बैसरन घाटी, पहलगाम कस्बे से लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित है, जहां केवल पैदल या घोड़े के जरिए पहुंचा जा सकता है। स्थानीय लोग इसे “मिनी स्विट्ज़रलैंड” भी कहते हैं। बीते साल अप्रैल की एक गर्म दोपहर में यह जगह परिवारों से भरी हुई थी। उन पर्यटकों से जो कश्मीर की वादियों, ठंडी हवा और खूबसूरती का अनुभव करने आए थे।22 अप्रैल 2025 को करीब दोपहर 1 बजे, आसपास के जंगलों से हथियारबंद लोग बाहर निकले। वे भीड़ के बीच घुसे और लोगों से उनका धर्म पूछने लगे। धर्म की पहचान के लिए कलमा पढ़ने को कहा गया, कुछ की पतलूनें खोल कर देखी गईं और जिनकी पहचान हिंदू के रूप में हुई, उन्हें गोली मार दी गई। जब सब खत्म हुआ, तब तक 26 लोग मारे जा चुके थे और 17 घायल थे। मृतकों में अधिकतर हिंदू पर्यटक थे, हालांकि एक क्रिश्चियन पर्यटक और एक स्थानीय मुस्लिम घोड़ाचालक भी मारे गए।यह पिछले 25 वर्षों में इस क्षेत्र में नागरिकों पर हुआ सबसे घातक हमला था।
हमले के लिए बैसरन घाटी का चयन कोई इत्तिफाक नहीं था। काउंटर-टेररिज़्म के नजरिए से यह एक लगभग परफेक्ट “सॉफ्ट टारगेट” था। जहां खुला मैदान, कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं, निहत्थे नागरिकों की भीड़। पहलगाम आने वाले पर्यटक कश्मीर की राजनीतिक स्थिति में एक खास प्रतीक हैं – वे इस दावे का जीवंत प्रमाण होते हैं कि क्षेत्र में सामान्य स्थिति लौट आई है।ऐसे में यह हमला आतंकी रणनीति में एक सुनियोजित बदलाव का संकेत था। पर्यटन क्षेत्र को निशाना बनाकर उस स्थिरता की कहानी को तोड़ना, जो अक्टूबर 2024 के विधानसभा चुनावों के बाद मजबूत होती दिख रही थी। यहां हमला करके आतंकियों ने सिर्फ लोगों की हत्या नहीं की, बल्कि एक विचार को निशाना बनाया कि कश्मीर सुरक्षित है, खुला है और आगे बढ़ रहा है।
बरामद हथियार भी अपनी कहानी बताते हैं। हमलावरों के पास M4 कार्बाइन और AK-47 जैसे हथियार थे। ये कोई साधारण या अस्थायी हथियार नहीं, बल्कि सैन्य स्तर के हथियार हैं, जिनके लिए ट्रेनिंग, सप्लाई चेन और योजना की जरूरत होती है। यह कोई हताशा नहीं थी, बल्कि संगठित कार्रवाई थी। एक खुली नजर आने वाली प्रॉक्सी जंगThe Resistance Front (TRF), जो पाकिस्तान आधारित Lashkar-e-Taiba का एक प्रॉक्सी माना जाता है, ने शुरुआत में इस हमले की जिम्मेदारी ली, हमले के दिन और उसके अगले दिन। जबकि चार दिन बाद, 26 अप्रैल को, TRF ने अपना दावा वापस लेते हुए कहा कि उनका संदेश साइबर घुसपैठ का नतीजा था। यह वापसी वास्तविक थी या रणनीतिक, यह अलग सवाल है, लेकिन जांच एजेंसियों को पहले ही लश्कर-ए-तैयबा के नेटवर्क के संकेत मिल चुके थे।
भारत की प्रतिक्रिया सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रही। नई दिल्ली ने Indus Waters Treaty में अपनी भागीदारी निलंबित कर दी, अटारी-वाघा सीमा को बंद कर दिया और 45 देशों के राजनयिकों को इस हमले की जानकारी दी। 7 मई को भारत ने Operation Sindoor के तहत सीमा पार आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए, जिसके बाद पाकिस्तान ने ड्रोन और मिसाइल हमलों से जवाब दिया। 10 मई को युद्धविराम पर सहमति बनी।
पाकिस्तान ने इस हमले में किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया। लेकिन यह इनकार एक कॉम्प्लेक्स बैकग्रआउंड के साथ आता है। हमले के कुछ दिनों बाद Sky News को दिए एक इंटरव्यू में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने खुद देश के अतीत में आतंकी संगठनों को समर्थन, प्रशिक्षण और फंडिंग देने की बात स्वीकार की।
मानवीय कीमत, सिर्फ एक हेडलाइन नहीं
हर रणनीतिक विश्लेषण के पीछे एक सच्चाई और भी है, जो ज्यादा कठिन है। ये लोग छुट्टियां मनाने आए परिवार थे, खुले मैदानों में खेलते बच्चे। आम लोग, जिन्होंने भारत के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक की यात्रा के लिए पैसे बचाए थे। उनका किसी संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं था। उन्हें इसलिए चुना गया क्योंकि वे क्या प्रतिनिधित्व करते थे और उनकी मौत क्या संदेश देगी।बचे हुए लोग ऐसे जख्म लेकर जी रहे हैं जो किसी रिपोर्ट में नहीं दिखेंगे। मृतकों के परिवार कभी नहीं भूल पाएंगे कि उन्हें वह फोन कॉल कहां मिला था। उनके लिए बैसरन अब कभी एक साधारण घास का मैदान नहीं रहेगा, यह वह जगह बन चुकी है जहां सब कुछ बदल गया।
आगे क्या?
पहलगाम हमले ने एक कठिन सवाल खड़ा कर दिया है। खुले नागरिक स्थानों की सुरक्षा कैसे की जाए, बिना उन्हें किले में बदले। क्योंकि विडंबना यही है कि आतंकवादी यही चाहते हैं- एक ऐसा कश्मीर जो चेकपोस्ट्स से घिरा हो और जहां पर्यटक न हों, ये अपने आप में उनकी जीत है।
प्रभावी काउंटर-टेररिज़्म का मतलब सिर्फ सैन्य कार्रवाई और सीमाएं बंद करना नहीं है। हमले के दिन शुरू किए गए Operation Mahadev ने अंततः सैटेलाइट फोन के जरिए आतंकियों का पता लगाया और 28 जुलाई 2025 को हरवन के जंगलों में तीन आतंकियों को मार गिराया, यानी तीन महीने से भी ज्यादा समय बाद। यह समयरेखा ही इस चुनौती की जटिलता को दर्शाती है।
बैसरन की वादियां एक दिन फिर से पर्यटकों से भर जाएंगी, कश्मीर की मजबूती इसकी मांग करती है। लेकिन 22 अप्रैल का यह हमला एक ऐसा सवाल छोड़ गया है, जिसका जवाब आसान नहीं है – कितने और आम लोगों को उस संघर्ष की कीमत चुकानी पड़ेगी, जिसे उन्होंने न चुना और न ही समझा?ऐसे हालात में प्रभावी काउंटर-टेररिज़्म के लिए खुफिया आधारित ऑपरेशन्स, सामुदायिक सतर्कता और तकनीकी निगरानी का संयोजन जरूरी है। उतना ही महत्वपूर्ण है रणनीतिक संचार, जो आतंकियों को वह नैरेटिव जीतने से रोके, जिसकी वे कोशिश करते हैं।
