अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पैदा होने वाले तनाव अक्सर वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन जाते हैं, खासकर जैसा कि अमेरिका और वेनेजुएला के बीच हुआ। इस घटना ने वैश्विक राजनीति को झकझोर कर रख दिया है। अमेरिका और वेनेजुएला के बीच तनाव पहले से जारी था, लेकिन 3 जनवरी 2026 को अमेरिकी सेना की कार्रवाई ने इस विवाद को एक नई ऊँचाई पर पहुँचा दिया है। 3 जनवरी 2026 की देर रात अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला की राजधानी काराकास में एक सैन्य ऑपरेशन चलाया, जिसमें वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को उनके बेडरूम से हिरासत में लेकर अमेरिका ले जाया गया। वैश्विक राजनीति में भूचाल लाने वाले इस ऑपरेशन का नाम दिया गया Operation Absolute Resolve. अमेरिकी अधिकारियों ने मादुरो पर ड्रग तस्करी, आतंकवाद और हथियारों से जुड़े संगठनों के साथ जुड़ाव जैसे आरोप लगाए हैं और उन्होंने कहा कि मादुरो को अमेरिका में मुकदमे का सामना करना होगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मीडिया को बताया कि अमेरिका सुरक्षित ढंग से सत्ता हस्तांतरित होने तक वेनेजुएला का नियंत्रण संभाले रखेगा। हालांकि फ़िलहाल वेनेजुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर कार्यभार सँभाल रही हैं। अमेरिका की इस कार्रवाई ने वैश्विक राजनीति में विभाजन पैदा कर दिया है, लेकिन इसमें भी वैश्विक स्तर पर मतभेद हैं। कई लैटिन अमेरिकी देश, रूस और चीन ने इसे वेनेजुएला की संप्रभुता पर हमला बताया है, जबकि कुछ पश्चिमी देशों ने इसे लोकतंत्र सुधार की दिशा में एक कदम मानते हुए इसका समर्थन किया है।
‘वसुधैव कुटुंबकम’ की धारणा पर चलने वाले भारत ने इस अप्रत्याशित घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त की है और सभी पक्षों से संवाद और शांति के मार्ग को अपनाने का आग्रह किया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान में कहा कि वे वेनेजुएला की स्थिति पर करीब से नजर रख रहे हैं और वेनेजुएला के लोगों की भलाई और सुरक्षा का समर्थन करते हैं। भारत ने यह भी कहा कि सभी संबंधित पक्ष मुद्दों को शांति और कूटनीति के माध्यम से हल करें ताकि क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे। इस कूटनीतिक प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट होता है कि भारत संघर्ष के राजनीतिक–मानवीय पक्ष को गंभीरता से देख रहा है, साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि कोई अप्रत्याशित घटना वह चाहे आर्थिक हो या मानवीय, भारत के हितों पर उसका प्रभाव न पड़े। न अभी और न ही भविष्य में ।
किसी भी देश पर युद्ध, संघर्ष या सैन्य कार्रवाई का उसके व्यापार पर क्या असर पड़ेगा, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उस देश के साथ उसके व्यापारिक रिश्ते कितने गहरे और व्यापक हैं। अगर दो देशों के बीच बड़ा और विविध व्यापार होता है, तो संघर्ष का असर भी ज़्यादा होता है। लेकिन भारत और वेनेजुएला के मामले में स्थिति कुछ अलग है। भारत और वेनेजुएला के बीच व्यापारिक संबंध कभी भी बहुत मज़बूत या बहुआयामी नहीं रहे हैं। भारत ने वेनेजुएला से मुख्य रूप से कच्चा तेल ही आयात किया है। हालांकि यह सच है कि एक समय वेनेजुएला भारत के लिए तेल का स्रोत रहा है, लेकिन यह आयात भारत की कुल ऊर्जा ज़रूरतों का बहुत छोटा हिस्सा ही रहा। भारत अपनी ज़्यादातर तेल आवश्यकताएँ मध्य पूर्व के देशों, अफ्रीका और हाल के वर्षों में रूस जैसे बड़े आपूर्तिकर्ताओं से ही पूरी करता रहा है। इस वजह से भारत की ऊर्जा सुरक्षा वेनेजुएला पर निर्भर नहीं रही है।
तेल के अलावा अगर दूसरे व्यापारिक पहलुओं को देखें, तो वेनेजुएला न तो भारत के लिए कोई बड़ा निर्यात बाज़ार रहा है और न ही भारत वेनेजुएला से महत्वपूर्ण मात्रा में अन्य वस्तुओं का आयात करता है। दोनों देशों के बीच व्यापार सीमित दायरे तक ही सिमटा रहा है। इसलिए किसी बड़े व्यापारिक उतार चढ़ाव की आशंका भी न के बराबर है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर किसी संभावित सैन्य कार्रवाई का भारत के व्यापार पर प्रत्यक्ष प्रभाव सीमित ही रहेगा। हाँ, अगर ऐसे संघर्ष का असर वैश्विक तेल बाज़ार पर पड़ता है और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेज़ उछाल आता है, तो उसका अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत पर ज़रूर पड़ सकता है। लेकिन वह असर वेनेजुएला–भारत द्विपक्षीय व्यापार की वजह से नहीं, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों के कारण होगा।
लेकिन यहां यह भी देखना दिलचस्प होगा कि यदि किसी तेल उत्पादक प्रधान देश से अचानक तेल की आपूर्ति घटती है, तो बड़े उत्पादक देश जैसे सऊदी अरब, रूस या अमेरिका अतिरिक्त तेल बाजार में उतार सकते हैं। इस वैश्विक आपूर्ति तंत्र के कारण मूल्य में अचानक बड़े उछाल या गिरावट की संभावना कम रहती है, और बड़े उपभोक्ता देश जैसे भारत अपेक्षाकृत स्थिर कीमतें और आपूर्ति सुनिश्चित कर सकते हैं। इसलिए, वेनेजुएला में राजनीतिक उथल–पुथल के बावजूद भारत को वैश्विक तेल बाजार में बड़ी मात्रा में कटौती या अभूतपूर्व कीमत उछाल की आशंका नहीं दिखती।
वेनेजुएला और अमेरिका विवाद में भारत ने वैश्विक राजनीति में कूटनीतिक रूप से जो प्रतिक्रिया दी है उसका संदेश साफ है कि वह शांति और संवाद का पक्षधर है और सभी पक्षों को शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रेरित कर रहा है। यहां पर यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत के कुछ राजनीतिक दल विशेषकर वामपंथी पार्टियों ने अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी निंदा की है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। इससे वैश्विक राजनीति में साफ संदेश जाता है कि भारत एक संतुलित कूटनीतिक रुख पर चलेगा और किसी भी देश के साथ जिससे उसके हित जुड़े हैं वह पक्षपात नहीं करेगा।
अमेरिका द्वारा मादुरो की गिरफ्तारी की खबर ने वैश्विक राजनीति में हलचल पैदा कर दी। कई देशों को अपनी–अपनी कूटनीतिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ देनी पड़ीं, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर तनाव और चर्चाएँ तेज़ हो गईं। विगत कई वर्षों का आकलन करे तो हमें समझने में आसानी होगी कि आने वाले समय में वैश्विक राजनीति में ऐसे उतार–चढ़ाव स्वाभाविक रूप से जारी रहेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं कि वैश्विक राजनीति को भारत के संदर्भ में देखें तो स्थिति अपेक्षाकृत संतुलित नज़र आती है। भारतीय अर्थव्यवस्था और व्यापार नीति किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भर नहीं हैं। भारत ने वर्षों में अपने व्यापारिक साझेदारों में विविधता लाई है और अपनी विदेश नीति को व्यावहारिक व बहुपक्षीय दृष्टिकोण पर आधारित रखा है। इसी कारण अमेरिका–वेनेजुएला के बीच उत्पन्न इस टकराव से भारत पर किसी बड़े या दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव की संभावना कम दिखाई देती है। कुल मिलाकर, वैश्विक अस्थिरता के बावजूद भारत की आर्थिक और कूटनीतिक संरचना उसे ऐसे झटकों से काफी हद तक सुरक्षित रखने में सक्षम है।






























