भारतीय शतरंज के लिए एक ऐतिहासिक पल में आर. प्रज्ञानानंदा ने ओस्लो में आयोजित नॉर्वे चेस 2026 का खिताब जीत लिया। इसके साथ ही वह इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट को जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए। उन्होंने शानदार वापसी करते हुए आधुनिक शतरंज के सबसे यादगार अभियानों में से एक को अंजाम दिया।
20 वर्षीय ग्रैंडमास्टर ने अंतिम दौर में जर्मनी के विन्सेंट कीमर को हराकर अपनी जीत पक्की की। वहीं वेस्ली सो और अलीरेज़ा फिरूज़जा के बीच मुकाबला ड्रॉ रहा, जिससे प्रज्ञानानंदा सबसे आगे निकल गए और खिताब अपने नाम कर लिया।
अंतिम दौर से पहले वेस्ली सो के 15.5 अंक थे, जबकि प्रज्ञानानंदा 15 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर थे। फिरूज़जा के 14.5 अंक थे, इसलिए तीनों खिलाड़ियों के पास जीत का मौका था।
आखिरी स्थान से चैंपियन बनने तक का सफर
टूर्नामेंट के बीच में ऐसा लग रहा था कि प्रज्ञानानंदा की उम्मीदें लगभग खत्म हो गई हैं। छह राउंड के बाद लगातार दो हार के कारण वह अंक तालिका में सबसे नीचे पहुंच गए थे।
लेकिन इसके बाद उन्होंने शानदार वापसी की और लगातार चार क्लासिकल मुकाबले जीत लिए। विश्व स्तरीय शतरंज में ऐसा प्रदर्शन बेहद दुर्लभ माना जाता है।
उन्होंने पहले अलीरेज़ा फिरूज़जा को हराया, फिर दुनिया के दिग्गज खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन को मात दी। इसके बाद उन्होंने मौजूदा विश्व चैंपियन डी. गुकेश और फिर विन्सेंट कीमर को हराकर लगातार चार जीत दर्ज कीं और सीधे खिताब की दौड़ में पहुंच गए।
कार्लसन के गढ़ में बड़ी जीत
मैग्नस कार्लसन लंबे समय से मैग्नस कार्लसन के नाम से जुड़ा रहा है। पांच बार के विश्व चैंपियन कार्लसन इस प्रतियोगिता के कई बार विजेता रह चुके हैं, इसलिए ओस्लो को दुनिया के सबसे कठिन शतरंज मंचों में गिना जाता है।
ऐसे में प्रज्ञानानंदा की जीत और भी खास बन जाती है। उन्होंने कार्लसन के घरेलू माहौल में न सिर्फ टूर्नामेंट जीता, बल्कि प्रतियोगिता के दौरान क्लासिकल मुकाबलों में उन्हें दो बार हराने का भी दुर्लभ कारनामा किया।
अंतिम दौर में बेहद करीबी मुकाबला
टूर्नामेंट का फैसला आखिरी दौर तक टला रहा। प्रतियोगिता के नियमों के अनुसार क्लासिकल जीत पर तीन अंक मिलते थे, इसलिए कई संभावनाएं बनी हुई थीं।
प्रज्ञानानंदा ने कीमर के खिलाफ जटिल स्थिति में शानदार चालें चलीं और एंडगेम में धीरे-धीरे मुकाबले पर पूरा नियंत्रण हासिल कर लिया। दूसरी ओर, वेस्ली सो और फिरूज़जा का मैच ड्रॉ होने के बाद प्रज्ञानानंदा की खिताबी जीत तय हो गई और टाई-ब्रेक की जरूरत नहीं पड़ी।
भारतीय शतरंज के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि
यह जीत भारतीय शतरंज के इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर है। प्रज्ञानानंदा नॉर्वे चेस जीतने वाले पहले भारतीय बन गए हैं और उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि भारत की नई पीढ़ी वैश्विक शतरंज में तेजी से अपनी पहचान बना रही है।
पूरे टूर्नामेंट में कड़ी प्रतिस्पर्धा और बेहद कम अंतर के बावजूद, आखिरी स्थान से चैंपियन बनने तक का उनका सफर हाल के वर्षों की सबसे शानदार वापसी में से एक माना जाएगा। खास बात यह है कि उन्होंने यह उपलब्धि उसी मंच पर हासिल की, जहां लंबे समय तक मैग्नस कार्लसन का दबदबा रहा।

































