चीन में 10 जनवरी के दिन छठा चीनी पुलिस दिवस मनाया गया , बता दें कि यह विशेष तौर पर चीनी जन पुलिस दिवस के रूप में स्थापित किया गया है, लेकिन इसके पीछे एक भयावह सच भी छिपा हुआ है, यही सुरक्षा तंत्र आज तिब्बत के धार्मिक पीड़ा और उत्पीड़न का सबसे बड़ा कारण बन गया है।
बता दें कि तिब्बत में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने बौद्ध धर्म को राज्य नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस और जेल व्यवस्था का व्यापक इस्तेमाल किया है। मठों पर निगरानी धार्मिक अनुष्ठानों पर प्रतिबंध और दलाई लामा के प्रति निष्ठा को “राजनीतिक अपराध” घोषित करना इनके लिए आम हो चुका है।
यहीं नहीं ल्हासा की जेलों में बंद कई तिब्बती कैदियों को झूठे आरोपों में रखा गया है,डोरजे ताशी, 51 वर्षीय तिब्बती व्यवसायी,जिन्हें झूठे आरोप में फंसाकर जेल भेजा गया, यहीं नहीं उन्हें जेल में कई बार पीटा भी गया। पहली घटना अप्रैल 2021 को हुई, जबकी दूसरी घटना अप्रैल 2025 को हुई थी। उनके माथे पर लगे चोट से यह साफ होता है कि उनके साथ चीनी पुलिस ने कितनी ज्यादा बर्बरता की थी।
जेल प्रशासन ने उनके परिवार को मिलने की अनुमति देने से इनकार किया। लगातार उत्पीड़न से परेशान होकर उनकी बहन गोनमो क्यी ने अगस्त 2025 में पुलिस हिरासत के दौरान आत्महत्या का प्रयास किया।
राजनीतिक कैदियों पर दमन
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह हिंसा दर्शाती है कि चीन राजनीतिक कैदियों पर लगातार हमला कर रहा है। जुलाई 2025 में दलाई लामा के 90वें जन्मदिन से ठीक पहले, दो तिब्बतियों को चेंत्सा काउंटी में हिरासत में लिया गया, और आज तक उनका कोई पता नहीं है। ल्हासा और आसपास के क्षेत्रों में भारी संख्या में सुरक्षाबल तैनात किए गए, जबकि पारंपरिक सांगसोल धार्मिक अनुष्ठानों पर प्रतिबंध लगाया गया।
गदुन चोएक्यी न्यिमा का मामला
बता दें कि चीन का दमन 30 साल पहले से जारी है। 1995 में जब छह साल के गदुन चोएक्यी न्यिमा को 11वां पंचेन लामा घोषित किया गया, तब बीजिंग ने उनका अपहरण कर लिया। उन्हें दुनिया का सबसे लंबे समय तक बंदी राजनीतिक कैदी माना जाता है।
शिनजियांग में नजरबंदी
शिनजियांग क्षेत्र में औद्योगिक स्तर पर नजरबंदी चल रही है। 2017 से अब तक दस लाख से अधिक उइगर और अन्य तुर्की मूल के मुसलमानों को उन शिविरों में भेजा गया जिन्हें चीन “व्यावसायिक शिक्षा केंद्र” कहता है।संयुक्त राष्ट्र ने 2022 में पुष्टि की कि शिविरों में यातना, यौन हिंसा, जबरन नसबंदी और ब्रेनवॉशिंग जैसी घटनाएं हो रही हैं। बीजिंग का दमन अब अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैल चुका है। 2016 से 2022 के बीच चीन ने 53 देशों में 102 विदेशी पुलिस स्टेशन स्थापित किए। ये स्टेशनों पर प्रवासी चीनी और असंतुष्टों को निगरानी और धमकाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।नीदरलैंड, स्पेन और अमेरिका में ऐसे कई मामलों की पुष्टि हुई है। अप्रैल 2023 में न्यूयॉर्क के मैनहैटन में एक गुप्त स्टेशन चलाने के आरोप में दो लोग गिरफ्तार किए गए।
ताइवान पर बढ़ता दबाव
जनवरी 2026 में चीनी मीडिया ने ताइवान के विधायक प्यूमा शेन की निजी जानकारी सार्वजनिक की और उन्हें “अलगाववाद” के आरोप में गिरफ्तार करने की धमकी दी। ताइवान सरकार ने इसे सीमा-पार दमन और डिजिटल अधिनायकवाद करार दिया। राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने चेतावनी दी कि चीन 2027 तक जबरन एकीकरण के लिए सैन्य और कानूनी दबाव बढ़ा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील
विशेषज्ञों का कहना है कि ल्हासा और शिनजियांग की जेलें, विदेशों में पुलिस चौकियाँ और सर्वव्यापी निगरानी तंत्र मिलकर दमन की एकीकृत संरचना बनाते हैं। तिब्बतियों, उइगरों और अन्य समुदायों का लगातार विरोध यह दिखाता है कि जंजीरें शरीर को बाँध सकती हैं, आत्मा को नहीं।
लोकतांत्रिक देशों से अपील की जा रही है कि वे केवल चिंता व्यक्त करने तक सीमित न रहें, बल्कि ठोस कदम उठाएँ—विदेशी पुलिस चौकियाँ बंद करें, निगरानी तकनीक पर प्रतिबंध लगाएँ, पीड़ितों का समर्थन करें और ताइवान के साथ मजबूती से खड़े हों।































