‘इतिहास’ केवल बीते समय की घटनाओं का क्रम नहीं होता, बल्कि किसी राष्ट्र की चेतना, उसकी स्मृतियों और उसकी पहचान का आधार भी होता है। जो कुछ हम अपने अतीत के बारे में जानते और मानते हैं, वही हमारे वर्तमान को दिशा देता है और भविष्य की रूपरेखा भी निर्धारित करता है। यह एक स्वीकृत सत्य है कि जो समाज अपने इतिहास को भूल जाता है या उससे विमुख हो जाता है, उसकी पहचान धीरे-धीरे धुंधली पड़ने लगती है और उसका ‘भूगोल’ भी बदल सकता है। भारत जैसे प्राचीन और बहुआयामी राष्ट्र के संदर्भ में यह प्रश्न और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है, जहाँ अतीत केवल इतिहास नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति का हिस्सा रहा है।
इतिहास लेखन की प्रक्रिया कभी भी पूर्णतः निष्पक्ष और निर्विवाद नहीं रही। विभिन्न कालखंडों में, अलग-अलग दृष्टिकोणों और विचारधाराओं ने इतिहास की व्याख्या को प्रभावित किया है। औपनिवेशिक काल ने भारतीय इतिहास को एक विशेष दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति को जन्म दिया, जिसका प्रभाव स्वतंत्रता के बाद भी किसी न किसी रूप में बना रहा। इसी क्रम में कुछ कृतियाँ अत्यंत प्रभावशाली रहीं, जिन्होंने व्यापक स्तर पर इतिहास की समझ को आकार दिया। इसी परिप्रेक्ष्य में जवाहर लाल नेहरू द्वारा रचित ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ का उल्लेख महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यह कृति, जो 1940 के दशक में महाराष्ट्र के अहमदनगर में कारावास के दौरान लिखी गई और 1946 में प्रकाशित हुई, लंबे समय तक भारतीय इतिहास और सभ्यता को समझने के एक प्रमुख स्रोत के रूप में प्रस्तुत की जाती रही। आज भी इसका प्रभाव है। इसके आधार पर निर्मित ‘भारत एक खोज’ जैसे धारावाहिकों ने भी जनमानस में इतिहास की एक विशेष छवि को स्थापित करने में भूमिका निभाई।
समय के साथ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ जैसी इतिहास की यह प्रस्तुति पूर्णतः संतुलित और बहुआयामी है, या फिर इसकी पुनः समीक्षा की आवश्यकता है। बदलते बौद्धिक परिदृश्य में इतिहास को नए सिरे से देखने और परखने के प्रयास भी सामने आए हैं। इन्हीं प्रयासों की कड़ी में कुछ लेखकों ने स्थापित मान्यताओं को चुनौती देते हुए वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का साहस किया है। ऐसे ही एक उत्कृष्ट प्रयास में सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. राकेश कुमार आर्य ने वर्ष 2025 में एक पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक है ‘इतिहास का विकृतिकरण (डिस्कवरी ऑफ इंडिया की डिस्कवरी)’और प्रकाशन किया है दिल्ली स्थित अक्षय प्रकाशन ने। 200 पृष्ठों की इस पुस्तक में कुल 32 अध्याय हैं।
सुदर्शन न्यूज के प्रधान संपादक सुरेश चव्हाणके ने इस पुस्तक का प्राक्कथन अर्थात् ‘आमुख’ लिखा है। उनके अनुसार, “यह पुस्तक इस सच्चाई को उजागर करती है कि डिस्कवरी ऑफ इंडिया वस्तुतः भारत के वास्तविक इतिहास का प्रतिनिधित्व नहीं करती… ।” इसके बाद ‘लेखकीय निवेदन’ से पुस्तक की प्रस्तावना है। इस प्रस्तावना की पहली पंक्ति में केवल 6 शब्द हैं और ये 6 शब्द पाठक को ‘चौंकाने’ के लिए या यूँ कहें ‘भीतर से झकझोरने’ के लिए पर्याप्त हैं।
‘विभाजनकालीन भारत के साक्षी’ पुस्तक के हवाले से इस लेखकीय निवेदन में नेहरू के बारे ऐसा रहस्योद्घाटन किया गया है कि पाठक सोचने पर विवश हो सकता है । या यूँ कहें, पाठक को भारत के इतिहास के साथ हुई साजिश का मूल कारण समझ आ सकता है। इस भाग में आपको कई चौंकाने वाले तथ्य मिलेंगे। 1965 और 1971 के युद्धों में भारत ने जीती हुई भूमि पाकिस्तान को क्यों लौटा दी थी? यह समझने का सूत्र भी मिलेगा। संक्षेप में कहें तो यह लेखकीय निवेदन ‘नेहरूवियन डॉक्ट्रिन’ की नींव की पोल खोलने जैसा है।
पुस्तक की विशेषता यह है कि लेखक ने पहले ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में नेहरू ने क्या लिखा है, वह दिया है और फिर भारतीय दृष्टिकोण से टिप्पणी की है। पुस्तक का हर अध्याय अपने आप में एक अलग जानकारी समेटे हुए है, ऐसी जानकारी जो पाठक के विचार धरातल को हिलाने की ताकत रखती है। स्वयं को शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और हिंदू केवल जन्म की दुर्घटना से लिखने वाले नेहरू जब धर्म संबंधी विषयों पर लिखेंगे तो समस्या तो होनी ही थी, यह बात स्पष्ट सिद्ध होती है। पहला अध्याय धर्म संबंधी नेहरू के अज्ञान को दर्शाता है और वहीं धर्म की सटीक परिभाषा एवं धर्म और विज्ञान के अंतर्संबंध को स्पष्ट करता है। दूसरा अध्याय पाठक को बताएगा कि नेहरू स्वयं को ‘मार्क्सवादी अर्थात् कम्युनिस्ट’ मानते थे। कम्युनिस्टों का मानवता के विरुद्ध खूनी क्रांतियों का ‘लाल आतंक’ सर्वविदित है और नेहरू का स्वयं को कम्युनिस्ट मानना भारत की आत्मा के साथ बहुत बड़ा छल है। नेहरू की पुत्री इंदिरा ने भी अपनी सरकार कम्युनिस्टों के सहारे ही बचाई थी।
जैसे-जैसे पाठक पुस्तक में आगे बढ़ता जाएगा और उसे नेहरू के ही शब्दों में भारत को लेकर उनकी मानसिकता का पता चलता जाएगा, तो पाठक को नेहरू के बाद इस देश में हुए भारत विरोधी सभी खेलों को समझने की अंतर्दृष्टि मिल जायेगी। आर्य द्रविड़ विभाजन, आर्य आक्रमण सिद्धांत, संस्कृतनिष्ठ हिंदी के स्थान पर उर्दू या उर्दूनिष्ठ हिंदी के पक्षधर नेहरू की मानसिकता का प्रभावशाली विवेचन लेखक ने इस पुस्तक में करने का प्रयास किया है। यह पुस्तक बताती है कि नेहरू ने विदेशी मजहब की आक्रान्ताओं का भारतीयकरण करने का प्रयास किया। यह कैसे संभव हो सकता है कि विदेशी मजहब वाली लुटेरी आक्रांता भारत में आकर भारतीय हो जाएगी ! यह नेहरू द्वारा विशुद्ध रूप से भारतीय इतिहास का विकृतिकरण करने का प्रयास था। पुस्तक का सातवाँ अध्याय पाठक को बहुत ध्यान से पढ़ना चाहिए। भारत में वैदिक काल से प्रचलित वर्ण-व्यवस्था जिसके बारे में श्रीमद भगवत गीता में श्रीकृष्ण भी वर्णन करते हैं, जो गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर थी, उसे नेहरू ‘चमड़ी के रंग’ के आधार पर मानते थे। इस संदर्भ में ग्यारहवाँ अध्याय बहुत महत्त्वपूर्ण है।
पुस्तक का हर अध्याय पाठक को असहज करेगा और सोचने पर विवश करेगा कि नेहरू जिस ‘भारत की खोज’ जेल में बैठकर कर रहे थे, उस खोज में वास्तविक ‘भारत’ कहाँ था? रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों को ख्याली इतिहास मानने वाले नेहरू न जाने कौन से भारत की खोज कर रहे थे, ये प्रश्न पाठक के मन में उठाना स्वाभाविक है!
पुस्तक का अंतिम अध्याय नेहरू के ‘इस्लाम के प्रति उदार दृष्टिकोण’ को उजागर करता है। यह अध्याय वास्तव में हिंदू, हिंदी और हिन्दुस्थान के साथ नेहरू के धोखे और विरोध का परिचायक है। इस पुस्तक के अध्ययन के बाद ऐसा लिखने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि वास्तव में नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ पुस्तक भारत के ‘इंडिया’ में बदले स्वरूप को सत्यापित करने का एक हिंदूद्रोही, इस्लाम परस्त और मार्क्सवादी प्रयास था। एक ऐसा बौद्धिक रूप से हिंसक प्रयास जिससे भारतीयता आज तक घायल है।
समीक्षा लंबी न हो इसलिए संक्षेप में कहें तो डॉ. राकेश आर्य ने नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया की डिस्कवरी’ की मात्र समीक्षा ही नहीं की है, बल्कि उसके आधार पर निर्मित भारत संबंधी ऐतिहासिक दृष्टिकोण की व्यापक पुनर्परीक्षा की है। डॉ आर्य की यह पुस्तक नेहरू जैसे तथाकथित इतिहासकारों द्वारा भारतीयों में ‘हीनभावना’ को पोषित करने वाले ‘भारत के विकृत इतिहास’ और ‘भारतीय ज्ञान-परंपरा’ को विशुद्ध ‘भारतीय’ दृष्टिकोण से देखने और समीक्षा करने की आवश्यकता पर बल देती है। पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है। नारायणायेती समर्पयामि…..
पुस्तक का नाम: इतिहास का विकृतिकरण (डिस्कवरी ऑफ इंडिया की डिस्कवरी)
लेखक: डॉ. राकेश कुमार आर्य
प्रकाशक: अक्षय प्रकाशन, दिल्ली
पृष्ठ: 200
मूल्य: 360 (प्रिंट)
