पिछले सप्ताह भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए “मदर ऑफ ऑल डील्स” ने भले ही सुर्खियाँ बटोरी हों, लेकिन इसी दौरान एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम चुपचाप आकार ले रहा था, जिसका असर दूरगामी हो सकता है।
भारत ने यूरोपीय संघ के उस प्रस्ताव का स्वागत किया है, जिसके तहत EU अपना एक संपर्क अधिकारी (Liaison Officer) भारतीय नौसेना के इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर–हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) में तैनात करेगा। यह समुद्री सूचनाओं के साझा उपयोग की दिशा में एक नया चरण है। हालाँकि EU अपनी अलग समुद्री निगरानी व्यवस्था ऑपरेशन अटलांटा (ATALANTA) के तहत चलाता है, लेकिन उसके नौसैनिक संसाधन एक बड़े और चुनौतीपूर्ण समुद्री क्षेत्र में फैले हुए हैं। अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र के पास लंबे समय से मौजूद EU की नौसैनिक मौजूदगी के कारण हिंद महासागर उसके लिए कभी भी दूर का इलाका नहीं रहा है।
अदन की खाड़ी और अरब सागर से होकर गुजरने वाले समुद्री रास्तों से यूरोप की बड़ी मात्रा में ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक सामान आता-जाता है। लेकिन अब खतरे पहले जैसे नहीं रहे। कभी भी समुद्री डकैती बढ़ जाती है, कई मछली पकड़ने वाले जहाज बिना नियमों के काम करते हैं। कभी-कभी सशस्त्र समूह भी गतिविधियाँ दिखाते हैं। इसके अलावा, व्यापारिक जहाजों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि समय रहते चेतावनी मिलना बेहद जरूरी हो गया है।
समुद्री सुरक्षा में विश्वसनीय जानकारी सबसे अहम होती है, और यहीं पर भारत का IFC-IOR एक क्षेत्रीय केंद्र के रूप में उभरा है। 2018 में स्थापित यह केंद्र भारतीय नौसेना द्वारा संचालित है और इसे हिंद महासागर की “आँख और कान” माना जाता है। आज इस केंद्र में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जापान, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर समेत 12 से ज्यादा देशों के संपर्क अधिकारी तैनात हैं। अब EU का जुड़ना इस बात की पुष्टि है कि IFC-IOR हिंद महासागर में जानकारी साझा करने का सबसे अहम केंद्र बन चुका है।
IFC-IOR की सोच सरल है—जो देश एक ही समुद्र में काम कर रहे हैं, वे अलग-थलग रहकर सुरक्षा नहीं कर सकते। यह केंद्र न तो युद्धपोत चलाता है और न ही गश्त करता है। इसका काम है अलग-अलग सूचनाओं को जोड़ना—जैसे व्यापारिक जहाजों की आवाजाही, संदिग्ध नौकाएँ, मौसम की चेतावनियाँ और संकट संकेत—ताकि एक साझा तस्वीर बन सके। यह तरीका भारत की SAGAR नीति (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) को दर्शाता है, जो प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग पर आधारित है।
EU संपर्क अधिकारी की तैनाती अचानक लिया गया फैसला नहीं है। यह कई वर्षों से बने भरोसे, संयुक्त अभियानों और साझा अभ्यासों का नतीजा है। भारत और EU के बीच नौसैनिक सहयोग पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है। दोनों ने अदन की खाड़ी और गिनी की खाड़ी जैसे क्षेत्रों में मिलकर गश्त और अभ्यास किए हैं, जहाँ समुद्री डकैती और अवैध गतिविधियाँ आम रही हैं।
इस दौरान भारतीय नौसेना ने विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) के जहाजों को सुरक्षा दी, जो EU के ऑपरेशन अटलांटा के साथ समन्वय में था। यह सहयोग नया नहीं, बल्कि पहले से स्थापित था। मार्च 2025 में हुई चौथी भारत-EU समुद्री सुरक्षा वार्ता में अवैध समुद्री गतिविधियों और अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र के बदलते हालात पर खास चर्चा हुई।
अप्रैल 2025 में EU नौसैनिक मिशन अटलांटा के कमांडर वाइस एडमिरल इग्नासियो विल्लानुएवा सेरानो भारत आए। यह EU-भारत ढाँचे के तहत पहली ऐसी यात्रा थी, जिसने रिश्तों की गहराई को दिखाया। जून 2025 में भारतीय नौसेना और EU नौसेना ने हिंद महासागर में बड़ा संयुक्त अभ्यास किया, जिसमें भारत, इटली और स्पेन के युद्धपोत और हवाई संसाधन शामिल थे। अभ्यास का फोकस समुद्री डकैती से निपटना और आपसी तालमेल बढ़ाना था।
सितंबर 2025 में भारतीय विध्वंसक INS सूरत और इतालवी युद्धपोत ITS Caio Duilio ने भी साथ अभ्यास किया। यह दिखाता है कि जहाँ भी दोनों की नौसेनाएँ मिलती हैं, वहाँ वे साथ प्रशिक्षण करते हैं। इन्हीं अनुभवों के आधार पर EU के संपर्क अधिकारी को IFC-IOR में तैनात करने का विचार बना। EU के लिए यह व्यवस्था फायदेमंद है, क्योंकि इससे उसे ऐसे समुद्री क्षेत्र की सीधी जानकारी मिलेगी जहाँ उसके व्यापारिक हित तो हैं, लेकिन स्थायी सैन्य ठिकाने नहीं। इससे तेज संचार और आपात स्थिति में बेहतर प्रतिक्रिया संभव होगी।
भारत के लिए यह फैसला उसकी भूमिका को और मजबूत करता है। IFC-IOR के जरिए भारत खुद को क्षेत्र में समुद्री सहयोग का एक भरोसेमंद और जरूरी केंद्र साबित कर रहा है। आज जब दुनिया के समुद्री रास्ते ज्यादा अनिश्चित हो गए हैं, तब भारत-EU का यह शांत लेकिन मजबूत सहयोग भविष्य में हिंद महासागर की सुरक्षा व्यवस्था को गहराई से प्रभावित कर सकता है।






























