दुनिया ने अभी राहत की सांस ली ही थी कि ईरान ने एक बार फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था की नब्ज पर हाथ रख दिया है। शुक्रवार को जिस ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को खोलने का उत्साहजनक ऐलान किया गया था, शनिवार होते-होते ईरान वहां से अपने वादों से पलट गया। इस यू-टर्न ने न केवल कूटनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि भारत जैसे देशों के लिए एक नया सिरदर्द पैदा कर दिया है जिनके जहाज बीच रास्ते से लौटने को मजबूर हो गए हैं। यह घटनाक्रम केवल एक समुद्री मार्ग के बंद होने की खबर नहीं है, बल्कि यह डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते उस ‘ईगो वॉर’ का परिणाम है, जिसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ सकती है।
ईरान का अचानक फैसला और सैन्य नियंत्रण की वापसी
शनिवार को ईरान के संयुक्त सैन्य कमांड ने एक कड़ा संदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अब सशस्त्र बलों की सख्त निगरानी और नियंत्रण वापस आ गया है। ईरान का यह फैसला शुक्रवार के उस बयान के ठीक उलट है जिसमें कहा गया था कि जलमार्ग को पूरी तरह खोल दिया गया है। ईरानी सेना ने चेतावनी दी है कि जब तक अमेरिका ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी (Naval Blockade) नहीं हटाता, तब तक इस मार्ग से व्यापारिक जहाजों का आवागमन बाधित रहेगा। ईरान का यह कदम पूरी तरह से सुरक्षात्मक और आक्रामक रणनीति का मिश्रण है, जिसका उद्देश्य अमेरिका पर दबाव बनाना है।
ट्रंप का बयान: जिसने बिगाड़ा खेल
ईरान के इस अचानक हृदय परिवर्तन के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह कड़ा बयान है, जिसमें उन्होंने कहा था कि तेहरान पर लगी अमेरिकी नाकाबंदी तब तक जारी रहेगी जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर वाशिंगटन की शर्तों पर समझौता नहीं कर लेता। ट्रंप प्रशासन की इस “मैक्सिमम प्रेशर” नीति ने ईरान को रक्षात्मक होने के बजाय पलटवार करने पर मजबूर कर दिया। तेहरान ने साफ कर दिया है कि वह एकतरफा रियायतें देने के मूड में नहीं है। यदि उसके बंदरगाहों को दुनिया से काटा जाएगा, तो वह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग को काटने से पीछे नहीं हटेगा।
भारतीय टैंकरों को लेना पड़ा यू-टर्न: समुद्र में बढ़ी अनिश्चितता
इस तनाव का सबसे सीधा और नकारात्मक प्रभाव भारत पर देखने को मिला है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार को कई भारतीय तेल टैंकरों, जिनमें ‘सन्मार हेराल्ड’, ‘देश गरिमा’, ‘देश वैभव’ और ‘देश विभोर’ शामिल हैं, को बीच रास्ते से मुड़ना पड़ा। ये टैंकर दुबई से होर्मुज की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन ताजा प्रतिबंधों की खबर मिलते ही इन्हें यू-टर्न लेना पड़ा। वर्तमान में ये जहाज ईरान के केश्म आइलैंड (Qeshm Island) के पास लंगर डाले हुए हैं। केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि दो ग्रीक जहाजों को भी इसी तरह की स्थिति का सामना करना पड़ा है। यह अनिश्चितता भारतीय तेल कंपनियों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे सप्लाई चेन में देरी और लागत में वृद्धि होना तय है।
मित्र देशों के लिए भी खत्म हुई ‘विशेष छूट’?
इससे पहले ईरान ने एक लचीला रुख अपनाते हुए भारत, रूस, चीन, इराक और पाकिस्तान जैसे ‘मित्र देशों’ के जहाजों को गुजरने की अनुमति दी थी। इसी छूट के तहत भारत के 8 टैंकर कच्चा तेल और एलपीजी लेकर सुरक्षित भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचे थे। लेकिन ताजा आदेश के बाद यह स्पष्ट नहीं है कि क्या मित्र देशों के लिए यह ‘स्पेशल कॉरिडोर’ अभी भी खुला है या नहीं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के ‘सीजफायर’ वाले दावों और सैन्य कमांड के ‘कंट्रोल’ वाले दावों के बीच विरोधाभास ने जहाजों के कप्तानों और बीमा कंपनियों को गहरे संशय में डाल दिया है।
2026 का वो काला दिन: तनाव की जड़ें
इस पूरे विवाद की जड़ें 28 फरवरी 2026 को हुए उस हमले में हैं, जब इजरायल और अमेरिका ने संयुक्त रूप से ईरान पर सैन्य कार्रवाई की थी। उस हमले के बाद से ही होर्मुज स्ट्रेट एक युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो गया है। वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20-30% हिस्सा इसी संकरे मार्ग से गुजरता है। ईरान जानता है कि उसके पास यही एक ऐसा पत्ता है जिसे चलकर वह वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकता है। जब तक 2026 के उस हमले के बाद पैदा हुई कड़वाहट और परमाणु वार्ता पर कोई ठोस सहमति नहीं बनती, तब तक होर्मुज का यह ‘खुलना और बंद होना’ जारी रहने की आशंका है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराता खतरा
भारत के लिए यह स्थिति किसी दोधारी तलवार जैसी है। एक तरफ हमारे अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी तरफ ऊर्जा जरूरतों के लिए हम खाड़ी देशों पर निर्भर हैं। भारतीय टैंकरों का वापस मुड़ना यह संकेत है कि आने वाले दिनों में घरेलू बाजार में एलपीजी और कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता आ सकती है। भारत को अब अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ानी होगी ताकि उसके जहाजों को इस वैश्विक खींचतान में ‘कोलेटरल डैमेज’ न होना पड़े। होर्मुज का संकट अब केवल ईरान का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की परीक्षा बन गया है।
