भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Systems – IKS) में किसी भी नवाचार का मूल्य केवल उसकी उपयोगिता से नहीं, बल्कि उसकेलोकसंग्रहऔरसर्वभूत कल्याणमें निहित योगदान से आँका जाता है। भगवद्गीता (5.25) में कहा गया है—
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥
अर्थात् जो समस्त प्राणियों के हित में रत रहते हैं, वही श्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त होते हैं। यह श्लोक केवल आध्यात्मिक साधना का निर्देश नहीं, बल्कि नीति और नवोन्मेष का शाश्वत मानदंड है।
चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय एआई इम्पैक्ट समिट इसी भारतीय दृष्टि का समकालीन प्रतिरूप है,जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता को केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्किधर्माधारित नवोन्मेषके रूप में देखा गया।भारतीय परंपरा में परिवर्तन कोकालचक्रका स्वाभाविक प्रवाह माना गया है। जिस प्रकार अग्नि की खोज ने मानव सभ्यता को दिशा दी, वाणी के लिपि में रूपांतरण ने ज्ञान को स्थायित्व दिया, और संचार क्रांति ने दूरी को लघु कर दिया,उसी प्रकार एआई भी इतिहास के एक निर्णायक बिंदु पर खड़ी है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एआई को मानव इतिहास के एक नए मोड़ के रूप में रेखांकित किया। परंतु भारतीय दृष्टि में यह केवल प्रौद्योगिकी का उत्कर्ष नहीं, बल्किमानव-चेतना के विस्तार का उपकरणहै।
भारतीय दर्शन में कोई भी शक्ति तटस्थ मानी जाती है,उसका स्वरूप उसके प्रयोग से निर्धारित होता है।कठोपनिषद्का वचन स्मरणीय है—श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः। अर्थात मनुष्य के सामने सदैव दो मार्ग होते हैं—श्रेय (कल्याणकारी) और प्रेय (क्षणिक लाभकारी)। एआई भी इसी द्वंद्व के मध्य स्थित है। यह विनाश का माध्यम भी बन सकती है और विकास का सेतु भी।अतः आवश्यक है कि एआई का विकासधर्म-आधारित नीतिके अनुरूप हो,जहाँ वह केवल दक्षता नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का भी वहन करे। “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” की भावना इसी संतुलन की स्थापना करती है।
एआई इम्पैक्ट समिट में प्रधानमंत्री जी ने “MANAV” विज़नप्रस्तुत किया। यह भारतीय तत्त्वचिंतन का आधुनिक सूत्र है, ऐसा दृष्टिगोचर होता है। “MANAV” विज़न वस्तुतः भारतीय तत्त्वज्ञान का तकनीकी पुनर्पाठ ही है। M – (मॉरल एंड एथिकल सिस्टम) जिसके अनुसारधर्म ही वास्तविक दिशा दिखलाता है। जैसा कि महाभारतमें कहा गया,धर्मो रक्षति रक्षितः।यदि नैतिकता की रक्षा होगी, तो वही तकनीक समाज की रक्षा करेगी।A – (अकाउंटेबल गवर्नेंस) अर्थात शक्ति के साथ उत्तरदायित्व अनिवार्य है। इसलिए एआई के लिए पारदर्शी नियम, सुदृढ़ निगरानीआवश्यक हैं। N – (नेशनल सोवेरनिटी) अर्थात राष्ट्रीय संप्रभुता “जिसका डेटा, उसका अधिकार” — यह डिजिटल युग मेंस्वराज्यकीभारतीय अवधारणा का विस्तार है। लंका विजय के पश्चात भगवान श्री राम ने वहाँ की संप्रभुता का सम्मान करते हुये लंका का राज्य विभीषण को हस्तांतरित किया था। भगवान राम, लक्ष्मण से बात करते हुये कहते हैं – अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥ अर्थात हे लक्ष्मण! यह सोने की लंका भी मुझे अच्छी नहीं लगती, क्योंकि माता और जन्मभूमि (मातृभूमि) स्वर्ग से भी बढ़कर महान हैं। A – (सर्व सुलभ), ज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं होता है। सनातन परंपरा मेंऋग्वेदका उद्घोष है—आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।अर्थात् शुभ विचार और ज्ञान विश्व के सभी दिशाओं से आएँ और सबके लिए उपलब्ध हों।V – (सत्यापन और पारदर्शिता), ज्ञान के संदर्भ में यह भारतीय न्यायपरंपरा का मूल है। विश्वास ही तकनीक की आधारशिला है। इन बातों से स्पष्ट है कि भारत वर्तमान तकनीकी के युग में भी अपने सनातन मूल्यों के साथ आगे बढ्ने कि कामना रखता है।
भारतीय चिंतन में कर्म का महत्व सर्वोपरि है—योगः कर्मसु कौशलम्। (भगवद्गीता 2.50)अर्थात् कर्म में कुशलता ही योग है। ए. आई. के युग में कौशल का अर्थ निरंतर सीखना, स्वयं को परिवर्तित करना और नए ज्ञान को आत्मसात करना है।तकनीकी परिवर्तन को भय से नहीं, अभ्यासऔरअध्ययनसे साधा जा सकता है। स्किलिंग, रिस्किलिंग और जीवनपर्यंत शिक्षण की संस्कृति भारतीयगुरुकुलपरंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति है,जहाँ शिक्षा निरंतर जीवन की साधना रही है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में ज्ञान एक साझी विरासत माना जाता है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा एआई को भी वैश्विक सार्वजनिक हितके रूप में देखने का आग्रह करती है।पारदर्शिता को सुरक्षा का आधार मानना भी भारतीय दृष्टि के अनुरूप है। डिजिटल युग में “ऑथेंटिसिटी” और “वॉटरमार्किंग” जैसे उपाय सत्य की रक्षा के आधुनिक साधन हैं—सत्यं वद, धर्मं चरकी परंपरा का तकनीकी रूप इसी संदर्भ में आधुनिक रूप में देखा जा सकता है। वर्तमान में भारत टेक इकोसिस्टम के नवोन्मेष का तपोवन है।सेमीकंडक्टर निर्माण, क्वांटम अनुसंधान, सुरक्षित डेटा केंद्र और गतिशील स्टार्टअप संस्कृति,ये सब मिलकर भारत को एआई के क्षेत्र में स्वाभाविक केंद्र बना सकते हैं।भारत केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि सृजनकर्ता बनने की दिशा में अग्रसर है। यह नवोन्मेष भारतीय दृष्टि मेंतपके समान है,निरंतर प्रयास, अनुशासन और उद्देश्यपूर्ण सृजन।
ए. आई. में अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी जी ने कहा कि आज विश्व दो दृष्टियों के मध्य खड़ा है,एक जो इसमे आशंका देखता है, और दूसरा जो संभावना। भारतीय ज्ञान परंपरा भय नहीं, संतुलित विवेक सिखाती है। गीता इसी मनोभावों को आगे ले जाने का माध्यम है। उद्धरेदात्मनाऽत्मानं (भगवद्गीता 6.5)अर्थात मनुष्य स्वयं अपने उत्थान का साधन बने।एआई भी तभी कल्याणकारी होगी जब वह आत्मोन्नति और लोककल्याण का माध्यम बने।निर्माण और नवोन्मेष का आग्रह है कि यह विश्व कल्याण हेतु का यह केवल नीति-वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का आधुनिक घोष है। इसमेंधर्म, लोकसंग्रहऔरसर्वभूत हितका समन्वय निहित है।यदि एआई “सर्वभूत हिते रत:” की भावना से संचालित होगी, तो वह केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता नहीं, बल्किमानवीय चेतना का विस्तारसिद्ध होगी।
(डा. आलोक कुमार द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर,KSAS Lucknow -INADS, USA)






























