दुनिया के नक्शे पर जब दो दिग्गज लोकतंत्र भारत और दक्षिण कोरिया हाथ मिलाते हैं, तो उसकी गूँज केवल व्यापारिक गलियारों में ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के केंद्र में भी सुनाई देती है। हाल ही में नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ‘ली जे म्योंग’ के बीच हुई मुलाकात ने एक ऐसी ही नई शुरुआत की नींव रखी है। आठ साल बाद किसी दक्षिण कोरियाई राष्ट्राध्यक्ष की इस यात्रा ने पुराने रिश्तों को केवल ताज़ा ही नहीं किया, बल्कि उन्हें एक ऐसी ऊँचाई पर पहुँचा दिया है जिसकी कल्पना 2010 के आर्थिक समझौते के समय शायद ही की गई थी। दोनों देशों ने साल 2030 तक अपने द्विपक्षीय व्यापार को $50 बिलियन तक ले जाने का एक साहसी और महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। यह केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि दो संस्कृतियों और दो उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच अटूट विश्वास का प्रमाण है।
एक दशक की नई नींव: पुराने व्यापारिक घाटे को पाटने की कोशिश
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच रिश्तों की कहानी 2010 के ‘व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते’ (CEPA) से शुरू हुई थी, लेकिन वक्त के साथ इसमें कुछ असंतुलन आ गया था। भारत के लिए चिंता का विषय हमेशा से व्यापार घाटा रहा है। पिछले वित्तीय वर्ष (2024-25) में जहाँ भारत का निर्यात घटकर $5.81 बिलियन रह गया, वहीं आयात $21 बिलियन के करीब पहुँच गया। इस $12.8 बिलियन के अंतर को कम करने के लिए दोनों नेताओं ने कमर कस ली है। अब भारत अपने स्टील, चावल और झींगा (shrimp) जैसे उत्पादों के लिए कोरियाई बाज़ारों में अधिक पहुंच चाहता है। यह बदलाव इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि भारत अब केवल एक उपभोक्ता बाज़ार नहीं, बल्कि एक विनिर्माण केंद्र (Manufacturing Hub) बनना चाहता है।
सेमीकंडक्टर और ‘डिजिटल ब्रिज’: भविष्य की तकनीक पर फोकस
इस मुलाकात की सबसे बड़ी हाइलाइट रही ‘इंडिया-कोरिया डिजिटल ब्रिज’ की शुरुआत। आज के दौर में जिसके पास डेटा और तकनीक है, वही दुनिया पर राज करेगा। पीएम मोदी और राष्ट्रपति ली ने एआई (AI), सेमीकंडक्टर और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) में सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाने का संकल्प लिया है। सेमीकंडक्टर, जो आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की रीढ़ हैं, उनके उत्पादन में दक्षिण कोरिया की महारत और भारत की कुशल कार्यशक्ति का मेल वैश्विक सप्लाई चेन को एक नया विकल्प दे सकता है। मोदी जी ने इसे “फ्यूचरिस्टिक पार्टनरशिप” का नाम दिया है, जो आने वाले दशक की विकास गाथा लिखेगा।
स्टील और ऊर्जा: ओड़िशा में $1 बिलियन का बड़ा निवेश
केवल कागज़ी समझौतों तक सीमित न रहकर, यह यात्रा ज़मीनी स्तर पर भी बड़े बदलाव लेकर आई है। दक्षिण कोरिया की दिग्गज कंपनी ‘POSCO Holdings’ ने भारत के ‘JSW ग्रुप’ के साथ मिलकर ओड़िशा में एक विशाल एकीकृत स्टील प्लांट स्थापित करने की घोषणा की है। 6 मिलियन टन प्रति वर्ष की क्षमता वाले इस प्लांट में 2031 तक लगभग $1.09 बिलियन का निवेश किया जाएगा। इसके अलावा, दोनों देश परमाणु ऊर्जा, स्वच्छ ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) के क्षेत्र में भी कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगे। नेफ्था (Naphtha) जैसे संसाधनों की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भी सहमति बनी है, जो वैश्विक ऊर्जा संकट के इस दौर में भारत के लिए एक बड़ी राहत है।
रक्षा और इंडो-पैसिफिक: साझा लोकतांत्रिक मूल्यों की ढाल
व्यापार के साथ-साथ सामरिक सुरक्षा भी इस चर्चा का अहम हिस्सा रही। राष्ट्रपति ली ने भारत को ‘ग्लोबल साउथ’ की एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्वीकार किया। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए दोनों देशों का दृष्टिकोण एक समान है। रक्षा नवाचार और औद्योगिक नवाचार में सहयोग बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया, जो यह दर्शाता है कि यह साझेदारी केवल सामान खरीदने-बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि एक-दूसरे की सुरक्षा और संप्रभुता को मज़बूत करने के लिए भी है।
सांस्कृतिक मेल और व्यापारिक नेतृत्व का संगम
इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान नई दिल्ली में सैमसंग, हुंडई और एलजी जैसी बड़ी कंपनियों के 250 से अधिक उद्योग जगत के नेता जुटे। यह दक्षिण कोरियाई कंपनियों का भारत के प्रति बढ़ते भरोसे को दिखाता है। साथ ही, संस्कृति, खेल और रचनात्मक उद्योगों में हुए चार समझौतों (MoUs) ने यह सुनिश्चित किया कि दोनों देशों के लोग भी एक-दूसरे के करीब आएँ। भारत और दक्षिण कोरिया के बीच यह नया ‘अपग्रेड’ वैश्विक अनिश्चितता के दौर में एक ऐसी स्थिरता लेकर आया है, जो न केवल दक्षिण एशिया बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बनेगा।
