लंबे समय से केरल राज्य के नाम को बदलने का प्रस्ताव सामने था, और आज की कैबिनेट बैठक में इस पर चर्चा होने की संभावना है कि राज्य का नाम केरलम” किया जा सकता है। ये फैसला राज्य में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे राज्य की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को मजबूती मिलेगी। इस विषय पर लंबे समय से सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा चल रही है। केरल के मुख्यमंत्री Pinarayi Vijayan ने भी राज्य सरकार से अनुरोध किया था कि राज्य का नाम मलयालम में प्रयुक्त रूप के अनुसार **“केरलम”** कर दिया जाए।
संविधान की आठवीं अनुसूची में भारत की 22 भाषाओं को आधिकारिक रूप से मान्यता दी गई है। हिंदी और अंग्रेजी के अलावा, संविधान इन भाषाओं में भी लिखा गया है। केरल राज्य की मांग है कि उसका नाम इन सभी भाषाओं में **“केरलम”** के रूप में दर्ज किया जाए।
अगस्त 2023 में प्रस्ताव पारित हुआ था जिसमें संविधान की पहली और आठवीं अनुसूची दोनों में नाम परिवर्तन की मांग की गई थी। लेकिन केंद्र सरकार ने बताया कि केवल पहले शेड्यूल में बदलाव की आवश्यकता है। इसलिए प्रस्ताव को संशोधन के लिए वापस भेजा गया।
केरल नाम को “केरलम” क्यों करना चाहती है राज्य सरकार?
मुख्यमंत्री ने विधानसभा में कहा कि मलयालम में राज्य को **“केरलम”** कहा जाता है। मलयालम भाषी समुदायों के लिए एकीकृत केरल बनाने की मांग राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही उठती रही है। उन्होंने याद दिलाया कि 1 नवंबर 1956 को जब भाषा आधारित पुनर्गठन के बाद राज्य बना, तो इसे **“केरल”** कहा गया, जबकि स्थानीय और ऐतिहासिक रूप से इसे **“केरलम”** कहा जाता था।
“केरलम” शब्द का सबसे पुराना उल्लेख सम्राट Ashoka के शिलालेखों में मिलता है, जो 257 ईसा पूर्व के हैं। अशोक ने अपने दूतों के जरिए बौद्ध धर्म का प्रचार विभिन्न राज्यों में किया और शिलालेखों में उन देशों के नाम लिखवाए जहां दूत भेजे गए थे। इन देशों में चोल, पांड्य, सत्यपुत्र और केतालपुत्र शामिल थे। विद्वानों का मानना है कि **केतालपुत्र** का अर्थ **केरलपुत्र** से है, जिसका संस्कृत में मतलब “केरल का पुत्र” होता है।
केरल उस समय चेरा साम्राज्य का हिस्सा था, जो दक्षिण भारत के इतिहास के तीन सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक था। जर्मन विद्वान डॉ. हरमन गुंडर्ट ने 1859 में पहला मलयालम-अंग्रेजी शब्दकोश प्रकाशित किया और उनके अनुसार “केरलम” शब्द चेरम का कन्नड़ रूप है। इसका मतलब उस तटीय भूमि से है जो गोकर्ण (कर्नाटक) और कन्याकुमारी (तमिलनाडु) के बीच स्थित है। “चेरम” शब्द की उत्पत्ति संभवतः पुरानी तमिल भाषा के “चेर” से हुई, जिसका अर्थ “जोड़ना” होता है।
राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया
संवैधानिक रूप से, किसी भी राज्य का नाम बदलने का अधिकार संसद के पास है। संविधान का अनुच्छेद 3 नए राज्यों के गठन और मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
1. प्रस्ताव पारित करना: राज्य विधानसभा में नाम परिवर्तन का प्रस्ताव पारित किया जाता है।
2. केंद्र को भेजना: विधानसभा से पास होने के बाद प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा जाता है। गृह मंत्रालय, इंटेलिजेंस ब्यूरो, भारतीय सर्वेक्षण विभाग, डाक विभाग और रजिस्ट्रार जनरल जैसी एजेंसियों से एनओसी लेना आवश्यक है।
3. संसद में बिल: केंद्र की मंजूरी मिलने पर मामला संसद में जाता है। दोनों सदनों में बिल पारित होना चाहिए।
4. राष्ट्रपति की मंजूरी: संसद से पारित होने के बाद बिल राष्ट्रपति को भेजा जाता है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद राज्य का नया नाम अधिसूचित किया जाता है।
केरल राज्य की स्थापना
मलयालम भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग स्वतंत्रता संग्राम के समय से उठ रही थी। उनकी मांग थी कि त्रावणकोर, कोच्चि और मालाबार को एकीकृत किया जाए।
* 1 जुलाई 1949: त्रावणकोर और कोचीन को मिलाकर त्रावणकोर-कोचीन राज्य बनाया गया।
* मालाबार क्षेत्र तब मद्रास प्रांत का हिस्सा बना रहा।
* 1 नवंबर 1956: राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत त्रावणकोर-कोचीन और मालाबार को मिलाकर केरल राज्य की स्थापना हुई।
इस नए प्रस्ताव के साथ, अब राज्य सरकार का उद्देश्य है कि नाम परिवर्तन के माध्यम से ऐतिहासिक, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को पुनः स्थापित किया जाए।





























