‘पाकिस्तान की औकात नहीं’: ईरानी सांसद ने बिचौलिए की भूमिका पर उठाया सवाल; अमेरिका के सामने ‘बेबसी’ और भरोसे की कमी की पूरी कहानी

मध्य पूर्व की अशांत हवाओं के बीच जब शांति की कोशिशें तेज होती हैं, तो अक्सर पड़ोसी देश 'बिचौलिए' की भूमिका निभाने के लिए हाथ आगे बढ़ाते हैं

ईरान के सांसद Ebrahim Rezaei.

मध्य पूर्व की अशांत हवाओं के बीच जब शांति की कोशिशें तेज होती हैं, तो अक्सर पड़ोसी देश ‘बिचौलिए’ की भूमिका निभाने के लिए हाथ आगे बढ़ाते हैं। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान इन दिनों खुद को एक बड़े मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। कल तक ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची इस्लामाबाद की गलियों में डील फाइनल करने की उम्मीदें तलाश रहे थे, लेकिन अब ईरान की संसद के भीतर से उठी एक तीखी आवाज ने पाकिस्तान की कूटनीतिक साख को तार-तार कर दिया है। ईरानी सांसद इब्राहिम रेजई ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान इस बातचीत के लिए “उपयुक्त जगह” नहीं है, क्योंकि उसकी अपनी कोई स्वतंत्र आवाज नहीं है।

दोस्ती अपनी जगह, विश्वसनीयता अपनी जगह: रेजई का पाकिस्तान पर प्रहार

ईरान की संसद में चर्चा के दौरान सांसद इब्राहिम रेजई ने पाकिस्तान की मध्यस्थता पर जो सवाल उठाए, वे बेहद कड़वे और सीधे थे। उन्होंने कूटनीतिक शिष्टाचार को निभाते हुए पहले तो पाकिस्तान को एक “अच्छा दोस्त और पड़ोसी” बताया, लेकिन तुरंत बाद हकीकत का आईना दिखाते हुए कहा कि पाकिस्तान के पास इतनी ‘औकात’ या विश्वसनीयता नहीं है कि वह इस नाजुक डील में निष्पक्ष अंपायर बन सके। रेजई का मानना है कि एक मध्यस्थ को स्वतंत्र स्टैंड लेने की जरूरत होती है, और पाकिस्तान का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि वह कभी भी वाशिंगटन के प्रभाव से मुक्त होकर काम नहीं कर पाया है।

अमेरिका और ट्रंप का दबाव: “निष्पक्ष अंपायर कैसे बनेगा पाकिस्तान?”

ईरान को पाकिस्तान से सबसे बड़ी शिकायत उसके ‘दोहरेपन’ को लेकर है। इब्राहिम रेजई ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सरकार और उसके वार्ताकार हमेशा अमेरिकी हितों, और खासकर डोनाल्ड ट्रंप की इच्छाओं के साये में काम करते हैं। ईरानी सांसद ने तंज कसते हुए कहा कि पाकिस्तानी नेतृत्व में इतनी हिम्मत ही नहीं है कि वे अमेरिकियों की मर्जी के खिलाफ एक शब्द भी बोल सकें। ऐसे में ईरान का मानना है कि जो देश खुद अमेरिका के दबाव में अपनी संप्रभुता खो चुका हो, वह दो देशों के बीच न्यायपूर्ण समझौता कैसे करा सकता है? रेजई के अनुसार, पाकिस्तान एक तरफा झुकाव रखने वाला पक्ष है, न कि एक निष्पक्ष मध्यस्थ।

अमेरिकी ‘धोखे’ पर चुप्पी: पाकिस्तान की बेबसी के दो उदाहरण

अपनी बात को पुख्ता करने के लिए रेजई ने दो महत्वपूर्ण उदाहरण दिए। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ने पहले खुद पाकिस्तान द्वारा दिए गए एक शांति प्रस्ताव को स्वीकार किया था, लेकिन बाद में डोनाल्ड ट्रंप अपने वादे से मुकर गए। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि जब अमेरिका ने पाकिस्तान के प्रस्ताव की सार्वजनिक रूप से ‘तौहीन’ की, तब भी पाकिस्तानी नेतृत्व ने दुनिया को यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि उन्हें धोखा दिया गया है। रेजई का तर्क सीधा है— “जो देश अपने स्वाभिमान के लिए नहीं बोल सकता, वह ईरान के हक के लिए क्या बोलेगा?”

फ्रीज संपत्तियां और लेबनान संकट: वादों से मुकरा वाशिंगटन

रेजई ने अमेरिका की पोल खोलते हुए कहा कि शांति वार्ता के दौरान लेबनान संकट और विदेशों में फंसी ईरान की करोड़ों डॉलर की संपत्तियों को मुक्त करने के बड़े-बड़े वादे किए गए थे। अमेरिका ने इनमें से एक भी वादा पूरा नहीं किया। विडंबना यह है कि पाकिस्तान को इस ‘धोखे’ की पूरी जानकारी है, लेकिन वह फिर भी अमेरिका की ‘हां में हां’ मिला रहा है। ईरान के लिए यह चुप्पी असहनीय है, क्योंकि उसे लगता है कि पाकिस्तान मध्यस्थता के नाम पर केवल अमेरिकी एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है।

कूटनीतिक हवा निकली: इस्लामाबाद के चक्कर हुए बेकार?

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची की इस्लामाबाद यात्रा के बाद ऐसा लगा था कि पाकिस्तान मिडिल ईस्ट का नया ‘तारणहार’ बनेगा। लेकिन इब्राहिम रेजई के बयान ने पाकिस्तान की उस कूटनीति की हवा निकाल दी है। इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश गया है कि ईरान अब पाकिस्तान को एक भरोसेमंद साथी के रूप में नहीं देखता। डील के लिए अब किसी ऐसे देश की तलाश शुरू हो सकती है, जिसका स्टैंड अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्वतंत्र हो और जो अमेरिका के सामने डटकर खड़ा रह सके।

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