दुनिया इस समय ऊर्जा संकट के एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां भू-राजनीतिक तनावों ने ईंधन बाजार को अस्थिर बना दिया है। खासकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा असर डाला है। इस टकराव ने न केवल तेल बल्कि प्राकृतिक गैस और एलपीजी जैसे ईंधनों की सप्लाई चेन को भी प्रभावित किया है। लेकिन इस उथल-पुथल के बीच भारत के लिए एक सकारात्मक मोड़ सामने आया है, जिसने देश को संभावित बड़े संकट से उबरने का मौका दे दिया है।
हाल के दिनों में वैश्विक बाजार में प्राकृतिक गैस की कीमतों में अचानक आई गिरावट ने भारत के लिए एक नई रणनीतिक खिड़की खोल दी है। जहां कुछ समय पहले तक गैस की कीमतें आसमान छू रही थीं और भारतीय कंपनियों को स्पॉट मार्केट से खरीदारी रोकनी पड़ी थी, वहीं अब कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। इस बदलाव का फायदा उठाते हुए भारत ने एक बार फिर वैश्विक स्पॉट मार्केट में सक्रियता बढ़ा दी है और बड़े पैमाने पर गैस की खरीदारी शुरू कर दी है।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, भारत की प्रमुख सरकारी कंपनियां भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, गेल इंडिया लिमिटेड और गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन ने अप्रैल से जून की डिलीवरी के लिए करीब 16 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (MMBTU) की दर पर गैस खरीदी है। यह सौदे 15 अप्रैल को बंद हुए ट्रेडिंग सत्र में किए गए, जो इस बात का संकेत है कि भारत ने तेजी से बदलते बाजार का लाभ उठाने में देर नहीं की।
कुछ समय पहले तक स्थिति बिल्कुल अलग थी। जब वैश्विक तनाव अपने चरम पर था, तब प्राकृतिक गैस की कीमतें 25 डॉलर प्रति MMBTU तक पहुंच गई थीं। इस ऊंची कीमत के कारण भारतीय खरीदारों ने स्पॉट मार्केट से दूरी बना ली थी और कई टेंडर रद्द कर दिए गए थे। लेकिन जैसे ही कीमतों में गिरावट आई, भारत ने तुरंत अपनी रणनीति बदली और फिर से खरीदारी शुरू कर दी। यह एक ऐसा निर्णय है जो न केवल तत्काल संकट से निपटने में मदद करेगा, बल्कि दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत करेगा।
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सबसे बड़ा कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न संकट है। अमेरिका-ईरान तनाव के चलते इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर गतिविधियां प्रभावित हुईं, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ा। इसके अलावा कतर में हुए हमलों के कारण दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी संयंत्रों में से एक को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। इन दोनों घटनाओं ने मिलकर वैश्विक गैस सप्लाई के लगभग 20 प्रतिशत हिस्से को प्रभावित कर दिया।
भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इस संकट से अछूता नहीं रह सका। पिछले साल की तुलना में इस वर्ष एलएनजी की डिलीवरी में लगभग 14 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिससे आपूर्ति और मांग के बीच संतुलन बिगड़ गया। इस स्थिति ने भारत को नई रणनीति अपनाने के लिए मजबूर किया और अब कीमतों में गिरावट ने उसे राहत की सांस लेने का मौका दिया है।
भारत की ऊर्जा नीति पिछले कुछ वर्षों में एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। सरकार ने देश को “गैस आधारित अर्थव्यवस्था” बनाने का लक्ष्य रखा है, जिससे प्रदूषण को कम किया जा सके और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा सके। लेकिन इस दिशा में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत अभी भी अपनी गैस जरूरतों का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है। चाहे वह प्राकृतिक गैस हो या एलपीजी, घरेलू उत्पादन अभी भी मांग के अनुरूप नहीं है।
2024 में भारत का प्राकृतिक गैस आयात लगभग 35 हजार क्यूबिक मीटर तक पहुंच गया था, जो देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को दर्शाता है। हालांकि, इस साल की शुरुआत में ईरान संकट के कारण आयात में कुछ गिरावट देखने को मिली थी। लेकिन अब वैश्विक कीमतों में गिरावट ने स्थिति को फिर से संतुलित करने का अवसर प्रदान किया है।
भारत के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि वह अपने आयात स्रोतों में विविधता बनाए रखे। वर्तमान में भारत सबसे अधिक गैस आयात कतर, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका से करता है। इन देशों के साथ मजबूत व्यापारिक संबंध बनाए रखना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
इस पूरे घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार कितनी तेजी से बदल सकता है और देशों को कितनी फुर्ती से अपनी रणनीति बदलनी पड़ती है। भारत ने इस मामले में एक बार फिर अपनी रणनीतिक समझ का परिचय दिया है। जैसे ही कीमतें अनुकूल हुईं, उसने तुरंत खरीदारी बढ़ा दी, जिससे भविष्य में संभावित संकट से बचा जा सके।
हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह राहत अस्थायी हो सकती है। वैश्विक बाजार में अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है और किसी भी समय परिस्थितियां बदल सकती हैं। ऐसे में भारत को दीर्घकालिक समाधान पर भी ध्यान देना होगा, जैसे घरेलू उत्पादन बढ़ाना, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विकास करना और ऊर्जा दक्षता में सुधार करना।
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह भारत की आर्थिक स्थिति पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। गैस की कीमतों में गिरावट से आयात बिल कम होगा, जिससे चालू खाते के घाटे पर दबाव कम पड़ेगा। इसके अलावा, उद्योगों और उपभोक्ताओं को भी सस्ती ऊर्जा का लाभ मिलेगा, जिससे आर्थिक गतिविधियों को गति मिल सकती है।
यह कहा जा सकता है कि वैश्विक संकट के बीच भारत ने एक अवसर को पहचानकर उसे अपने पक्ष में बदल लिया है। प्राकृतिक गैस की कीमतों में गिरावट ने भारत को एक नई ऊर्जा रणनीति अपनाने का मौका दिया है, जो उसे एलपीजी संकट से उबरने में मदद कर सकती है। यह न केवल एक आर्थिक निर्णय है, बल्कि एक रणनीतिक कदम भी है, जो आने वाले समय में भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा।
