी प्रकार के मानव शोषण को नैतिक रूप से अस्वीकार्य ठहराती है।

                     मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी का निषेध भारतीय परंपरा के दास या सेवक की अवधारणा से भिन्न है, जहाँ सेवा को स्वैच्छिक, मर्यादित और मानवीय माना गया। मनुस्मृति और अर्थशास्त्र में स्पष्ट है कि श्रमिक की रक्षा, उचित पारिश्रमिक और अमानवीय व्यवहार से संरक्षण राज्य का दायित्व है। कौटिल्य ने जबरन श्रम और अन्यायपूर्ण बंधन को दंडनीय माना, जिससे यह सिद्ध होता है कि व्यक्ति को वस्तु नहीं, बल्कि सम्मानयुक्त प्राणी है। बाल श्रम का निषेध भारतीय ज्ञान परंपरा के ब्रह्मचर्य आश्रम  की संकल्पना से जुड़ा है, जहाँ बालक का प्रमुख कर्तव्य शिक्षा, संस्कार और चरित्र–निर्माण माना गया है, न कि श्रम द्वारा शोषण। गुरु–शिष्य परंपरा यह दर्शाती है कि बाल अवस्था समाज की पूँजी है, जिसकी रक्षा और विकास आवश्यक है।

                     इस प्रकार संविधान का शोषण के विरुद्ध अधिकार भारतीय ज्ञान परंपरा के अहिंसा, करुणा, न्याय और मानव गरिमा के सिद्धांतों का आधुनिक संवैधानिक विस्तार है, जो व्यक्ति को हर प्रकार के अमानवीय शोषण से मुक्त करने का नैतिक और कानूनी आधार प्रदान करता है।

(डा. आलोक कुमार द्विवेदी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्ञ में पीएचडी हैं। वर्तमान में वह KSAS, लखनऊ में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। यह संस्थान अमेरिका स्थित INADS, USA का भारत स्थित शोध केंद्र है। डा. आलोक की रुचि दर्शन, संस्कृति, समाज और राजनीति के विषयों में हैं।)

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