चुनाव खत्म होते ही हर किसी की जुबान पर एक ही शब्द होता है ‘एग्जिट पोल’। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये आंकड़े आखिर तैयार कैसे होते हैं? क्या यह केवल एक अनुमान है या इसके पीछे कोई गहरा सांख्यिकीय विज्ञान (Statistical Science) काम करता है? दरअसल, एग्जिट पोल चुनाव के नतीजों का एक ‘प्रोजेक्शन’ होता है जो मतदाताओं के व्यवहार पर आधारित होता है। यह ओपिनियन पोल से अलग है, क्योंकि यहाँ मतदाता अपना वोट डाल चुका होता है।
ग्राउंड पर कैसे होता है सर्वे?
एग्जिट पोल करने वाली प्रमुख एजेंसियां जैसे एक्सिस माई इंडिया, सी-वोटर या मैट्राइज एक वैज्ञानिक पद्धति का पालन करती हैं। सबसे पहले ‘रिप्रेजेंटेटिव सैंपल’ (Representative Sample) चुना जाता है। चूंकि हर बूथ पर सर्वे करना मुमकिन नहीं है, इसलिए उन विधानसभाओं और बूथों को चुना जाता है जहाँ से पूरे राज्य के मूड का पता चल सके। वोटिंग के दिन, सर्वेयर बूथ के बाहर तैनात रहते हैं और हर तीसरे या पांचवें मतदाता से उसकी पसंद पूछते हैं। यह जानकारी उम्र, जाति, लिंग और व्यवसाय जैसे डेमोग्राफिक डेटा के साथ दर्ज की जाती है ताकि यह समझा जा सके कि किस वर्ग ने किस पार्टी का समर्थन किया है।
रॉ डेटा से सीट प्रेडिक्शन तक का सफर
मैदान से जो आंकड़े आते हैं, उन्हें सीधे तौर पर नहीं दिखाया जाता। उस पर ‘स्टैटिस्टिकल वेटिंग’ (Statistical Weighting) लागू की जाती है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी क्षेत्र में महिलाओं का मतदान प्रतिशत ज्यादा रहा है लेकिन सर्वे में कम महिलाओं ने जवाब दिया है, तो उनके डेटा के वजन को आनुपातिक रूप से बढ़ाया जाता है। इसके बाद सबसे चुनौतीपूर्ण काम शुरू होता है ‘वोट शेयर’ को ‘सीट’ में बदलना। भारत के ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ सिस्टम में 1% वोट का इधर-उधर होना सीटों की संख्या में 30-40 सीटों का अंतर पैदा कर सकता है।
क्यों फेल हो जाते हैं एग्जिट पोल?
- इतनी मेहनत के बावजूद कई बार एग्जिट पोल पूरी तरह गलत साबित होते हैं। इसके 5 मुख्य कारण हैं:
- साइलेंट वोटर: वह मतदाता जो अपनी पसंद जाहिर नहीं करता।
- डर या दबाव: कई बार वोटर दबाव में सर्वेयर को गलत जवाब दे देता है।
- सैंपल एरर: अगर सर्वे में हर वर्ग का सही प्रतिनिधित्व नहीं है।
- टर्नआउट: अगर असल मतदान प्रतिशत अनुमान से अलग रहे।
- गठबंधन: स्थानीय प्रत्याशियों का प्रभाव बड़े डेटा को मात दे देता है।
वोट शेयर बनाम सीट काउंट
एग्जिट पोल में सीट से ज्यादा ‘वोट शेयर’ अहम होता है। यह पार्टी की जमीनी मजबूती दिखाता है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ पहचान की राजनीति हावी है, वहां 15 साल की एंटी-इनकंबेंसी और वोट पैटर्न को समझना बहुत जटिल हो जाता है। इसलिए, विशेषज्ञों का मानना है कि एग्जिट पोल को अंतिम नतीजा नहीं, बल्कि केवल हवा के रुख (Trend) के तौर पर देखना चाहिए। असली तस्वीर तो 4 मई को ही साफ होगी।
