अमेरिका भर में AlloClae नामक एक नया और विवादास्पद कॉस्मेटिक ट्रेंड तेज़ी से चर्चा में है। इस प्रक्रिया में दान किए गए शवों (मृत मानव शरीरों) से प्राप्त “शुद्ध वसा (purified fat)” का उपयोग शरीर को आकार देने वाली प्रक्रियाओं में किया जाता है, जैसे कि ब्राज़ीलियन बट लिफ्ट (BBL), स्तन वृद्धि (Breast Augmentation) आदि।
जहाँ सर्जन इसे उन मरीजों के लिए एक बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं जिनके शरीर में पर्याप्त वसा नहीं होती, वहीं मृत दाताओं के ऊतकों के उपयोग ने कई चिकित्सीय, नैतिक और आध्यात्मिक चिंताओं को जन्म दिया है।
2024 में अमेरिकी बाज़ार में पेश किया गया AlloClae, मृत शरीर दाताओं से प्राप्त शुद्ध मानव वसा से बना एक स्टेराइल, इंजेक्टेबल फिलर है। पारंपरिक BBL या फैट ट्रांसफर प्रक्रियाओं के विपरीत—जिनमें मरीज के अपने शरीर से लिपोसक्शन द्वारा वसा निकाली जाती है—इस उत्पाद को “ऑफ-द-शेल्फ फैट” कहा जा रहा है।
न्यूयॉर्क के मैनहैटन में स्थित बोर्ड-प्रमाणित प्लास्टिक सर्जन डॉ. मेलिसा डॉफ्ट ने बताया,“न्यूयॉर्क सिटी में हम में से कई लोग इसे लेकर बहुत उत्साहित हैं, खासकर इसलिए क्योंकि कई बार हमारे मरीज़ बहुत दुबले होते हैं या पहले ही लिपोसक्शन करा चुके होते हैं। AlloClae ऐसी वसा है जो एक ऐसे व्यक्ति से दान की गई है जिसकी मृत्यु हो चुकी है। इसे किसी भी आनुवंशिक सामग्री से साफ़ किया जाता है और फिर सिरिंज में भरा जाता है। यह एक तरह की रेडी-टू-यूज़ वसा है। इसे शरीर के किसी भी हिस्से में इस्तेमाल किया जा सकता है। फिलहाल यह शरीर के लिए है, लेकिन भविष्य में चेहरे के लिए भी बेहतर बनाया जाएगा। जब इसे शरीर में इंजेक्ट किया जाता है, तो शरीर की अपनी वसा कोशिकाएँ कैडैवरिक फैट कोशिकाओं को अपनाती हैं। लगभग 75 से 100 प्रतिशत वसा कोशिकाएँ जीवित रहती हैं।”
टाइगर एस्थेटिक्स कंपनी के अध्यक्ष कारो वैन होव, जो इस उत्पाद के पीछे है, ने कहा, “इंजेक्शन से पहले, दाता वसा को एक विस्तृत बहु-चरणीय प्रक्रिया से गुज़ारा जाता है, जिसमें डीएनए, कोशिकीय मलबा और ऐसी हर चीज़ हटा दी जाती है जो प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को ट्रिगर कर सकती है। हम सुनिश्चित करते हैं कि सभी ऊतक सौंदर्य उपयोग के लिए सहमति के साथ लिए गए हों। अंतिम उत्पाद मरीज के ऊतकों के साथ घुल-मिल जाता है और कोलेजन उत्पादन को उत्तेजित करता है।”
हालाँकि, सभी डॉक्टर इस फिलर के फायदों को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। डबल बोर्ड-प्रमाणित प्लास्टिक सर्जन डॉ. एडम कोल्कर ने चेतावनी दी कि स्तन ऊतकों में नई जैविक सामग्री इंजेक्ट करने से मैमोग्राम और कैंसर जांच जटिल हो सकती है।
ऑनलाइन आलोचकों का यह भी कहना है कि कई लोग यह पूरी तरह नहीं समझते कि मृत्यु के बाद उनके शरीर का उपयोग किस तरह किया जा सकता है। एक टिप्पणीकार ने लिखा, “यह उत्पाद और लेख बताते हैं कि यह FDA से स्वीकृत नहीं है और इसका कोई परीक्षण नहीं हुआ है। जोखिमों को पर्याप्त रूप से समझाया नहीं गया है।”
एक अन्य ने कहा, “यह कहना अभी बहुत जल्दी है कि यह सुरक्षित है। कौन जानता है कि भविष्य में यह कैंसर या ऑटोइम्यून समस्याओं का कारण बन जाए।” कई लोगों ने नैतिक और आध्यात्मिक चिंताएँ भी जताईं। एक व्यक्ति ने लिखा, “मुझे यह आध्यात्मिक रूप से सही नहीं लगता।” दूसरे ने जोड़ा, “जैसे-जैसे मांग बढ़ेगी, इसके आसपास भ्रष्टाचार की काफी संभावना दिखती है।”
कुछ ऑनलाइन चर्चाओं में इस प्रक्रिया को BBL से जुड़ी पिछली विवादित समस्याओं, जैसे सर्जरी के बाद आने वाली गंध, से भी जोड़ा गया। एक व्यक्ति ने लिखा, “यह तो BBL की गंध की पुष्टि करता है।”
जहाँ विज्ञान रुकता है: चिकित्सीय सफलता या शरीर का विकृतिकरण?
वैकल्पिक कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं में शवों से प्राप्त वसा के बढ़ते उपयोग ने हमें एक मूल प्रश्न से रूबरू करा दिया है— क्या हम चिकित्सा को आगे बढ़ा रहे हैं, या मानव शरीर को नैतिक पहचान से परे एक वस्तु बना रहे हैं? ऐतिहासिक रूप से, दान किए गए मानव ऊतकों का उपयोग तब नैतिक रूप से उचित माना गया है जब वे जीवन बचाते हों या आवश्यक शारीरिक कार्य बहाल करते हों—जैसे हृदय वाल्व, कॉर्निया, या जले हुए मरीजों के लिए स्किन ग्राफ्ट।
लेकिन कॉस्मेटिक वृद्धि अलग मामला है। जब शवों से निकाली गई वसा का उपयोग कूल्हों, नितंबों या स्तनों को बड़ा करने के लिए किया जाता है, तो नैतिक ढांचा बदल जाता है। इससे भी गंभीर बात यह है कि यह न तो जीवन रक्षा है और न ही स्वास्थ्य की आवश्यकता।
दाता-वसा आधारित फिलर्स का तेज़ी से बाज़ार में आना मेडिकल लॉबिंग और मुनाफ़ा-केंद्रित चिकित्सा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। कॉस्मेटिक प्रक्रियाएँ स्वास्थ्य सेवा के सबसे लाभकारी क्षेत्रों में से एक हैं। यदि शवों की वसा को सौंदर्य वृद्धि के लिए स्वीकार कर लिया गया, तो आगे क्या? हम पहले ही भ्रूण ऊतकों, अंग तस्करी और बिना सहमति के पोस्ट-मॉर्टम उपयोग जैसे मुद्दों पर बहस कर चुके हैं। हर बार जब एक सीमा लांघी जाती है, तो अगली सीमा को सही ठहराना आसान हो जाता है। इतिहास बताता है कि जब मानव शरीर को संसाधन बना दिया जाता है, तो दुरुपयोग अनिवार्य हो जाते हैं।
यह एक फिसलन भरी ढलान है—दान से वस्तुकरण, वस्तुकरण से सामान्यीकरण, और फिर संवेदनहीनता तक। अब सवाल यह नहीं है कि क्या हम ऐसा कर सकते हैं, बल्कि यह है कि क्या हमें ऐसा करना चाहिए? यदि कुछ क्षेत्र नैतिक कारणों से “नो-गो ज़ोन” हैं, तो हमें यह भी पूछना होगा—
कॉस्मेटिक वृद्धि को अपवाद क्यों माना जाए?
शव कहाँ से आएँगे?
जैसे-जैसे मांग बढ़ेगी, आपूर्ति पर दबाव भी बढ़ेगा। इस सवाल को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। शव-आधारित कॉस्मेटिक सामग्री पर बढ़ती निर्भरता, विशेष रूप से हाशिए पर पड़े या आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों में, संदिग्ध और अनैतिक स्रोतों को प्रोत्साहित कर सकती है। इतिहास ऐसे अनगिनत उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ शरीर को आर्थिक मूल्य मिलने के बाद शोषण शुरू हुआ। जब मुनाफ़ा शामिल हो, तो केवल पारदर्शिता ही भ्रष्टाचार को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं होती।
शायद इसका सबसे खतरनाक परिणाम मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक है। जब हम सुंदरता के लिए “मृत शरीरों के उपयोग” की बात सहजता से करने लगते हैं, तो व्यक्ति और उत्पाद के बीच की सीमा मिटने लगती है। शरीर कच्चा माल बन जाता है। मृत्यु एक इन्वेंटरी।
यह संवेदनहीनता केवल कॉस्मेटिक चिकित्सा तक सीमित नहीं रहती—यह समाज के जीवन, गरिमा और मृत्यु को देखने के नज़रिए को ही बदल देती है।

































