जब किसी आक्रांता ने किसी मंदिर को तोड़ा होगा, तब शायद उसे यह विश्वास रहा होगा कि उसने केवल पत्थर नहीं गिराए, बल्कि एक सभ्यता की स्मृति, आत्मविश्वास और आस्था को भी पराजित कर दिया है। चाहे वह खिलजी हो, बाबर हो, औरंगज़ेब हो या अन्य आक्रमणकारी, उन्हें लगा होगा कि यह विजय स्थायी है। मंदिरों पर बने ढांचे केवल स्थापत्य नहीं थे, वे विजेता मानसिकता के प्रतीक थे। संदेश साफ था कि “आँख खोलकर देखो, तुम्हारी संस्कृतियों और परंपराओं के साथ क्या हुआ।” उस समय किसी को कुछ छिपाने की आवश्यकता नहीं थी। विजेता अपनी विजय को खुले रूप में प्रदर्शित करता था। मंदिर तोड़कर उसी स्थान पर नमाज़ या सत्ता का प्रतीक स्थापित करना केवल धार्मिक कर्मकांड का नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक प्रभुत्व का भी प्रदर्शन था। यह पराजित समाज को उसकी हार का निरंतर स्मरण कराने का माध्यम था।
मध्यकालीन मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमणों के पीछे केवल राजनीतिक विजय नहीं, बल्कि एक वैचारिक दृष्टि भी कार्य कर रही थी। इस्लामी विधिशास्त्र (फ़िक़्ह) की कुछ पारंपरिक अवधारणाओं जैसे दारुल इस्लाम (जहाँ इस्लामी शासन हो) और दारुल हरब (जहाँ इस्लामी शासन न हो) का उपयोग आक्रमणकारी शासकों ने अपने विस्तार को धार्मिक वैधता देने के लिए किया। इसी मानसिकता के अंतर्गत पराजित समाज के धार्मिक प्रतीकों, मंदिरों और सांस्कृतिक केंद्रों पर अधिकार स्थापित करने को “विजय” का सार्वजनिक प्रतीक बनाया जाता था। लेकिन इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। सदियाँ बीत जाती हैं, साम्राज्य मिट जाते हैं, पर संस्कृति की स्मृति और सभ्यता के पदचिन्ह किसी न किसी रूप में जीवित रहते है।
आज भारत एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र है। यहां संविधान का शासन है, न्यायपालिका है, पुरातत्व सर्वेक्षण है और ऐतिहासिक तथ्यों की वैज्ञानिक जांच की व्यवस्था है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि यदि किसी स्थल के मूल स्वरूप को लेकर प्रमाण सामने आते हैं, तो फिर उस स्थान को लेकर इतनी बेचैनी क्यों? आखिर आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था में भी किसी विवादित ढांचे पर बने रहने की जिद क्यों दिखाई देती है? इसका उत्तर केवल कानूनी नहीं, मनोवैज्ञानिक भी है। क्योंकि “विजेता भाव” केवल सत्ता से नहीं जाता, वह मानसिकता में भी जीवित रहता है। और दूसरी ओर “पीड़ित भाव” भी केवल स्मृति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अनुभव का हिस्सा बन जाता है। काशी विश्वनाथ, अयोध्या का राम मंदिर, कृष्ण जन्मभूमि और भोजशाला इसी द्वंद्व के प्रतीक के रूप में हमारे सामने उपस्थित हुई है। भोजशाला को लेकर चल रहा विवाद और इस पर मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक स्मृति और सभ्यतागत संघर्ष की अनुभूति से जुड़ा हुआ है, जहाँ एक पक्ष इसे सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का प्रश्न मानता है तो वहीं दूसरा पक्ष इस मानसिकता मे है कि इतिहास और आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति जो भी इशारा करें पर उनकी सोच अभी भी विजेता की मानसिक दृष्टि से अलग होकर नहीं देखने देती।
भोजशाला का संघर्ष: केवल एक स्थल नहीं, स्मृति का पुनर्जागरण
भोजशाला का इतिहास केवल स्थापत्य परिवर्तन का नहीं, बल्कि सभ्यतागत संघर्ष, सांस्कृतिक स्मृति और विजेता की मानसिकता का भी प्रतीक माना जाता है। इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यह स्थल कभी माँ सरस्वती की उपासना, शिक्षा और ज्ञान का प्रमुख केंद्र था। इतिहासकार शिवकुमार गोयल के अनुसार, सन् 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान भोजशाला को पहली बार गंभीर क्षति पहुँची। कहा जाता है कि उस समय यहाँ के शिक्षक और विद्यार्थियों ने इस्लामिक सेना का विरोध किया। लगभग 1,200 छात्र–शिक्षकों को बंदी बनाकर इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा गया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद उनकी हत्या कर शवों को हवन कुंड में फेंक दिए जाने का उल्लेख मिलता है। यह प्रसंग उस दौर की उस मानसिकता को दर्शाता है, जहाँ धार्मिक–राजनीतिक विजय केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रतीकों और परंपराओं को बदलने का माध्यम भी बनती थी। इसी क्रम में भोजशाला परिसर को धीरे–धीरे “कमाल मौला मस्जिद” के रूप में स्थापित किया गया।
सूफी संत कमाल मौला के नाम पर बने इस ढाँचे को खिलजी शासकों ने वैचारिक और धार्मिक पहचान देने का प्रयास किया। बाद में दिलावर खां गौरी द्वारा ध्वस्त भाग पर मस्जिद निर्माण का उल्लेख मिलता है। सन् 1514 में महमूद शाह खिलजी के शासनकाल में परिसर के शेष भाग को भी मस्जिदी स्वरूप में बदल दिया गया। सन् 1875 की खुदाई में यहाँ से माँ सरस्वती की अत्यंत सुंदर प्रतिमा प्राप्त हुई, जिसे अंग्रेज अधिकारी मेजर किनकेड लंदन ले गया। आज वह प्रतिमा ब्रिटिश म्यूज़ियम में संरक्षित है। यह प्रतिमा आज भी भोजशाला की मूल पहचान और उसकी सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है।
सन् 1952 में महाराजा भोज स्मृति बसंतोत्सव समिति ने भोजशाला मुक्ति के प्रयास प्रारंभ किए। 1961 में पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने यह प्रमाणित किया कि मां वाग्देवी की प्रतिमा लंदन के संग्रहालय में मौजूद है। 1970 के बाद परिसर में नमाज़ भी प्रारंभ हुई और विवाद का स्वरूप और जटिल हो गया। 1992 में बसंत पंचमी के अवसर पर साध्वी ऋतंभरा ने भोजशाला में हनुमान चालीसा के आह्वान के साथ एक नए चरण का आरंभ किया। 2000 में “घर–घर देवालय” अभियान के माध्यम से जनजागरण हुआ और 2003 में लाखों श्रद्धालुओं ने मां वाग्देवी का पूजन किया।
6 फरवरी 2003 का दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा, जब बसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ पड़े। एक लाख से अधिक धर्मरक्षकों का संगम भोजशाला मुक्ति के संकल्प का प्रतीक बना। इसके बाद आंदोलन में बलिदान भी हुए, प्रतिबंधात्मक कार्रवाइयाँ भी हुईं, लेकिन संघर्ष रुका नहीं। 8 अप्रैल 2003 को लगभग 650 वर्षों बाद हिंदुओं को दर्शन और पूजन का अधिकार प्राप्त हुआ। 2016 में गर्भगृह में मां सरस्वती के चित्र की स्थापना और यज्ञ प्रारंभ हुआ। धीरे–धीरे वर्ष में 52 दिन पूजन का अधिकार प्राप्त हुआ।
2022 में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने वैज्ञानिक सर्वे की मांग करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 11 मार्च 2024 को हाईकोर्ट ने एएसआई को पूरे परिसर का सर्वे करने का निर्देश दिया। मार्च से जून 2024 तक चले लगभग 98 दिन के सर्वे में एएसआई ने अभिलेखों, मूर्तिकला, स्थापत्य अवशेषों और शिलालेखों के आधार पर यह संकेत दिया कि वर्तमान ढांचा पूर्ववर्ती मंदिरों के अवशेषों से निर्मित है। मुस्लिम पक्ष ने इस पर आपत्ति जताई। 22 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने सीलबंद रिपोर्ट को खोलने और सभी पक्षों को आपत्तियाँ दर्ज कराने की अनुमति दी। अप्रैल–मई 2026 में हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनीं और 15 मई 2026 को निर्णय सामने आया। इसमें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने भोजशाला को ‘वाग्देवी मंदिर‘ माना है और हिंदू पक्ष को वहां पूजा–अर्चना का पूरा अधिकार देने की बात कही।
पीड़ित भाव और विजेता भाव का साहचर्य
भोजशाला विवाद का सबसे जटिल पक्ष यही है कि यहां दो मानसिकताएँ समानांतर दिखाई देती हैं। एक ओर वह समाज है जो मानता है कि उसकी आस्था, उसके मंदिर और उसकी सांस्कृतिक पहचान पर आक्रमण हुआ था। उसके लिए भोजशाला केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक पीड़ा और सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का प्रश्न है। इसलिए वह अपने संघर्ष को “न्याय की वापसी” मानता है। वहीं दूसरी ओर, जब न्यायालय या वैज्ञानिक सर्वेक्षण से ऐसे संकेत सामने आते हैं जो ऐतिहासिक दावों को पुष्ट करते हैं, तब दूसरे पक्ष का विरोध के साथ “पीड़ित होने” का स्वर भी उभरता है। पीड़ित होने का यह भाव भी उनके विजेता की मानसिकता के ही कारण है जो यह सदा से मानते हैं कि भोजशाला जैसी अनेकों संस्कृतियों और सभ्यताओं को उन्होंने अपने पराक्रम से जीता था। यही विरोधाभास इस पूरे विमर्श को और जटिल बनाता है। जो पक्ष सदियों तक विजेता प्रतीकों के साथ खड़ा दिखाई देता है, वही आधुनिक संवैधानिक प्रक्रिया में स्वयं को असुरक्षित या पीड़ित भी प्रस्तुत करता है। यहीं से यह प्रश्न जन्म लेता है कि क्या वास्तव में विवाद केवल भूमि का है? या यह इतिहास, पहचान, स्मृति और मनोवैज्ञानिक प्रभुत्व का संघर्ष भी है?
भोजशाला का प्रश्न केवल एक धार्मिक स्थल का विवाद नहीं है। यह भारत की सभ्यतागत स्मृति, ऐतिहासिक न्याय और आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था तीनों के संगम का विषय बन चुका है। इतिहास का समाधान प्रतिशोध से नहीं, सत्य और न्याय से होता है। लेकिन सत्य सामने आने पर भी यदि समाज अपने “पीड़ित” और “विजेता” भाव से बाहर नहीं निकल पाता, तो विवाद केवल अदालतों में नहीं, मानसिकताओं में भी चलता रहता है। भोजशाला का संघर्ष इसी गहरे भारतीय द्वंद्व की कहानी है जहां एक सभ्यता अपने अतीत को पुनः पढ़ रही है, और दूसरी ओर इतिहास की विरासत आज भी वर्तमान की राजनीति और मनोविज्ञान को प्रभावित कर रही है।
डा. आलोक कुमार द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर, दर्शनशास्त्र, लखनऊ
