ममता बनर्जी की ‘जातिसूचक’ टिप्पणी पर गरमाई सियासत: NCSC ने थमाया नोटिस, 3 दिन का अल्टीमेटम, बंगाल में छिड़ा नया विवाद

पश्चिम बंगाल के चुनावी महासमर में अब एक नया और गंभीर मोड़ आ गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा कथित तौर पर एक चुनावी रैली के दौरान की गई 'जातिसूचक टिप्पणी' ने राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ लिया है।

Mamata Banerjee

पश्चिम बंगाल के चुनावी महासमर में अब एक नया और गंभीर मोड़ आ गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा कथित तौर पर एक चुनावी रैली के दौरान की गई ‘जातिसूचक टिप्पणी’ ने राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ लिया है। इस मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आयोग ने न केवल इस पर स्वतः संज्ञान लिया है, बल्कि राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को नोटिस जारी कर तीन दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब बंगाल में अनुसूचित जाति समुदायों के वोट बैंक को लेकर पहले ही खींचतान जारी है।

विवाद की जड़: एक चुनावी रैली और वो ‘विवादास्पद’ शब्द

पूरे विवाद की शुरुआत मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की एक हालिया चुनावी रैली से हुई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मुख्यमंत्री ने भाषण के दौरान कथित तौर पर एक ऐसे शब्द का इस्तेमाल किया जिसे अनुसूचित जाति (SC) समुदाय के लिए अपमानजनक और हीन माना जाता है। जैसे ही इस टिप्पणी का वीडियो और खबरें सार्वजनिक हुईं, अनुसूचित जाति के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों और विपक्षी दलों ने इसे हाथों-हाथ लिया। उनका आरोप है कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस तरह की भाषा का उपयोग राज्य के एक बड़े तबके की गरिमा को ठेस पहुँचाता है।

NCSC का स्वतः संज्ञान: “अपमान किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं”

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष किशोर मकवाना ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि मीडिया रिपोर्टों में दी गई जानकारी यदि सही है, तो यह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(s) के तहत एक दंडनीय अपराध है। आयोग ने अपने बयान में कहा कि वह अनुसूचित जातियों के अधिकारों और उनकी सामाजिक गरिमा की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। अध्यक्ष मकवाना ने दो टूक शब्दों में कहा कि किसी भी स्तर पर जातीय अपमान को स्वीकार नहीं किया जाएगा, चाहे वह व्यक्ति कितने भी ऊँचे पद पर क्यों न बैठा हो।

तीन दिन का अल्टीमेटम: मुख्य सचिव और DGP को नोटिस

आयोग ने केवल नाराजगी नहीं जताई, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई भी शुरू कर दी है। पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को आधिकारिक नोटिस जारी कर पूछा गया है कि इस मामले में अब तक क्या कार्रवाई की गई है। आयोग ने राज्य सरकार को तीन दिनों का समय दिया है ताकि वह अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश करे। किशोर मकवाना ने पश्चिम बंगाल के मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए यह भी कहा कि राज्य में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अत्याचार और हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे माहौल में मुख्यमंत्री के स्तर से इस तरह की टिप्पणी आना ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ है।

सियासी उबाल और सामाजिक असर

बंगाल की राजनीति में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों की भूमिका निर्णायक रही है। ममता बनर्जी की इस कथित टिप्पणी ने भाजपा को हमला करने का एक बड़ा मौका दे दिया है। विपक्ष का तर्क है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) दलितों और पिछड़ों को केवल वोट बैंक समझती है, लेकिन उनके सम्मान की उसे कोई परवाह नहीं है। दूसरी ओर, टीएमसी के खेमे में इस नोटिस को लेकर बेचैनी है। जानकारों का मानना है कि यदि यह मामला कानूनी रूप से आगे बढ़ता है, तो चुनाव के अंतिम चरणों में इसका सीधा असर वोटिंग पैटर्न पर पड़ सकता है।

कानून और गरिमा की लड़ाई

अनुसूचित जाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत सार्वजनिक रूप से किसी व्यक्ति की जाति को लेकर अपमानजनक शब्द कहना न केवल सामाजिक रूप से निंदनीय है, बल्कि जेल की सजा का प्रावधान भी रखता है। आयोग ने यह नोटिस भेजकर यह साफ कर दिया है कि वह इस मामले में किसी भी तरह की ढिलाई नहीं बरतेगा। अब सबकी नजरें पश्चिम बंगाल सरकार की उस रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो उसे तीन दिनों के भीतर आयोग को सौंपनी है। क्या सरकार इस पर माफी मांगेगी या इसे चुनावी साजिश बताएगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

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